शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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उसकी बुद्धि औरभी हर ली थी । कन्दपंकलाको तरह अनेकों स्त्रियाँ, अपने ध्याहता पतियोंको धोखा देकर, पर-पुरुषोंके साथ रमण करता हैं । उनके पति उनका भोतरी हाल न जानकर, उनकी बारम्बार खुशामद करते और प्रेमको भिक्षा माँगते हुए लम्पटपन दर्शाते हैं । ऐसे लोगोंका जीवन किरकरा हो जाता है । अगर खो अपने साथ प्रेम करे, अपने ऊपर ही आसक्त रहे, तब तो इस संसारमें ही स्वर्ग है, अन्यथा नरक है । जो खो पराये मर्दको प्यार करती है, अपने पतिको धोखा देती है, उसके जीनेको धिक्कार है । और जो भोला-भाला पुरुष अपनी खोके दुश्चरित्र का हाल न जानकर, उससे प्रेम करता, उसकी खुशामद करता उसका भी जीवन अष्ट है ।
कामशास्त्रमें लिखा है :—
नाभिपश्यन्ति भर्तारं नोत्तरं संप्रतीच्छति ।
वियोगेसुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति ॥
शय्यामुपगताशेते वदनमाष्टिबुभ्रिता ।
तन्मित्रैर्द्वेष्टिमानश्च विरक्ता नाभिवांछति ॥
जो स्त्री अपने पतिको नहीं चाहती, वह उसकी तरफ नहीं देखती ; हँसकर बोलना तो दूर की बात है, पूछी हुई बातका भी जवाब नहीं देती ; जब तक पति घरमें रहता है, दुखो रहती है और उसके घरसे चले जाने पर सुखो होती है ; उसके साथ एक पलंग पर नहीं सोती ; अगर लेट भी जाता है, तो या तो