भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ३२ )

से ही स्वच्छ और सफेद दन्तपंक्तिसे शोभायमान है, तेरे कुचोंपर मोतियोंके हार मूल रहे हैं ; पर तेरा ऐसा शीतल और शान्तिमय शरीर भी मेरे मनमें तो विकार ही उत्पन्न करता है, यह अचम्भे की बात है ! ॥१२॥

नोट—इस श्लोकमें जो “संयमिन, अतुरपि, द्विजानां और मुकानां” शब्द आये हैं, उनके दो-दो अर्थ हैं। उनके इस्तेमालसे कवि महोदयने अर्थ वसत्कार दिखाया है। इसीसे इस श्लोकके दो अर्थ हो गये हैं। एक अर्थ ऊपर लिखा ही है, और दूसरा नीचे लिखते हैं ; पर पहले उन शब्दोंके दो-दो अर्थ बताने देना उचित समझते हैं :—संयमिन=धैर्य और जितेन्द्रिय। अतुरपि=कानों तक पहुँचे हुए और वेदशास्त्र पारङ्गत, काननचारी और बनचारी। द्विजानां=दांत, ब्राह्मण। मुकानां=मोती और मुक्त पुरुष।

दूसरा अर्थ।

हे कृष्ण ! ये नाजनी ! तेरे बाल जितेन्द्रिय हैं, तेरे नेत्र वेदशास्त्र-पारङ्गत और काननचारी हैं, तेरा मुख पवित्र है और उसमें ब्राह्मणों का निवास है, तेरी छातियों पर मुक्त पुरुषों का निवास है ; इसलिये तेरा शरीर सतोगुणका धाम है ; अतः उसे शीतल और शान्तिमय होना चाहिये ; पर, है उल्टी बात । तेरे सतोगुणी शरीरसे मुझे शान्ति मिलनी चाहिये ; पर उससे मेरे मनमें उल्टी अशान्ति यः शोभ अथवा अनुराग उत्पन्न होता है, यह आश्चर्य की बात है !

( ३३ )

व्यप्य ।

संयम राखत केश, नयनहूँ काननचारी ।

मुख भाँहि पवित्र रहत, द्विजगन सुखकारी ।

उस पर मुक्ताहार, रहत निशिदिन छवि छायो ।

आनन चन्द-उजास, रूप उज्ज्वल दसायो ।

तेरो तन तरुणी ! मृदुल अति, चलत चाल धीरज-सहित ।

सब भाँति सतोगुणको सदन, तज्ज करत अतुराग चित ॥१२॥

नोट—इस कवितासे भी दूसरा अर्थ साफ समझमें आता है । तेरे बाल संयमी हैं, नेत्र काननचारी हैं, मुखमें पवित्र सुखकारी ब्राह्मणोंका निवास है, छातिरों पर मुक्त पुरुषोंका हार है, मुख चन्द्रमाके समान है, शरीर नाजुक है, तू धीमी-धीमी चाल चलती है,—इन सब लक्षणोंसे तेरा शरीर सतोगुणका घर है । सतोगुणी शरीरसे विकार या क्षोभ उत्पन्न हो नहीं सकता ; फिर भी, तेरा शरीर अतुराग पैदा करता है, यह अचम्भे को ही बात है ।

सार—स्त्रीका शरीर, सब तरहसे सतो-गुणी, शीतल और शान्तिमय होनेपर भी, पुरुष के मनमें दाभ ही करता है ।

12, O women, of slender constitution, ( you ) whose hair is well controlled, whose eyes are outstretched up to ears, whose mouth is filled with naturally clean teeth and on whose breasts pearls are always shining, though your this frame is full of calmness yet it disturbs us. *

  • The reference in this shloka have double meanings. Sanyami—means controlled as well as bound ; Shruti—means Vedas as well

( ३४ )

मुग्धे धानुष्कता केयम पूर्वा त्वयि दश्यते ।

यथा हरसि चेतांसि गुणैरेव न सायकैः ॥१३॥

हे मुग्धे सुन्दरी ! धनुर्विद्यामें ऐसी असाधारण कुशलता तुझमें कहींसे आई कि, वाण छोड़े बिना, केवल गुण* से ही, तू पुरुष के हृदयको बेध देती है ? ॥ १३ ॥

हे कमसिन भोली-भाली नाज़नी ! तैने ऐसी गूज़बकी तीर-न्दाज़ी किससे सीखी, जो बिना तीर चलाये ही, केवल कमान की डोरी छूकर ही, तू मर्द के दिल को छेद देती है ?

