भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पतिकी राह देखती है । अगर पति पहले मर जाता है, तो सती उसके पीछे-पीछे जाती है ।

मानसिक क्लेशोंसे जल्दते हुए और रोग-पीड़ित पुरुष अपनी स्त्रियोंसे उतने ही सुखी होते हैं, जितना कि सूरज की किरणोंसे तपा हुआ पुरुष पानी पीनेसे आनन्दित होता है ।

स्त्री पुरुषका आधा अङ्ग है ; उसके बिना पुरुष अधूरा है । इस विषयमें “मनु-संहिता”में लिखा है :—

द्विधा कृत्वात्मनो देहम्, अर्द्धेन पुरुषोऽभवत् ।

अर्द्धेन नारी तस्यांश, विराजमसृजत् प्रभुः ॥

ब्रह्माने अपने शरीरके दो हिस्से करके, आधेसे पुरुष और आधेसे स्त्री पैदा की ।

“व्यास-संहिता”में भी लिखा है :—

पाटितोऽयं द्विधाः पूर्वम्, एक देहः स्वयम्भुवा ।

पतयोऽर्द्धेन चार्द्धेन, पातन्योऽमुवाचितिश्रुतिः ।

यावन्न विन्दते जाया, तावदर्द्धं भवेत्पुमान् ॥

ब्रह्माने एक देहके दो टुकड़े करके, आधे भागसे पति और दूसरे आधेसे पत्नियाँ पैदा कीं । इसका प्रमाण वेदमें है । जब तक विवाह नहीं होता, तबतक पुरुष ‘अर्द्ध’ देह रहता है—शादी होनेके बाद पुरुष ‘पूर्णदेह’ होता है ।

“मनुस्मृति”में ही लिखा है :—

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