भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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समझा कि, यह प्रणय-कुपिता है। मैं बहुत दिनोंमें आया है; इससे नाराजी दिखाती और नखरे करती है। वह उसे बारम्बार प्रणाम करके और अत्यन्त मीठी बातें कह-कह कर समझाने लगा—“प्यारी! पहले तो तू ऐसी नहीं थी, यह तुम्हें क्या हुआ? तू तो मेरी जीवन-डोरी है। तेरे बिना मैं क्षण-भर भी जी नहीं सकता। अगर तू मुझसे न बोलेगी, मेरी ओर न देखेगी, तो मैं अपनी जान खो दूँगा। अरी मधुर मल्लिका! एक बार तो मेरी तरफ नज़र भरके देख। देख, तेरा यह दास तेरे प्रेमको आशासे तेरी सेवा करनेके लिए तड़फ़ रहा है। मुझ जैसे आज़ाकारी सेवकको इस तरह निराशा करना क्या उचित है? मेरी समझमें, मैं निरपराध हूँ। अगर मुझसे कोई अपराध हो गया है, तो मुझे क्षमा कर। देख, ईश्वर भी भयङ्कर-से-भयङ्कर अपराधीको क्षमा कर देता है। क्या तू अपने सेवकको क्षमादान न देगी?”

गुणनिधिने इस तरह सैकड़ों दीनता को बातें कहीं, हाथ जोड़े, प्रणाम किया, तरह-तरहसे मुहब्बत जताई; पर वह ज़रा भी न पसीजी। उस वज्रहृदयाके कठोरतम हृदयमें लेशमात्र भी प्रेमका सञ्चार न हुआ। प्रेमका सञ्चार हो कहाँ से? वह तो दूसरे पर मरती थी और उसीको चाहती थी। उसे अपना पति तो हलाहल विषसे भी बुरा और वह यार अमृतसे भी उत्तम मालूम होता था। गुणनिधि सब तरहसे बुद्धिमान और चतुर होनेपर भी, ख़ियोंके छल-कपट जाननेमें निरा अबोध था। कामने