उस्ताद जौक ने कहा हैं :—

तुफंगा तीर तो जाहिर, न था कुछ पास क़ातिलके ।

इलाही फिर जो दिल पर, ताकने मारा तो क्या मारा ? ॥

as ears ; Dwiṣa—means Brahmins as also teeth ; Mukta means liberated souls as well as pearls. In the body of a beautiful girl we find the hairs well bound up—this is control ; eyes stretched up to ears—and the other meaning is it goes beyond the knowledge of Vedas ; mouth full of beautiful teeth—the other meaning is that venerable Brahmins are connected with it ; breast adorned by pearls—the other meaning is even the liberated souls are connected with it. Hence taking one side of the meaning—we find that woman whose body is thus full of signs of calmness is also very attractive and disturbing to us.

  • गुण—(१) चतुरार्द्ध, (२) रत्नस्त्री, जिससे धनुषके दोनों कोटि बांधे जाते हैं ।

( ३५ )

बड़ा आश्चर्य है, उसके पास न तीर था न पिस्तौल । पर हे परमेश्वर, उसने मेरे दिल पर फिर क्या चीज़ ताककर मारी, जो मैं लौट-पोट हो गया ?

मौलाना हाजी कहते हैं :—

था कुछ न कुछ, कि फ़ाँस सी इक दिल में चुम गई ।

माना कि उसके हाथमें, तीरो सनां न था ॥

महाकवि गालिब कहते हैं :—

इस सादगी पै कौन न मरजाये ऐ खुदा ! ।

लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं ॥

दोहा ।

अति अद्भुत कमनैत तिय, करमें बाण न लेत ।

देखो यह विपरीत गति, गुण ते बाँधे देत ॥ १३ ॥

सार—स्त्रियों के पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं रहता, वे केवल अपनी चतुराईसे ही पुरुषोंको वशमें कर लेती हैं, यह अचम्भेकी बात है ।

13. O beautiful girl, how nice is your skilfulness in the use of the bow, because you do not pierce the heart of men by arrows but by only bending the bow ( in other words, by your charms only ).

( ३६ )

सति प्रदीपे सत्यमौ सत्सु ताराश्वीन्दुषु ।

विना मे मृगशावाच्या तमोभ्रुतभिदं जगत् ॥१४॥

यद्यपि दीपक, अग्नि, तारे, सूर्य और चन्द्रमा सभी प्रकाशमान पदार्थ मौजूद हैं, पर मुझे एक मृगनयनी सुन्दरी बिना सारा जगत् अन्धकारपूर्ण दीखता है ॥१४॥

खुलासा—यद्यपि दीपक-चिराग, आग, सितारे, सूरज और चाँद—जैसे सदा थे, वैसे ही अब भी हैं ; ये जिस तरह पहले अन्धकार नाश करके उजियाला करते थे, उसी तरह अब भी कर रहे हैं ; परन्तु मुझे तो एक मृगनयनी प्यारी बिना सर्वत्र अँधेरा-ही-अँधेरा नज़र आता है । तात्पर्य यह है कि, घरमें सब कुछ होने पर भी, एक स्त्री बिना घर शून्य निर्जन बनसा मालूम होता है ।

पण्डितेन्द्र महाराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास” में कहते हैं :—

हरिणीश्वेनया यत्र गृहिणी न विलोक्यते ।

सेवितं सर्वं सम्यदभिरपि तद्भवनं वनम् ॥

जिस घरमें मृगनयनी गृहिणी नहीं दीखती, वह घर—सर्व सम्पत्तिस्मपन्न होने पर भी—वन है ।

सब है, घरमें चाहे पुत्र हों, पुत्र-बधुएँ हों, नौकर-चाकर और दास-दासी हों, हाथी-घोड़े और रथ-पालकी प्रभृति सभी

( ३७ )

ऐश्वर्य्यके सामान हों ; पर एक हिरनीके से नेत्रों वाली प्यारी न हो ; तो वह घर, सर्व सम्पदायें होने पर भी, निर्जन बनकी तरह शून्य है। संसारमें घर-गृहस्थीका सच्चा आनन्द सुन्दरी प्राणप्यारीसे ही है। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

मे भी है मीना भी है, सागिर भी है साकी नहीं ।

दिलमें आता है, लगादे आग मैखानेको हम ॥

इस समय सारे कामोद्दीपन करनेवाले ऐश-आरामके सामान—सुरा सुराही आदि मौजूद हैं ; पर है क्या नहीं ? केवल वही, जिसके लिये इन सब वस्तुओंकी आवश्यकता हुई। इससे अब होली ऐसी बुरी जान पड़ती है कि, जी चाहता है कि, इसमें आग लगा दूँ ; अर्थात् सब कुछ मौजूद है, पर एक नाज़नी नहीं है ; इससे मुझे सब बुरे लगते हैं। स्त्री बिना सारे आनन्द फीके हैं।

