शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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समझा कि, यह प्रणय-कुपिता है। मैं बहुत दिनोंमें आया है; इससे नाराजी दिखाती और नखरे करती है। वह उसे बारम्बार प्रणाम करके और अत्यन्त मीठी बातें कह-कह कर समझाने लगा—“प्यारी! पहले तो तू ऐसी नहीं थी, यह तुम्हें क्या हुआ? तू तो मेरी जीवन-डोरी है। तेरे बिना मैं क्षण-भर भी जी नहीं सकता। अगर तू मुझसे न बोलेगी, मेरी ओर न देखेगी, तो मैं अपनी जान खो दूँगा। अरी मधुर मल्लिका! एक बार तो मेरी तरफ नज़र भरके देख। देख, तेरा यह दास तेरे प्रेमको आशासे तेरी सेवा करनेके लिए तड़फ़ रहा है। मुझ जैसे आज़ाकारी सेवकको इस तरह निराशा करना क्या उचित है? मेरी समझमें, मैं निरपराध हूँ। अगर मुझसे कोई अपराध हो गया है, तो मुझे क्षमा कर। देख, ईश्वर भी भयङ्कर-से-भयङ्कर अपराधीको क्षमा कर देता है। क्या तू अपने सेवकको क्षमादान न देगी?”
गुणनिधिने इस तरह सैकड़ों दीनता को बातें कहीं, हाथ जोड़े, प्रणाम किया, तरह-तरहसे मुहब्बत जताई; पर वह ज़रा भी न पसीजी। उस वज्रहृदयाके कठोरतम हृदयमें लेशमात्र भी प्रेमका सञ्चार न हुआ। प्रेमका सञ्चार हो कहाँ से? वह तो दूसरे पर मरती थी और उसीको चाहती थी। उसे अपना पति तो हलाहल विषसे भी बुरा और वह यार अमृतसे भी उत्तम मालूम होता था। गुणनिधि सब तरहसे बुद्धिमान और चतुर होनेपर भी, ख़ियोंके छल-कपट जाननेमें निरा अबोध था। कामने
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उसकी बुद्धि औरभी हर ली थी । कन्दपंकलाको तरह अनेकों स्त्रियाँ, अपने ध्याहता पतियोंको धोखा देकर, पर-पुरुषोंके साथ रमण करता हैं । उनके पति उनका भोतरी हाल न जानकर, उनकी बारम्बार खुशामद करते और प्रेमको भिक्षा माँगते हुए लम्पटपन दर्शाते हैं । ऐसे लोगोंका जीवन किरकरा हो जाता है । अगर खो अपने साथ प्रेम करे, अपने ऊपर ही आसक्त रहे, तब तो इस संसारमें ही स्वर्ग है, अन्यथा नरक है । जो खो पराये मर्दको प्यार करती है, अपने पतिको धोखा देती है, उसके जीनेको धिक्कार है । और जो भोला-भाला पुरुष अपनी खोके दुश्चरित्र का हाल न जानकर, उससे प्रेम करता, उसकी खुशामद करता उसका भी जीवन अष्ट है ।
कामशास्त्रमें लिखा है :—
नाभिपश्यन्ति भर्तारं नोत्तरं संप्रतीच्छति ।
वियोगेसुखमाप्नोति संयोगे चाति सीदति ॥
शय्यामुपगताशेते वदनमाष्टिबुभ्रिता ।
तन्मित्रैर्द्वेष्टिमानश्च विरक्ता नाभिवांछति ॥
जो स्त्री अपने पतिको नहीं चाहती, वह उसकी तरफ नहीं देखती ; हँसकर बोलना तो दूर की बात है, पूछी हुई बातका भी जवाब नहीं देती ; जब तक पति घरमें रहता है, दुखो रहती है और उसके घरसे चले जाने पर सुखो होती है ; उसके साथ एक पलंग पर नहीं सोती ; अगर लेट भी जाता है, तो या तो
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नींदमें सो जाती है या मुँह फेर लेती है ; अगर पति मुख नूमता है, तो गालको पोंछ डालती है ; पतिके मित्रसे द्वेष रखती है ; पति उसे कितना ही चाहे, पर वह राजी नहीं होती, मुँह फुलाये रहती है ।
