शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३१६ )
सोचने लगी और रह-रहकर लम्बे साँस लेने लगी। फिर वह बैठ गई और कुराब आध घण्टेतक उसी तरह बैठो रही। इसके बाद उसने खानेका सामान चौकीसे उठाकर रसोईमें रख दिया। पीछे उसने एक टाटकी बोरी लाकर, उसमें चौकीदार की लाश रखी और उसका मुँह अच्छी तरहसे बाँधकर उसे स्तर पर उठा लिया और एक कुदाल हाथमें लेकर घरसे बाहर निकली। कहनेकी ज़रूरत नहीं कि, वह घरसे बाहर जाते समय बिड़कीका ताला बन्द करती गई। उसके कुछ दूर चले जानेपर, मैं भी पेड़से नीचे उतर, कुछ फ़ासिलेसे, उसके पीछे हो लिया। वह उस लाशको सरपर रखे हुए, दो कोस दूरके एक इमशान-घाट पर पहुँची। लाशको नीचे पटक कर, उसने एक गहरा खड्डा खोदा और उसमें लाश दफना दी। इसके बाद वह फिर घर लौटी और थोड़ी देरमें घर पहुँच गई। मैं भी उसके पीछे-पीछे आकर उसी पेड़ पर चढ़ गया।
मैं उसी वृक्षसे फिर देखने लगा, कि अब वह क्या करती है। घरमें आकर उसने दरवाज़ा बन्द कर दिया और बिस्तर, चादर और लिहाफ़ वगैरः गोबर और पानीसे मलमलकर धोने लगी; लेकिन खून न छूटा, तब उसने उन्हें एक बड़ी बाल्टीमें भिगो दिया। तत्कृतपोश और ज़मीन पर जो खूनके दाग थे, वे सब उसने गोबर और मिट्टीसे साफ़ कर दिये। ये सब काम करके, वह दालानमें आकर कुछ सोचने लगी।
इस समय मेरा क्रोध कुछ कम हो गया, लेकिन दिल नफ़-