जिन्होंने स्त्रीका सुख नहीं भोगा है, जिन्हें स्त्री रत्नकी कीमत नहीं मालूम, जो नारी-रहस्यको नहीं जानते, जो स्त्रीको पैरकी जूती-मात्र समझते हैं, वे हमारी इन बातोंको पढ़ कर हँसेंगे—हमें स्त्री-दास या स्त्रैण कहेंगे। जो जिसकी कीमत जानता है, वही उसकी कदर करता है। मोती बहुमूल्य होता है, पर भीलनी उसे पाकर फँक देती है और जौहरी उसे हृदयसे लगा लेता है। जो जिसके रहस्यको जानता है, वही उसके सम्बन्धमें कुछ कह सकता है। मौलाना हाली ठीक ही कहते हैं :—

( ३८ )

हकीकत महर्षि असार से पूछ ।

मजा अंगूर का मैस्वर से पूछ ॥

दिले महजूर से सुन लज्जते वस्त्र ।

निशाने आकिषत बीमार से पूछ ॥

जो सब तरहकी बातें जानता है, तत्त्वज्ञ या रहस्यज्ञ है, उसीसे तत्त्वकी बात पूछनी चाहिये । अंगूरमें क्या मजा है, यह अंगूरी शराब पीने वालेसे पूछना चाहिये । वही उस विषयमें कह सकता है ।

जिस दिलने माधुर्यासे मिलनेके लिए अनेक तरहकी तकलीफें उठाई हैं, उसीसे वस्त्रका मजा या मिलनेके आनन्दकी बात पूछनी चाहिये । जिस रोगीने अनेक तरहके कष्ट उठाकर आरोग्य लाभ किया है, वही तन्दुरुस्तीकी कीमत जानता है ।

हमें भी स्त्रियोंके सम्बन्धमें थोड़ा-बहुत अनुभव है, हमने उनके संयोग और वियोग दोनों ही देखे हैं, उनकी सेवा-शुश्रूषाओंसे सुखी और उनकी मंत्रणाओंसे लाभान्वित हुए हैं, अतः हम भी जोरके साथ कहते हैं :—निश्चय ही स्त्री-बिना संसारके सभी सुखैश्वर्य अलौने—फीके और बेमज़े हैं । स्त्री ईश्वरके संसार रूपी बगीचेका सर्वोत्तम फूल है । उसीसे ईश्वरकी सृष्टिकी शोभा है । अगर स्त्री न होती, तो यह जगत् अन्धकारपूर्ण, निर्जन और भयानक होता । जिस करोड़पतिके घरमें सती स्त्री नहीं है, उसका घर साक्षात् श्मशान है और जिस दक्षिणीके घरमें पतिव्रता, लज्जावती और मधुरभाषिणी

( ३६ )

स्त्री है, उसका घर नन्दन कानन है। देखिये, संसारके प्राचीन और अर्वाचीन विद्वानों और महापुरुषोंने नारां जातिके सम्बन्धमें क्या कहा है :—

वी-महिमा ।

—○○—

हे स्त्री ! स्वर्गमें क्याहै, जो तुम्हमें नहीं ? अद्भुत ज्योति, सत्य, अनन्त सुख और अनादि प्रेम—सभी तुम्हमें हैं। आट् वे ।

स्त्री इस संसारका रमणीक प्रदेश है। इस प्रदेशमें विश्वास-तत्त्व लहलहा रहे हैं, आनन्दके फूल खिल रहे हैं, हर्ष-विहग कलरव कर रहे हैं तथा निर्वृत्ति और विश्वासकी नदियाँ वह रही हैं। यहाँ शोरोगुलका नाम भी नहीं है। लार्ड वैरन ।

स्त्री पुरुषका आध्या श्रेष्ठ भाग है* । पुरुष जबतक शादी नहीं करता, अधूरा रहता है। स्त्री एक तरहका तीर्थ है। विद्याता हमें उसकी यात्राको भेजता है। स्त्री पुण्यात्माके लिए स्वर्ग है और दृष्टके लिए स्वर्ग-सोपानका पहला पद। स्त्री एक खज़ाना है। जिस पुरुषके पास यह खज़ाना नहीं, वह अपने कर्जको अदा कर नहीं सकता, यानी अपने पितरोंका ऋण चुका नहीं सकता। शर्ले ।

ॐ हमारे भगवान् मनु ने भी यही बात कही है। उन्होंने कहा है कि, विद्याता ब्रह्मने अपने शरीरके दो भागकर, बाधे अंशसे पुरुष और बाधेसे स्त्रीको पैदा किया।

