शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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की पंक्तियोंको पराजित करने वाली अलके, गजराजके गण्ड-खलोंको लजाने वाले स्तनद्वय, फूलोंकी कोमलताको मात करने वाली नज़ाकत, मृगमदको नीचा दिखाने वाली मुखकी सुवास —ये सब स्त्रियोंके स्वाभाविक आभूषण या कुदरती ज़ेवर हैं। तात्पर्य यह है, कि स्त्रियाँ स्वभाव से ही बड़ी सुन्दरी होती हैं। इनकी असाधारण सुन्दरता और अनूप रूप पर किसका मन लहालोट नहीं हो जाता ? इनकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर ही लोग इनके कीत-दास हो जाते और दुःख-सुखकी परवा न कर, दिन-रात इनके लिये परिश्रम करते हैं।
छपय ।
करत चन्द्र इव विशद वदन, अद्भुत छवि छाजत । कमलन विहंसित नैन, रैन दिन प्रकलित राजत । करत कनक वृतिहीन, अंग-आभा अति उमगत । अलकन जीते भौर, कुचन करि-कुम्भ किये हत । मुहुता मरोर मारे सुमन, सुख-सुवास मृगमद कदन । ऐसो अनूप तिय रूप लखि, छाँहभूष नहि गिनत मन ॥५॥
सार—नाना प्रकारके हाव-भाव स्त्रियोंके नाना प्रकारके अस्त्र हैं। इनसे ही वे पुरुषों को अपने वशमें करतीं और अपना गुलाम बनाती हैं।