“पञ्चतन्त्र”में लिखा है—
पर्यङ्केष्वास्तराणां पतिमनुकूलां मनोहरं शयनम् ।
तृणामिव लघु मन्यन्ते कामिन्यक्षौथ्यैरतलुत्पन्नाः ॥
पल्लंग पर सोना, पतिकी अनुकूलता और मनोहर शयनको चोरीसे रत करनेकी इच्छा रखनेवाली स्त्रियाँ तिनकेके समान समझती हैं ।
अगर गुणनिधि इन बातोंको जानता होता, तो उस हरजार्ई की इतनी खुशामद न करता ।
बहुत देर तक कन्दर्पकलाकी खुशामद करता-करता गुणनिधि थक गया । उस बेवफा औरतको ज़रा भी रहम न आया । उसका दिल गुणनिधिकी ओर ज़रा भी न झुका और अपने यार से मिलनेका उत्साह कम न हुआ । अन्तमें थका-माँदा गुणनिधि रतकी आशा छोड़कर सो गया ; मगर उसे अच्छी तरह नींद न आई । इन्हीं बातोंमें आधी रात बीत गई । घड़ियाली ने टर्न टन करके वारह बजाये । सारे शहरमें सन्नाटा छा गया । सड़कों पर आदमियोंका चलना-फिरना बन्द हो गया । कोई इका-तुका आदमी इधर-से-उधर जाता नज़र आता था । सारा
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संसार निद्रादेवीकी गोदमें चला गया । ऐसे समयमें कन्दर्पकला को अपने यारको फिर याद आई । वह मन-ही-मन कहने लगी—“मेरा प्राणप्यारा उस उपवनकी लताकुञ्जोंमें मेरी बाट जोह रहा होगा, मुझसे मिलनेके लिए घरवा रहा होगा । हाय ! मेरे बिना आज उसका कैसा हाल होगा ! आज इस दुष्टके यकायक आ जानेसे, मैं उसके पास नियत समय पर न पहुँच सकी । प्यारे ! मुझे क्षमा करना ; आज मैं मजबूर हूँ, मेरा दोष नहीं । आज मेरे-तुम्हारे सुखमें बाधा पहुँचाने वाला आ गया है ।” ये शब्द मन-ही-मन कहती हुई, वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ी । गुणनिधि इस समय भी पूरी तरह न सोया था । वह धमाका सुनते ही अच्छी तरह जाग पड़ा । उस प्रेमान्धने कन्दर्पकलाको ज़मीन परसे उठाया और छातीसे ठगाकर पंखा करने लगा । ज्योंही उसे होश हुआ वह अपने तई पतिकी गोदमें देखकर लम्बे-लम्बे साँस लेने लगी और गोदसे उतर कर फिर अलग जा बैठो । पतिने पत्नीको मनानेके फिर भी बहुत यत्न किये, पर सब व्यर्थ । इस विघ्नकारीके विनय-वचन उस परपुरुषरता कामिनीके वियोगाग्निसे दग्ध हुए हृदयको कैसे शान्त कर सकते थे ?
जब गुणनिधि सो गया । घोर नींदमें निमग्न हो जानेसे, खुरग-टें लेने लगा, तब कन्दर्पकलाने उसे नींदके वशोभूत जान यारसे मिलनेकी ठानी । उसने उठकर सोलह शृंगार किये और सज-धज कर यारसे मिलने चली । आज धरमें महोत्सव था,
श्रृङ्गारशतक
कन्दर्पकलाने, उसे नींदके बशीभूत जान, यारसे मिलनेकी यानी । उसने उठकर सोलह, श्रृंभार किये और सजधज कर यारसे मिलने चली । घरमें चोरी करनेकी गरजसे आया हुआ चोर भी, राहमें उसके क़ीमती जे वरात छीन लेनेकी इच्छासे, उसके पीछे लग लिया ।