पुरुषका नाम मनु और स्त्रीका नाम शतरुपा हुआ। अंगरेजों और

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हे स्त्री ! तू रातका तारा और प्रातःकालका हीरा है । तू ओसका कृतारा है, जिससे काँटेका मुँह भी मोतियोंसे भर जाता है । वह रात अँधेरी और वह दिन फीका मालूम होता है, जबकि तेरी आँखोंकी रोशनी दिलको ठण्डा नहीं करती । हृदय का घाव बिना तेरे मधुर ओठोंके अच्छा हो नहीं सकता । विपत्तिमें तू सहायक होती है ।

हे अवला ! तेरे शरीर और आत्मामें एक जादू है । जिधर हम जाते हैं उधर तेरी ज्योति हमें राह दिखाती है । चाहे गरम-से-गरम देश हो और चाहे शीतल-से-शीतल देश हो, अगर तू वहाँ मौजूद है, तो वहाँ भी आनन्द ही है । टामस मोर ।

सलाह या मशवराः करनेके लिए खी पुरुषसे अच्छी है । जब कभी किसी मामूली सी बातसे मेरा दिल घबरा उठता है, तब खीकी मदद मिलनेसे मुझे पसा मालूम होता है, मानो यह बात ऐसी नहीं है, जिससे मुझे दुखी होना पड़े । ( खी सलाह देनेमें

मुसलमानोंके यहाँ भी लिखा है कि, पहले आदम पैदा हुआ और फिर हून्वा ( Adam and Eve ) । मनुसे मनुष्य शब्द और आदमसे आदमी शब्द बना । संसारका पहला पुरुष मनु या आदम था और पहली स्त्री शतरूपा या हून्वा थी । इन्हींसे जगत् को उत्पत्ति हुई । जबतक आदमको हून्वा न मिली, तब तक उसे बागे अदन या नन्दनकानन उजाड़से भी डरा मालूम होता था ।

व्यास-संहितामें लिखा है—जब तक विवाह नहीं होता, तब तक पुरुष अर्क देह रहता है । विवाह होनेके बाद पुरुष पूर्णदेह होता है ।

( ५१ )

इतनी होशियार क्यों ? ) पुरुषको हर चीज़ से काम पड़ता है, उसे बहुतसे भंभटोंका सामना करना पड़ता है, इसलिए वह छोटी-छोटी बातोंसे घबरा उठता है ; लेकिन स्त्री इतने भंभटों से सम्बन्ध नहीं रखती, वह तटस्थ पुरुषकी तरह हरेक बातको बाहरसे देखती रहती और उनके यथार्थ मूल्यको जानती है ; इसीसे वह उल्लभनको सहजमें सुलझा सकती है। शास्त्रोंके पढ़नेमें वह मर्दों से कम हो तो हो, पर उसकी नैसर्गिक प्रज्ञा—स्वाभाविक बुद्धि अत्यन्त सूक्ष्म होती है। जेम्स नार्थ कोट ।

पतिव्रता स्त्री ईश्वरकी सृष्टिकी उत्तम-से-उत्तम औषधियोंमें सर्वश्रेष्ठ है। वह पतिके लिए देवता और सारे गुणोंकी मूर्ति है। वह पतिका बहुमूल्य हीरा और जवाहिरातका खज़ाना है। उसकी आवाज़में मधुरता और उसके मुस्करानेमें आनन्द है। उसकी भुजा उसकी शरण और उसकी तन्दुरुस्तीकी दवा है। उसकी मिह्नत उसकी दौलत और उसकी किफायतशारी उसका लायक मुन्तज़िम है। उसके होठ उसके मंत्रों और उसकी प्रार्थना उसकी सर्वोत्तम सहायका है। जर्मी टेलर ।

तुमने कई बार देखा होगा कि, जिस सवालको तुम घण्टोंमें भी हल नहीं कर सकते, उसे औरतें क्षणभरमें हल कर देती हैं और उनका जवाब निहायत दृस्त और सही होता है।

निस्सन्देह सारे संसारका आनन्द भार्या शब्दमें है। दिनभरके काम-धन्धों और भगड़ोंसे निपटकर जब मर्द रातको घरमें आता है, तब उस थके हुएको अग्न जलती हुई मिलती है, खाना तैयार

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रहता है और प्रेममयी पत्नी हँसती हुई उसका स्वागत या इस्त्क-बाल करती है। धर्म आनन्दकी ज्योति फैल जाती है। नौबेलिस।

