भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( १६ )

को हर और नववधुओं के नीलकमलके समान चंचल नेत्र ही नेत्र दोखते हैं । जिसकी आँखों में जा समा जाता है, उसे वही वह दीखता है ।

4. What with the turning of her beautiful brows, what with her gentle bashfulness, what with her fearfulness and what with her playful gestures, the face of a young woman, having moving eyes with all the above qualifications, appears like a lotus ( with black bees hovering on it ).

वक्त्रं चन्द्रविकासि पङ्कजपरीहासत्वे लोचने वर्णः स्वर्णमपाकरिण्युरलिनीजिष्णुः कचानाञ्चयः ॥ वच्चोजाविभक्तुम्भसंश्रमहरीं गुर्वो नितम्बस्थली वाचो हारि च मार्दवं युवतिषु स्वाभाविकं मंडनम् ॥५॥

चन्द्रमाके समान प्रकाशमान मुख, कमलकी मसखरी करनेवाले दोनों नेत्र, सुवर्णकी दमकको फीकी करनेवाली शरीरकी कान्ति, मौरीके पुञ्जको जीतनेवाले केश, गजराजके गण्डस्थलकी शोभाका अपमान करनेवाली दोनों छातियाँ, विशाल नितम्ब—चूतड़, मनोहर वाणी और कोमलता—नजाकत—ये सब स्त्रियोंके स्वाभाविक भूषण हैं ॥५॥

खुलासा—चन्द्रमाके समान पुष्क, कमलको लजाने वाले नेत्र, कनककी आभाको मूढी करने वाली देहकी कान्ति, मौरी