शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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और इनकी इन अदाओं पर न्यौछावर होकर सदाको इनके क्रीत-दास हो जाते हैं ।
दोहा ।
मन्द हसन तीखे नयन, सरस वचन सविलास ।
गजगमनी रमणी निरख, को न करे अभिलाष ॥६॥
सार—नवीना युवतियोंके हृदयहारी हाव- भावों पर न मर मिटनेवाला पुरुष कोई विरली ही महतारी जनती है ।
6. Is not everything charming in a lotus-eyed woman just verging on her youth? Say the gentle smile on her face, the casting of her restless eyes, talking sweetly in different new charming modes, walking by gestures and with slow steps like that of new leaves.
द्रष्टव्येषु किमुत्तमं मृगहशां प्रेमप्रसन्नं मुखं
घ्रातव्येष्वपि किं तदास्यपवनः श्राव्येषु किं तद्भ्रचः ॥
किं स्वाद्व्येषु तदोष्टपल्लवसः स्पर्शयेषु किं तत्तख-
ध्येयं किं नवयौवनं सुहृदयैः सर्वत्र तद्विश्रमः ॥७॥
रसिकोंके देखने-योग्य क्या है ? मृगनयनी कामिनियोंका प्रेमपूर्ण प्रसन्न मुख । सँवने-योग्य क्या है ? उनके सँहकी भाष । सुनने-योग्य क्या है ? "उनके वचन । स्वादिष्ट पदार्थ क्या है ? उनके ओष्ठपल्लवका रस । छूने-योग्य क्या है ? उनका कोमल