भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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संसरन्तमपि प्रेतं विषमेवेकपातितं ।

भायैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता ॥

प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं श्रेयं प्रतीक्षते ।

पूर्वं मृतं च भर्तारं पश्चात्साध्यनुगच्छति ॥

दक्षमाना मनोदुःखैव्याधिभिरश्वातुरा नराः ।

आह्लादन्ते स्वेषु दारेषु धर्मातोऽलिलेखिव ॥

स्त्री पुरुषकी अर्द्धाङ्गी है । स्त्री पुरुषका सर्वोत्तम मित्र है । स्त्री धर्म, अर्थ और काम की जड़ है । स्त्री भवसागरसे पार होनेवाले मुमुक्षुओंकी मूल है ।

यह मधुभ्राविणी आफ़तकी जगह मित्र, धर्मके कामोंमें पिता और दुःख आपड़ने पर माँ बन जाती है ।

जिसके स्त्री है वही क्रियावान् है, जिसके स्त्री है वही गृहस्थ है, जिसके स्त्री है वही सुख पाता है और जिसके स्त्री है वही लक्ष्मीवान् है ।

वनभूमिमें स्त्री विश्राम या आरामकी जगह है ; जिसके स्त्री है वही विश्वज्ञासयोग्य है ; इसलिये स्त्री परम गति है ।

चाहे पति आवागमन या जन्ममरणके चक्रमें फँसा हो, चाहे मर गया हो और चाहे किसी दुर्गम स्थानमें पड़ा हो, स्त्री ही है जो उसके पीछे-पीछे चलती है ।

पतिपरायणा स्त्री अगर पहले मर जाती है, तो (स्वर्गमें जाकर)

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