शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 544 में से
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संसरन्तमपि प्रेतं विषमेवेकपातितं ।
भायैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता ॥
प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं श्रेयं प्रतीक्षते ।
पूर्वं मृतं च भर्तारं पश्चात्साध्यनुगच्छति ॥
दक्षमाना मनोदुःखैव्याधिभिरश्वातुरा नराः ।
आह्लादन्ते स्वेषु दारेषु धर्मातोऽलिलेखिव ॥
स्त्री पुरुषकी अर्द्धाङ्गी है । स्त्री पुरुषका सर्वोत्तम मित्र है । स्त्री धर्म, अर्थ और काम की जड़ है । स्त्री भवसागरसे पार होनेवाले मुमुक्षुओंकी मूल है ।
यह मधुभ्राविणी आफ़तकी जगह मित्र, धर्मके कामोंमें पिता और दुःख आपड़ने पर माँ बन जाती है ।
जिसके स्त्री है वही क्रियावान् है, जिसके स्त्री है वही गृहस्थ है, जिसके स्त्री है वही सुख पाता है और जिसके स्त्री है वही लक्ष्मीवान् है ।
वनभूमिमें स्त्री विश्राम या आरामकी जगह है ; जिसके स्त्री है वही विश्वज्ञासयोग्य है ; इसलिये स्त्री परम गति है ।
चाहे पति आवागमन या जन्ममरणके चक्रमें फँसा हो, चाहे मर गया हो और चाहे किसी दुर्गम स्थानमें पड़ा हो, स्त्री ही है जो उसके पीछे-पीछे चलती है ।
पतिपरायणा स्त्री अगर पहले मर जाती है, तो (स्वर्गमें जाकर)
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