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सब लोग दिनभर काम-काजमें लगे रहे थे । आतन्द्रका दिन था, इसलिए सभीने विजयाका नशा किया और नशेमें खूब खाया । रातको थक जाने और नशेमें गूँक हो जानेसे सभी बेवबर होकर सो रहे । घरमें जाने-आनेकी रोक नहीं थी ; इसलिये मौका पाकर एक चोर घरमें घुस आया । वह अपनी घात लगा रहा था, इतनेमें उसने अपने यारसे मिलनेको जानेवाली कन्दर्पकलाके पैरोंकी पायेजैवोंकी भक्तकार सुनी । वह फ़ौरन ही एक कोनेमें डुबक गया । आधीरातका समय होनेके कारण, पूरब दिशा रूपी प्रमदाका आलिंगन करके बैठा हुआ चन्द्रमा अपने पूर्ण प्रकाशको आम प्रभुति वृक्षोंके पत्तों पर फैला चुका था । चारों ओर चाँदनीकी चादर बिछी हुई थी । कुमुदनी खिल चुकी थी । दिनमें सूरजके तापसे सन्तप्त हुआ आकाश सुधाकरकी शीतल चाँदनी छिटकनेसे सुशीतल हो गया था । मनुष्य और पशुपक्षी सभी निद्रादेवीकी गोदमें अचेत पड़े हुए थे । चारों ओर निस्तम्भताका अखण्ड साम्राज्य था । ऐसे समयमें कन्दर्पकला छम-छम करती हुई घरसे निकली और लताकुञ्जमें अपने उपपति-से मिलने चली । उस चोरने जो एक कोनेमें छिपा हुआ था, इस रमणोंको अकेली जाते देख, एकान्त स्थलमें इसके गहने उतार लेनेका अच्छा मौका समझा और इसके पीछे हो लिया ।
अब जरा कन्दर्पकलाके यारका भी हाल सुनिये । रात बहुत बीत गई ; यहाँतक कि आधी भी ढल गई, पर उस प्रेमीकी प्रिया न आई ; इसलिये वह अपनी प्रियतमाके न मिलनेसे अत्यन्त दुःखी
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हुआ । बारम्बार, पागलकी तरह वृक्षोंसे बातें करने लगा । अगर हवाके चलनेसे पत्ता भी खड़खड़ाता, तो वह धुन बाँधकर देखने लगाता और चौँककर कहने लगाता,—“अबके मेरी प्यारी—हृदयहारिणी सुन्दरी आई ।” पर जब कोई न आता, तो निराश होकर पछताने लगाता । चूँकि शुक्लपक्ष—उजेल पाख था, चन्द्रमाकी चाँदनी अपनी अपूर्व छटा दिखा रही थी । मन्दी-मन्दी हवा चल रही थी, स्थान भी अतीव रमणीय था, चारों ओर सुहावने वृक्ष-ही-वृक्ष थे । चम्पा, चमेली, केतकी और गन्धराजकी सुगन्धसे वन-का-वन महक रहा था । कामोत्तेजक सारे सामान मौजूद थे । इसलिये ज्यों-ज्यों रात बीतती थी, उसका हृदय कामाग्नि और वियोगगनिसे जला जाता था । निदान वह अधीर हो गया । कामके तापको सह न सका । अगर उसकी प्यारीका मुखचन्द्र उसे दीख जाता, तो उसकी अग्नि शान्त हो जाती । पर उस रातको वह न आई, इसलिये घोर दुःखसे दुःखी होकर, एक भाड़से लिपटी हुई लतासे फाँसी खाकर और अपने अमूल्य प्राण त्यागकर यमसदनका राही हुआ । उस प्रेमीके प्राणत्याग कर चुकनेके थोड़ी देर बाद ही, कन्दर्पकला उस उपवनमें पहुँची । उसने अपने हृदयके हार, प्राणप्यारको मोतियोंकी मालाओं और रत्नजटित आभूषणोंसे अलंकृत देखा । चन्द्रमाकी चाँदनीमें सारे जूवर चमाचम चमक रहे थे । उसका सुन्दर शरीर रंगबिरंगे बहुमूल्य वस्त्रोंसे सुशोभित था, परन्तु वह अपूर्व पदार्थ—शरीरका रत्न, समस्त सुखोंको