हे स्त्री! दिलकी बेहोशीको रोकना तेरा ही काम है। जब आश्वासनकी ज़रा भी उम्मीद नहीं रहती, तब दुःखको बँटाना तेरा ही काम है। संसारकी शोभा और ज़िन्दगीका मज़ा तुझमें ही है। संसारकी भलाई ही तेरा काम है और उसी परोपकारमें तुझे प्रसन्नता है। —ग्राह्य।

स्त्रीकी दृष्टिमें ईश्वरीय प्रकाश है। वह एक मीठी नदी है। उसीमें पति अपनी प्यास बुझा सकता और अपने शोक-दुःखोंसे छुटकारा पा सकता है। पतिके दुःखमें स्त्री ही एकमात्र शरण और आनन्दका स्थान है। —जरमिटेल्।

पुरुषके जीवनका सोता स्त्रीकी छाती है। वही उसे बात करना सिखाती और वही उसके आँसू पोंछती है। बुरे समय में जब सब उसे छोड़कर अलग हट जाते हैं, तब वही उसकी स्वर लेती और गरम निःश्वासोंको शीतल करती है। लाई बैरन।

पतिके लिए स्त्रीके सब प्रेमसे ज़ियादा कुछ भी प्यारा नहीं है। पृथ्वी पर स्त्रीके सच्चे और दृढ़ प्रेमसे बढ़कर सुखदायी चीज़ नहीं। ईश्वरको भी मधुरभाषिणी और पवित्र स्त्रीसे अधिक कोई चीज़ प्यारी नहीं। —राबर्ट द ब्रून।

प्रिये! आओ। मेरे पास बैठ जाओ, क्योंकि प्रातःकालीन प्रकाशसे ईश्वरीय ज्योति निकल रही है। प्रार्थना करनेका समय है, पर तुम बिना मुझसे प्रार्थना नहीं होती। आओ, दोनों

( ४३ )

मिलकर प्रार्थना करें। तुम ईश्वरसे मेरा हाल कहना और मैं तुम्हारा कहूँगा।

—पल्लिन कनिंघम।

ईश्वर न करे, उसके पतिकाँ हार हो अथवा वह बीमार हो जावे। पराजित पतिकाँ वह धीरज देगी और रोगार्त्त की सेवा-शुश्रूषा करेगी। अगर पति नाराज़ हो जायगा, तो वह नाराज़ न होगी; उल्टे उसका हँसता हुआ चेहरा उसके शोकको हरेगा। वह ज़िन्दगी-भर उसकी ख़िदमत करेगी। अगर वह पहले मर जायगा, तो वह उसके कुटुम्बकी ख़बर लेगी, उसके मानको स्थिर और इज़्जतको कायम रखेगी। उसके चेहरेसे बुद्धि बरसती है और उसकी जीभसे मिह्रबानी टपकती है।

—बिशप हारन।

हे स्त्री ! तू धन्य है ! तेरा करुणामय हाथ विपद्को भया-नक बनने में भी आनन्दके बाग लगाता है। जो नीच तुम्हें केवल क्षण-भर दिल खुश करनेका खिलौना समझता है, उसका दिल मैला है—वह तेरे गुणोंको नहीं जानता।

—ब्रैसफर्ड।

संसार-वाटिकामें स्त्री सबसे अच्छा फूल है। उसका लालित्य, उसकी सुगन्ध और मनोहरता विचित्र है।

—थैकरे।

समुद्रके भीतरका वज़ाना इतना महँगा नहीं, जितना कि वह आनन्द जो स्त्रीसे पुरुषको मिलता है।

मिल्टन।

सुशीला स्त्री पतिका परम स्नेही मित्र है। उसकी सच्चाई इश्वरीय नियमकी तरह अटल है। उसकी पवित्रता देवी प्रकाश की भाँति निर्दोष है। पति मौजूद रहे या नामौजूद रहे, उसे

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अपनी स्त्री पर पूरा भरोसा रहता है कि, उसकी प्यारी चीज़ोंको, खासकर उसकी सबसे प्यारी चीज़ अपने तईं, वह दक्षित रखेगी—जाने न देगी। वह अपने ऐसे विश्वासी मंत्रीके भरोसे बेफिक और निर्भय होकर काम पर जाता है। वह अपने शत्रुओंमें फिज़ूल-खर्ची नहीं करती—सभी कामोंमें किफायतसे काम लेती है। पतिको जिस चीज़की ज़रूरत होती है, उसे ही ठाकर हाज़िर कर देती है। सदा उसका भला चाहती है। उसका रस्ती-भर नुकसान होने नहीं देती। कभी भी उसे शोकार्त् या रज्जीदा होने नहीं देती। अगर पतिको शोक होता है तो हर लेती है और अपना विश्वास बढ़ाती रहती है। —बिशप होएन।

