शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संसार निद्रादेवीकी गोदमें चला गया । ऐसे समयमें कन्दर्पकला को अपने यारको फिर याद आई । वह मन-ही-मन कहने लगी—“मेरा प्राणप्यारा उस उपवनकी लताकुञ्जोंमें मेरी बाट जोह रहा होगा, मुझसे मिलनेके लिए घरवा रहा होगा । हाय ! मेरे बिना आज उसका कैसा हाल होगा ! आज इस दुष्टके यकायक आ जानेसे, मैं उसके पास नियत समय पर न पहुँच सकी । प्यारे ! मुझे क्षमा करना ; आज मैं मजबूर हूँ, मेरा दोष नहीं । आज मेरे-तुम्हारे सुखमें बाधा पहुँचाने वाला आ गया है ।” ये शब्द मन-ही-मन कहती हुई, वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ी । गुणनिधि इस समय भी पूरी तरह न सोया था । वह धमाका सुनते ही अच्छी तरह जाग पड़ा । उस प्रेमान्धने कन्दर्पकलाको ज़मीन परसे उठाया और छातीसे ठगाकर पंखा करने लगा । ज्योंही उसे होश हुआ वह अपने तई पतिकी गोदमें देखकर लम्बे-लम्बे साँस लेने लगी और गोदसे उतर कर फिर अलग जा बैठो । पतिने पत्नीको मनानेके फिर भी बहुत यत्न किये, पर सब व्यर्थ । इस विघ्नकारीके विनय-वचन उस परपुरुषरता कामिनीके वियोगाग्निसे दग्ध हुए हृदयको कैसे शान्त कर सकते थे ?
जब गुणनिधि सो गया । घोर नींदमें निमग्न हो जानेसे, खुरग-टें लेने लगा, तब कन्दर्पकलाने उसे नींदके वशोभूत जान यारसे मिलनेकी ठानी । उसने उठकर सोलह शृंगार किये और सज-धज कर यारसे मिलने चली । आज धरमें महोत्सव था,