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भोगनेवाला—चैतन्य-चन्द्र उसकी देहसे सदाके लिए अलग हो चुका था। हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। घरमें रहनेवाला गायब हो गया था, खाली घर पड़ा था। प्राणविहीन देह लटक रही थी। उस लाशके आस-पास कुछ पशुपक्षी उड़ रहे थे। फाँसी लगाते समयकी आवाज़ सुनकर पक्षी जाग पड़े थे और उस लाशके ईर्ष-गिर्द जमा हो गये थे। इन पशुपक्षियोंको देखकर वह नाना प्रकारकी आशंका करने लगी। उसके चित्तमें एक-पर-एक संकल्प-विकल्प उठने लगे। वह अत्यन्त भयभीत हुई। खैर, अन्तमें वह उसके पास पहुँची और उसके गले लगनेकी आशासे झुकी, तो उसे मरा हुआ पाया। बस, वह कुलटा तत्क्षण ज़मीनपर गिर कर मूर्च्छित हो गई। थोड़ी देर पड़ी रहनेके बाद, उसे स्वतः ही होश हुआ। वह उठकर उस लाशके पास बैठ गई और चिलाप करने लगी। जिस तरह गूँजते हुए भौरोंके बैठनेसे कोमल लता नीचे मुक जाती है; उसी तरह आह ! कहते ही वह फिर पृथ्वी पर गिरकर बेहोश हो गई। इस बार बहुत देरके बाद उसे होश हुआ। होश होते ही वह ज़ार-ज़ार रोने और क्रूकने लगी। उस लाश पर नज़र पड़ते ही वह अचम्बित और दुःखित हो कहने लगी—“हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! प्यारे ! आप कहाँ सिधारे ? नाथ ! इस दासीका साथ क्यों छोड़ दिया ? मेरे जीवन-सर्वस्व ! आपका उदार चित्त ऐसा अनुदार क्यों हो गया ? भहाराज ! इस दासीका अपराध क्षमा करते ! प्राणेश ! कुछ तो धीरज धरते। हा ! बिना कुछ कहे,
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बिना बोले, बिना मिले, इस दासीको सदाके लिए अनाथ करके, चले जाना उचित न था। प्यारे! अब यह अभोगिन आपका मुखचन्द्र कहाँ देखेगी? हाय! यह क्या हुआ! मेरे प्यारे! प्रीतम! प्राणवल्लभ! हृदयके हार! सुनो, यह दासी कबकी पुकार रही है? हा! आप ऐसे कठोर कबसे हो गये? हा! प्राणेश! मुझ मन्दभागिनीको रोते-कलपते और तड़फते देख, आपको जरा भी दया नहीं आती! हाय! हाय! कुछ तो मुहब्बत निबाही होती। बिस्चोर! एकवार तो दौड़कर गले लगो। प्यारे! एकवार तो मीठी और रसीली बातें और सुना दो। यह दासी भी आपके पास ही आती है।” यह कहती हुई वह बेहोश होकर गिर पड़ी। इसके कुछ देर बाद धीरज धरकर अपने प्रेमीका मुँह चूमने लगी-मानों उस मुँहमें जान आ गई हो। इसके बाद उसने अपने मुँहका पान भी उसके मुँहमें रख दिया और बारम्बार उसके खूबसूरत चेहरे को देखने लगी। फिर कभी रोने लगती और कभी धीरज धरके कहती—“प्यारेको आँखों-भर देख तो लूँ, जो होना था सो तो हो ही गया।
अब एक नई बात सुनिये :—ईश्वरकी गति बड़ी ही विचित्र है। उस लीलामयकी लीलाका पार नहीं। वह बड़ा विलक्षण है। उसकी रचनाका भेद पाना असम्भव है। कोई नहीं कह सकता कि, थोड़ी ही देरमें क्या होनेवाला है। उस मुर्देके शरीर पर चन्दन-अरगजा चर्बित था। इस प्रभुति 'बुधश्रवदार' चीज़ोंसे उसके कपड़े महक रहे थे। उसके बदन पर के सुगन्धित पदार्थों से
A black and white photograph showing a close-up of a hand holding a blank, white page. The hand is positioned on the right side of the frame, with fingers visible. The page is held against a dark, textured background, possibly the cover of a book or a folder. The lighting is bright on the page, making it stand out against the dark background. There are a few small, dark specks on the page, likely dust or imperfections in the paper.
