भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

( ३७ )

ऐश्वर्य्यके सामान हों ; पर एक हिरनीके से नेत्रों वाली प्यारी न हो ; तो वह घर, सर्व सम्पदायें होने पर भी, निर्जन बनकी तरह शून्य है। संसारमें घर-गृहस्थीका सच्चा आनन्द सुन्दरी प्राणप्यारीसे ही है। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

मे भी है मीना भी है, सागिर भी है साकी नहीं ।

दिलमें आता है, लगादे आग मैखानेको हम ॥

इस समय सारे कामोद्दीपन करनेवाले ऐश-आरामके सामान—सुरा सुराही आदि मौजूद हैं ; पर है क्या नहीं ? केवल वही, जिसके लिये इन सब वस्तुओंकी आवश्यकता हुई। इससे अब होली ऐसी बुरी जान पड़ती है कि, जी चाहता है कि, इसमें आग लगा दूँ ; अर्थात् सब कुछ मौजूद है, पर एक नाज़नी नहीं है ; इससे मुझे सब बुरे लगते हैं। स्त्री बिना सारे आनन्द फीके हैं।

जिन्होंने स्त्रीका सुख नहीं भोगा है, जिन्हें स्त्री रत्नकी कीमत नहीं मालूम, जो नारी-रहस्यको नहीं जानते, जो स्त्रीको पैरकी जूती-मात्र समझते हैं, वे हमारी इन बातोंको पढ़ कर हँसेंगे—हमें स्त्री-दास या स्त्रैण कहेंगे। जो जिसकी कीमत जानता है, वही उसकी कदर करता है। मोती बहुमूल्य होता है, पर भीलनी उसे पाकर फँक देती है और जौहरी उसे हृदयसे लगा लेता है। जो जिसके रहस्यको जानता है, वही उसके सम्बन्धमें कुछ कह सकता है। मौलाना हाली ठीक ही कहते हैं :—

शृंगार शतक · पृष्ठ 50, कुल 544 में से · BharatKosha