शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 49, कुल 544 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३६ )
सति प्रदीपे सत्यमौ सत्सु ताराश्वीन्दुषु ।
विना मे मृगशावाच्या तमोभ्रुतभिदं जगत् ॥१४॥
यद्यपि दीपक, अग्नि, तारे, सूर्य और चन्द्रमा सभी प्रकाशमान पदार्थ मौजूद हैं, पर मुझे एक मृगनयनी सुन्दरी बिना सारा जगत् अन्धकारपूर्ण दीखता है ॥१४॥
खुलासा—यद्यपि दीपक-चिराग, आग, सितारे, सूरज और चाँद—जैसे सदा थे, वैसे ही अब भी हैं ; ये जिस तरह पहले अन्धकार नाश करके उजियाला करते थे, उसी तरह अब भी कर रहे हैं ; परन्तु मुझे तो एक मृगनयनी प्यारी बिना सर्वत्र अँधेरा-ही-अँधेरा नज़र आता है । तात्पर्य यह है कि, घरमें सब कुछ होने पर भी, एक स्त्री बिना घर शून्य निर्जन बनसा मालूम होता है ।
पण्डितेन्द्र महाराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास” में कहते हैं :—
हरिणीश्वेनया यत्र गृहिणी न विलोक्यते ।
सेवितं सर्वं सम्यदभिरपि तद्भवनं वनम् ॥
जिस घरमें मृगनयनी गृहिणी नहीं दीखती, वह घर—सर्व सम्पत्तिस्मपन्न होने पर भी—वन है ।
सब है, घरमें चाहे पुत्र हों, पुत्र-बधुएँ हों, नौकर-चाकर और दास-दासी हों, हाथी-घोड़े और रथ-पालकी प्रभृति सभी