संसारमें कोई भी चीज़ सुन्दरी, पवित्रात्मा, विनोदशीला और नारीसे अधिक मनोहर नहीं। —हण्ट।

स्त्रीकी आँखोंमें ईश्वरने दीपक जला रखे हैं, ताकि भूले-भटके पुरुषोंको उन चिरागोंकी रोशनीमें स्वर्गकी राह दीख जावे। —विल्किंस।

मामूली नौजवानोंको स्त्रियोंमें कोई गुण न दीखता हो तो न दीखता हो, पर मेरी नज़रमें तो वह देवीसे कम नहीं।

—वासिङ्गटन आयर्विंग

जब तक पुरुष पर आकृत्त नहीं आती, तब तक उसे अपनी स्त्रीके गुणोंका पता नहीं लगता। विपद् आने पर उसे मालूम हो जाता है कि, उसकी स्त्री सखी देवी है। —बेलजर

कण्टकपूर्ण शाखाको फूल सुन्दर बना देते हैं और

( ४५ )

गरीब-से-गरीब घरको लज्जावती युवती स्वर्ग बना देती है ।

—गोल्डस्मिथ ।

प्रियदर्शनता, विनोदशीलता, प्रज्ञा और प्रभामें पुरुष स्त्रीकी बराबरी नहीं कर सकता । वह विपद्में पड़े हुए पतिकी उदासीको दूर करती, थके हुए की थकान दूर करती और अपने मुस्कराते हुए मुँहसे सारे घरमें आनन्दके फूल बरसाती है । —गिज़बोर्न ।

जब तक आदमकी शादी नहीं हुई, स्वर्ग उसके लिए काँटोंका घर था । देवताओंका गाना, पक्षियोंका चहचहाना, फूलोंका हँसना और सवेरेकी सुहावनी हवाके भोंके उसे बेमज़े मालूम होते थे । वह उदास फिरा करता था । ज्योंही हवा आई, उसका सारा दुःख दूर हो गया और नन्दन कानन आनन्द-भवन हो गया । —कैम्बेल ।

अगर संसारमें खी न हो, तो संसार इस तरह सूता और भयानक दीखने लगे जिस तरह वह मेला, जिसमें न तो खरीद-फरोख्त-कय-विक्रय और लेन-देन होता है और न कोई विल-बह-लानेका सामान होता है । स्त्रीकी मुस्कराहटके बिना सृष्टि उसी तरह निष्फल और व्यर्थ हो जावे, जिस तरह जीव बिना देह, फलफूल बिना वृक्ष, किलेदार बिना किला, नींव बिना महल और पतवार बिना नाव । अगर स्त्री नहीं तो प्रेम नहीं और प्रेम नहीं तो आनन्द नहीं । संसारमें जो सुख है वह स्त्रियोंके ही प्रतापसे है । अगर संसारमें कोई प्रकासकी रेखा है, तो वह इन्हींसे है ।

( ४६ )

कुत्ता नमकहलाह होता है, स्त्री उससे भी ज़ियादा नमक-हलाह होती है। वह नावकी पतवारसे ज़ियादा पकी और महलके सिन्तू या षंभेसे भी अधिक मज़बूत है। नावके टूट जानेवालोंको किनारा जैसा प्यारा होता है, पुरुषके लिए स्त्री वैसी ही प्यारी है। वह सन्तानसे भी ज़ियादा प्यारी और रातके बाद होनेवाले प्रभातसे भी अधिक प्रकाशमान है। रेगिस्तान या रेतीले जङ्गलोंमें सफर करनेवाले प्यासोंको पानी जैसा प्यारा और मीठा लगता है, पुरुषके लिए स्त्री उससे भी अधिक मीठी और आनन्द-दायिनी है। —यंग

स्त्रियाँ संसारमें देवताओंकी तरह घूमती हैं। स्वार्थपरता या खुशहाज़ीका तो उनमें नाम भी नहीं। प्रत्युपकारका उन्हें ध्यान भी नहीं। स्त्री पर चाहे जितना भार डालो, हैरान करो, अत्याचार करो, वह न बोलेगी। ऊँट तो ज़ियादा बोभ होनेसे चीखता और बलबलाता है, पर स्त्री चूँ नहीं करती। हे ईश्वर ! तूने स्त्रीको पुरुषका योग्य साथी बनाया। सब पूछो, तो ईश्वर की सृष्टिमें स्त्री ही सर्वश्रेष्ठ है। उसके चेहरेसे गौरव टपकता एवं सम्मान और स्नेह उसके शासनमें चलते हैं। तूने अपनी अदभुत शक्तिसे उसे पुरुषोंके दिल कोमल करनेको बनाया, ताकि पुरुषोंके दिल उसे देखकर तरे भक्तिभावसे पूर्ण हो जावें। मिस बैनट।