शुद्धांशतक
हँसा उड़ गया था, खाली देह लटक रही थी। वह नाना प्रकारको आशंका करने लगी। वह उसके गले लगनेकी आशासे मुड़ी, तो उसे मरा हुआ पाया; तब वह अचम्बित और दुःखित हो कहनेलगी—'हाय ! मेरे प्राणाधार ! हा ! मेरे नयनानन्द ! आप कहाँ सिंधारे ? ज्योंही कन्दपकला अपने यारका होट अपने गर्दियों लेकर चलने लगी, त्योंही समू मंदिरमें घुसे हुए घेतने उस दुष्टाकी नाक झूट खाई।
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वह वन-का-वन सुगन्धिभय हो रहा था। कोसों तक सुगन्धि फैल रही थी। उस वनमें एक प्रेत भी रहता था। उसने सुगन्ध पर मोहित होकर, उसके शरीरमें अपना घर बना लिया ; यानी वह मुर्देके भीतर घुस गया। ज्योंही कन्दर्पकलाने अपने यारकी लाशसे आलिङ्गन किया, उसका होट अपने मुँहमें रखकर चूसने लगी, त्योंही उस मुर्दे में घुसे हुए प्रेतने उस डुटाकी नाक काट खाई। इस तरह दुराचारिणी स्त्रीने अपने कुकर्मका फल पाया *। संसारमें जगदीशकी इच्छा बिना एक
❖ बहुसते नई रोयनीवाले बाबू इस घटनाको कल्पित और मनगढ़न्त समझेंगे। उनके लिए हम अभी दस-पाँच दिनकी ऐसी ही प्रकचकानेवाली नई घटना, जो कल-परसों ता० २०१२५ जुलाई सन् १९२५ के हिन्दी प्रवक्वारोंमें छपी है उनाते हैं, उससे मालुम हो जायगा कि ईश्वरको लोहा कैसी विचित्र है। वह पापियोंको किस तरह दण्ड देता है। भागलपुरमें रहनेवाला एक नार्ड अपनी पुत्रीको लिये लानेके लिए पुत्रीकी घरमालमें गया। लड़कीको लेकर वह पेंदल किसी जङ्गलमें होकर आ रहा था। उसकी पुत्री गर्भवती थी और उसका रूप-लावण्य अपूर्ण था। चेहरेसे नूर टपका पड़ता था। पिताकी नीयत पुत्री पर बिगड़ी। उसने पुत्रीकी राजीते या बेराजीते—पता नहीं—उससे भोग किया। उसकी लिंगेन्द्रिय क्षमकी पुत्रीकी योनिमें अटक गई। उसने इन्द्रिय निकालनेकी इज्जतें कोपियों कीं ; मगर वह कामयाब न हुआ। वह दोनों अप्रयत्नाले जाये गये। डाक्टरोंने उन्हें प्रलग किया। गर्भका बन्धा मर गया, वह भी निकाला गया। क्या किसीने आज तक उना है कि, पुरुषकी लिंगेन्द्रिय श्वाकी योनिमें कभी अटक हो? ईश्वरको उस महा ब्रह्म
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पत्ता भी नहीं हिलता, इससे मालूम होता है कि, जगदीशकी ऐसी ही इच्छा थी कि, उस भ्रष्टा कुलटाको दण्ड मिले, और वह जीवन-भर ऐसे कुकर्म करने योग्य न रहे। आगे देखिये क्या-क्या गुल खिलते हैं।
चेहरेकी सुन्दरता नष्ट होने या नाक काट जाने पर, कन्दर्पकला उस लाशको वहीं छोड़कर, वहाँसे नौ दो ग्यारह हुई और घर पहुँचकर चुपचाप अपने पतिके पास सो रही। कुछ देर लेटी रहनेके बाद, उसने त्रिया-चरित्र रचना शुरू किया। सोते-सोते मानो अचानक चौँक उठी हो—इस तरहका भाव बनाकर चिल्लाने लगी—“हायर! हाय! इसने मेरी नाक काट ली, कोई दौड़ो, मुझे बचाओ।” इस तरहकी भयानक चीख सुनकर घरके लोग दौड़े आये। इस आवाज़को सुनकर बेचारा अनजान गुणनिधि भी जाग उठा। वह आँखें खोल कर क्या देखता है कि, लोग उसे चारों ओरसे घेरे हुए खड़े हैं और क्या हुआ ! क्या हुआ ! का शोर कर रहे हैं। उसकी अपनी विवा-हिता स्त्री कन्दर्पकला कह रही है—“आप लोग नहीं देखते, इसने मेरी नाक काट ली है ? मुझे बचाइये, नहीं तो अब मेरी जान भी नहीं बचेगी, यह मुझे मार डालेगा।” ये बात सुनकर गुण-निधिका ससुर और अन्य लोग कहने लगे—“तुमने यह क्या
