शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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व्यप्य ।
संयम राखत केश, नयनहूँ काननचारी ।
मुख भाँहि पवित्र रहत, द्विजगन सुखकारी ।
उस पर मुक्ताहार, रहत निशिदिन छवि छायो ।
आनन चन्द-उजास, रूप उज्ज्वल दसायो ।
तेरो तन तरुणी ! मृदुल अति, चलत चाल धीरज-सहित ।
सब भाँति सतोगुणको सदन, तज्ज करत अतुराग चित ॥१२॥
नोट—इस कवितासे भी दूसरा अर्थ साफ समझमें आता है । तेरे बाल संयमी हैं, नेत्र काननचारी हैं, मुखमें पवित्र सुखकारी ब्राह्मणोंका निवास है, छातिरों पर मुक्त पुरुषोंका हार है, मुख चन्द्रमाके समान है, शरीर नाजुक है, तू धीमी-धीमी चाल चलती है,—इन सब लक्षणोंसे तेरा शरीर सतोगुणका घर है । सतोगुणी शरीरसे विकार या क्षोभ उत्पन्न हो नहीं सकता ; फिर भी, तेरा शरीर अतुराग पैदा करता है, यह अचम्भे को ही बात है ।
सार—स्त्रीका शरीर, सब तरहसे सतो-गुणी, शीतल और शान्तिमय होनेपर भी, पुरुष के मनमें दाभ ही करता है ।
12, O women, of slender constitution, ( you ) whose hair is well controlled, whose eyes are outstretched up to ears, whose mouth is filled with naturally clean teeth and on whose breasts pearls are always shining, though your this frame is full of calmness yet it disturbs us. *
- The reference in this shloka have double meanings. Sanyami—means controlled as well as bound ; Shruti—means Vedas as well
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