विपद्की चोटोंसे जब हम बेवस हो जाते हैं और हमारे बन्धु-बान्धव हमें त्याग देते हैं, तब स्त्री ही हमारे दुःखका कारण खाजती है। उसकी मुस्कराहटसे हृदय शीतल हो जाता है।

( ४७ )

उसकी मीठी आवाज़ हृदयके तापको मिटा देती और सुखे हृदय को फिरसे हराभरा और तरोताज़ा कर देती है । —गैली नाइट ।

स्त्रीकी मर्यादा उसके अपरिचित रहनेमें, उसकी प्रभा उसके पतिके सम्मानमें और उसका सुख उसके कुटुम्बके मङ्गल या कल्याणमें है । —कसो ।

देखा गया है कि, प्रकृतिने नारियोंको स्वयं चिन्ता और कृश भोगनेको पैदा नहीं किया । उसने उन्हें हमारी चिन्ताओंके काम करनेको बनाया है । —गोल्डसिथ ।

स्त्रियाँ जिन्होंने अपना विश्वास खो दिया है, उन फरिश्तोंके समान हैं जिन्होंने अपने पंख गँवा दिये हैं । डाक्टर वाल्टर स्मिथ ।

जॉय नामक एक पाश्चात्य चिन्ता कहते हैं :—“But for women, our life would be without help at the outset, without pleasure in its course and without consolation at the end” अगर स्त्रियाँ न हों, तो पुरुष की बाल्यावस्था असहाय और यौवन आनन्द-विहीन हो जाय तथा बुढ़ापेमें कोई आश्वासन देनेवाला न हो । मतलब यह है कि, पुरुषको हर अवस्थामें स्त्रीकी ऊहरत है । ठीक है, जिसके एक सती साध्वी नारी हो, और चाहे कुछभी न हो, वह परम सुखी है ।

गोथे महोदय कहते हैं—“A hearth of one's own and a good wife are worth gold and pearls.” निजका घर और साध्वी स्त्री सोने और मोतियोंके बराबर हैं ।

बेकन महोदय भी कहते हैं :—“Wives are young

( ४८ )

men's mistresses, companion for middle age, and old men's nurses" स्त्रियां युवावस्थामे पत्नियोंका, मध्यावस्था में सहचारिणियोंका और बुढ़ापेमें धायोंका काम देती हैं ।

स्पेनवालोंमें एक कहावत है—“To him who has a good wife, no evil can come which he cannot bear.” जिस पुरुषके भली स्त्री है, उस पर ऐसी कोई विपत्ति नहीं आ सकती, जिसे वह सह न सके ।

बहुत से अनजान कहेंगे कि, यूरोपियन लोग तो स्त्रियोंके गुलाम होते ही हैं । उनकी गाई स्त्री-महिमा हमारे किस मस्तरफ की ? ऐसोके सन्तोषके लिए, हम अपने हिन्दू-शास्त्रों से ही चन्द श्लोक उद्धृत करते हैं । वे आँखें खोलकर देखें, हमारे यहाँ ही नारी जातिकी कैसी महिमा गाई गई है :—

महाभारतके आदि पर्वमें लिखा है :—

अर्द्धे भायां मनुष्यस्य, भायां श्रेष्ठतमः सखा ।

भायां मूलं त्रिवर्गस्य, भायां मूलं तरिष्यतः ॥

सखायः प्रविक्तेषु, भवन्त्येताः प्रियम्बदाः ।

पितरो धर्मकार्येषु, भवन्त्यातस्य मातरः ॥

भायां वन्तः क्रियावन्तः, समायां गृहमेधिनः ।

भायां वन्तः प्रमोदन्ते, भायां वन्तः श्रियान्विताः ॥

कान्तोरुषपि विश्रामो, जनस्याध्वनिकस्य वै ।

यः सदारः स विश्वास्यस्तस्माद्वाराः परागतिः ॥

( ४६ )

संसरन्तमपि प्रेतं विषमेवेकपातितं ।

भायैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता ॥

प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं श्रेयं प्रतीक्षते ।

पूर्वं मृतं च भर्तारं पश्चात्साध्यनुगच्छति ॥

दक्षमाना मनोदुःखैव्याधिभिरश्वातुरा नराः ।

आह्लादन्ते स्वेषु दारेषु धर्मातोऽलिलेखिव ॥

स्त्री पुरुषकी अर्द्धाङ्गी है । स्त्री पुरुषका सर्वोत्तम मित्र है । स्त्री धर्म, अर्थ और काम की जड़ है । स्त्री भवसागरसे पार होनेवाले मुमुक्षुओंकी मूल है ।