नाईको सज़ा देनी थी, उसे मुँह दिखाने योग्य न रखना था ; इसीसे ऐसी अपूर्ण-देखी न सुनी-घटना घटी। ईश्वर पापियोंको इसी तरह दण्ड देता है।
श्रृङ्गारशतक
इसने मुझे निरपराधिनीकी नाक काट ली है। मुझे बचाइये, नहीं तो यह मुझे जानसे मार डालीगा।
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किया? अफ़सोस! तुमने इस निरपराधितोकी नाक बुथा ही काट ली! इसका क्या अपराध था?" ये बातें सुनते ही गुणनिधि का चेहरा पीला पड़ गया। वह हक्का-बक्का हो गया। होश-हवास जाते रहे। उसके मुँहसे एक अक्षर भी न निकला। उधर कन्दर्पकला फूट-फूटकर रो रही थी। उसके पिता और चाचा वगैरः गुणनिधिसे नाक काटने की वजह पूछ रहे थे। इतनेमें सबेरा हो गया। गुणनिधिके सुसरालवाले कोतवालीमें दौड़े गये; रिपोर्ट लिखाई। पुलिसने आकर गुणनिधिको गिरफ़्तारकर लिया। फिर वह राजाके सामने पेश किया गया। राजाने सब तरहसे पूछ-ताछ और गवाही वगैरः लेकर गुणनिधिको १ सालकी क़ैद और दस हजार रुपया जुर्माना किया। गुणनिधिनो एक शब्द भी अपनी ज़वानसे नहीं कहा।
यह बात सारे शहरमें फैल गई। हर आदमीके मुँहपर यही चर्चा थी कि, नगरसेठके ज़माईने अपनी स्त्रीकी नाक काट ली। वह कल ही परदेशसे आया था। न्यायके समय वह चोर, जो रातको कन्दर्पकलाके पीछे लगा था, अदालतमें मौजूद था। उसने देखा कि, निरपराध गुणनिधि बुथा मारा जाता है—बेचारेको बुथा इतनी कड़ी सज़ा दी जाती है। उसके दिलमें जोश आया और उसने सारी घटना राजाको कह सुनाई। राजा अपने अब्दमियोकै साथ स्वयं उपवनमें गया। चोरने कन्दर्पकलाके पदचिह्न, अपने छिपनेका स्थान और कन्दर्पके यारकी लाश ये सब दिखा दिये। साथ ही उस मुर्देके मुँहमेंसे कन्दर्पकलाकी नाक
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निकालकर दिखा दी और उस लाशपर पड़ी हुई खूनकी बूँदोंपर भी ध्यान दिलाया । सारी घटना राजाकी समझमें आ गई । राजाने गुणनिधिको दण्ड-मुक्त किया, कन्दर्पकलाको जेलखाने भेजा, चोरको कई लाख रुपये इनाम दिये और गुणनिधिको अपना दीवान बनाकर, उसे अपनी कन्या व्याह दी । बुरेको बुरा और भलेको भला फल मिला ।
नतीजा इस कहानीका यही है कि, अधिकांश स्त्रियाँ अत्यन्त कुटिल, क्रूर-कर्म करनेवाली, लज्जाहीना और चञ्चलमति होती हैं । ये लोग अपने पति, पिता-माता, भाई-बन्धु और अपनी पेटकीओलाद तकसे द्रोह करने और उनका सर्वनाश करनेमें नहीं चूकतीं ।
जिस पतिने कन्दर्पकलाकी मुहब्बतमें, उसे खुश करनेमें, कोई बात उठा न रखी ; जिस पिताने उसे पालने-पोषने और पढ़ाने-लिखानेमें कोई चुटि न की, उसकी शादीमें करोड़ों खर्च कर दिये—उन पिता और पतिकी इज्जतका उसने कुछ भी न्ययाल न किया । इससे बढ़कर और दौरात्म्य क्या हो सकता है ? कुल्ला नारी कुलगौरव-हानि, लोकनिन्दा, जेल और फाँसी किसीकी भी परवा नहीं करती । ऐसी नारीसे जगदीश बचावे ! किसीने कहा है :—
आवर्त्तः संशयानामविनयभवनं पत्तनं साहसानां दोषाणां सन्निधानं कपटशतगृहं क्षेत्रमप्रत्ययानाम् । दुर्प्रबिं यन्महदभिर्नवरवृषभैः सर्वमायाकरगंड व्रीर्यत्र केन लोके विषममृतयुतं धर्मानाशाय सुष्ठम् ? ॥
भुङ्गारशतक
राजाने गुणनिथिका वरदमुक्त किया, कन्दुकलाको जेलखान भेजा, चोरको कड़े लाख रुपये इनीस दिये और गुणनिथिका अपना दोषान बताकर, उसे अपनी कन्या भी ब्याह दी । वुरको दुरा और भलको भला फल मिला । पृष्ठ ३५५।६०
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