भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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से ही स्वच्छ और सफेद दन्तपंक्तिसे शोभायमान है, तेरे कुचोंपर मोतियोंके हार मूल रहे हैं ; पर तेरा ऐसा शीतल और शान्तिमय शरीर भी मेरे मनमें तो विकार ही उत्पन्न करता है, यह अचम्भे की बात है ! ॥१२॥

नोट—इस श्लोकमें जो “संयमिन, अतुरपि, द्विजानां और मुकानां” शब्द आये हैं, उनके दो-दो अर्थ हैं। उनके इस्तेमालसे कवि महोदयने अर्थ वसत्कार दिखाया है। इसीसे इस श्लोकके दो अर्थ हो गये हैं। एक अर्थ ऊपर लिखा ही है, और दूसरा नीचे लिखते हैं ; पर पहले उन शब्दोंके दो-दो अर्थ बताने देना उचित समझते हैं :—संयमिन=धैर्य और जितेन्द्रिय। अतुरपि=कानों तक पहुँचे हुए और वेदशास्त्र पारङ्गत, काननचारी और बनचारी। द्विजानां=दांत, ब्राह्मण। मुकानां=मोती और मुक्त पुरुष।

दूसरा अर्थ।

हे कृष्ण ! ये नाजनी ! तेरे बाल जितेन्द्रिय हैं, तेरे नेत्र वेदशास्त्र-पारङ्गत और काननचारी हैं, तेरा मुख पवित्र है और उसमें ब्राह्मणों का निवास है, तेरी छातियों पर मुक्त पुरुषों का निवास है ; इसलिये तेरा शरीर सतोगुणका धाम है ; अतः उसे शीतल और शान्तिमय होना चाहिये ; पर, है उल्टी बात । तेरे सतोगुणी शरीरसे मुझे शान्ति मिलनी चाहिये ; पर उससे मेरे मनमें उल्टी अशान्ति यः शोभ अथवा अनुराग उत्पन्न होता है, यह आश्चर्य की बात है !

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