यह मधुभ्राविणी आफ़तकी जगह मित्र, धर्मके कामोंमें पिता और दुःख आपड़ने पर माँ बन जाती है ।

जिसके स्त्री है वही क्रियावान् है, जिसके स्त्री है वही गृहस्थ है, जिसके स्त्री है वही सुख पाता है और जिसके स्त्री है वही लक्ष्मीवान् है ।

वनभूमिमें स्त्री विश्राम या आरामकी जगह है ; जिसके स्त्री है वही विश्वज्ञासयोग्य है ; इसलिये स्त्री परम गति है ।

चाहे पति आवागमन या जन्ममरणके चक्रमें फँसा हो, चाहे मर गया हो और चाहे किसी दुर्गम स्थानमें पड़ा हो, स्त्री ही है जो उसके पीछे-पीछे चलती है ।

पतिपरायणा स्त्री अगर पहले मर जाती है, तो (स्वर्गमें जाकर)

( ५० )

पतिकी राह देखती है । अगर पति पहले मर जाता है, तो सती उसके पीछे-पीछे जाती है ।

मानसिक क्लेशोंसे जल्दते हुए और रोग-पीड़ित पुरुष अपनी स्त्रियोंसे उतने ही सुखी होते हैं, जितना कि सूरज की किरणोंसे तपा हुआ पुरुष पानी पीनेसे आनन्दित होता है ।

स्त्री पुरुषका आधा अङ्ग है ; उसके बिना पुरुष अधूरा है । इस विषयमें “मनु-संहिता”में लिखा है :—

द्विधा कृत्वात्मनो देहम्, अर्द्धेन पुरुषोऽभवत् ।

अर्द्धेन नारी तस्यांश, विराजमसृजत् प्रभुः ॥

ब्रह्माने अपने शरीरके दो हिस्से करके, आधेसे पुरुष और आधेसे स्त्री पैदा की ।

“व्यास-संहिता”में भी लिखा है :—

पाटितोऽयं द्विधाः पूर्वम्, एक देहः स्वयम्भुवा ।

पतयोऽर्द्धेन चार्द्धेन, पातन्योऽमुवाचितिश्रुतिः ।

यावन्न विन्दते जाया, तावदर्द्धं भवेत्पुमान् ॥

ब्रह्माने एक देहके दो टुकड़े करके, आधे भागसे पति और दूसरे आधेसे पत्नियाँ पैदा कीं । इसका प्रमाण वेदमें है । जब तक विवाह नहीं होता, तबतक पुरुष ‘अर्द्ध’ देह रहता है—शादी होनेके बाद पुरुष ‘पूर्णदेह’ होता है ।

“मनुस्मृति”में ही लिखा है :—

( ५१ )

न निष्कय विसर्गाभ्याम् भर्तुर्माभ्यां विमुच्यते ।

एवं धर्मं विजानीयः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥

पति पत्नीका सम्बन्ध दान, बिक्री या त्याग द्वारा भी नहीं टूट सकता । यह नियम पूर्वकालसे विद्यमाना चलाया है ।

यदि रामा यदि चरमा, यदि तनयो विनयगुणोपतः ।

तनयेतनयोत्पत्तिः, सुरवरनगरे किमधिकम् ? ॥

अगर स्त्री है, अगर लक्ष्मी है, अगर शीलवान पुत्र है और पुत्रके पुत्र हो गया है, तो फिर स्वर्गमें इससे अधिक क्या है ?

नीतिकारोंने छः सुख प्रधान कहे हैं । उनमेंसे स्त्रीका सुख भी एक है । किसी विद्वान्ने कहा है :—

अर्थगमो नित्यमरोगिता च ।

प्रिया च भाभ्यां प्रियवादिनी च ।

वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या ।

पद्म जीवलोकस्य सुखानि राजन् ! ॥

हे राजन् ! धनकी आमद, सदा आरोग्य रहना, प्यारी और प्रियवादिनी स्त्री, वशमें रहनेवाला पुत्र और फल देनेवाली विद्या — ये छे संसारके सुख हैं ।

स्त्रीका काम पुरुषके बिना और पुरुषका काम स्त्रीके बिना चल नहीं सकता । स्त्री और पुरुष एक दूसरे पर निर्भर करते हैं । एक दूसरेके बिना अधूरा है । दोनोंका उद्देश एक ही