भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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नींदमें सो जाती है या मुँह फेर लेती है ; अगर पति मुख नूमता है, तो गालको पोंछ डालती है ; पतिके मित्रसे द्वेष रखती है ; पति उसे कितना ही चाहे, पर वह राजी नहीं होती, मुँह फुलाये रहती है ।

“पञ्चतन्त्र”में लिखा है—

पर्यङ्केष्वास्तराणां पतिमनुकूलां मनोहरं शयनम् ।

तृणामिव लघु मन्यन्ते कामिन्यक्षौथ्यैरतलुत्पन्नाः ॥

पल्लंग पर सोना, पतिकी अनुकूलता और मनोहर शयनको चोरीसे रत करनेकी इच्छा रखनेवाली स्त्रियाँ तिनकेके समान समझती हैं ।

अगर गुणनिधि इन बातोंको जानता होता, तो उस हरजार्ई की इतनी खुशामद न करता ।

बहुत देर तक कन्दर्पकलाकी खुशामद करता-करता गुणनिधि थक गया । उस बेवफा औरतको ज़रा भी रहम न आया । उसका दिल गुणनिधिकी ओर ज़रा भी न झुका और अपने यार से मिलनेका उत्साह कम न हुआ । अन्तमें थका-माँदा गुणनिधि रतकी आशा छोड़कर सो गया ; मगर उसे अच्छी तरह नींद न आई । इन्हीं बातोंमें आधी रात बीत गई । घड़ियाली ने टर्न टन करके वारह बजाये । सारे शहरमें सन्नाटा छा गया । सड़कों पर आदमियोंका चलना-फिरना बन्द हो गया । कोई इका-तुका आदमी इधर-से-उधर जाता नज़र आता था । सारा