भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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रतसे भर गया। मैं मन-ही-मन कहने लगा—‘जो खी पतिका गोदमें बैठकर रह-रहकर काँप उठती थी, जो घरमें बूहेके खड़का करनेसे डर जाती थी, वही आज मोटी-ताजी लाशको, जिसे दो आदमी भी आसानीसे उठा नहीं सकते, सिरपर रखकर, अकेली, रातके एक बजे श्मशान पर पहुँची ! जो खी अपना मतलब साधनेके लिए ऐसे-ऐसे काम कर सकती है, उसके लिए ऐसा कौनसा काम है, जिसे वह न कर सकती हो ? यह अबला कुल-कामिनी है या आदमीको कच्चा ही चबा-डालने वाली सबला राक्षसी है ? क्या मेरे आदर और प्यारका यही नतीजा है ? कौन कह सकता है कि, यह किसी दिन मुझे भी न मार डालेगी ? रोशनीके नीचे अँधेरा रहता है, अब यह बात मेरी समझमें अच्छी तरहसे आ गई। अब मेरी आँखें खुल गईं। मेरे मित्रोंने मुझे कितनी ही बार सावधान किया, पर उस समय मेरी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। मेरी मति मारी गई थी। मेरे हाथमें चिराग था, इसलिए मुझे कुछ न दीखता था। अब मोहका पर्दा हटते ही, चिराग दूसरेके हाथमें जाते ही—मुझे अपना बुरा-मला दीखने लगा। अब भी मैं सावधान हो सका हूँ, इसके लिए मैं अपने तर्ज धन्यवाद देता हूँ। अस्तु, सवेरा होनेमें विशेष देरी न देखकर, मैं पेड़से नीचे उतर आया और खिड़की के पास जाकर आवाज़ लगाई। मैंने इन्हीं जल्दी दो तीन आवाज़ें लगाईं कि, वह और कुछ सोचनेका मौका न पा सकी। अतः उसने फौरन दरवाज़ा खोल दिया।