भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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न निष्कय विसर्गाभ्याम् भर्तुर्माभ्यां विमुच्यते ।

एवं धर्मं विजानीयः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥

पति पत्नीका सम्बन्ध दान, बिक्री या त्याग द्वारा भी नहीं टूट सकता । यह नियम पूर्वकालसे विद्यमाना चलाया है ।

यदि रामा यदि चरमा, यदि तनयो विनयगुणोपतः ।

तनयेतनयोत्पत्तिः, सुरवरनगरे किमधिकम् ? ॥

अगर स्त्री है, अगर लक्ष्मी है, अगर शीलवान पुत्र है और पुत्रके पुत्र हो गया है, तो फिर स्वर्गमें इससे अधिक क्या है ?

नीतिकारोंने छः सुख प्रधान कहे हैं । उनमेंसे स्त्रीका सुख भी एक है । किसी विद्वान्ने कहा है :—

अर्थगमो नित्यमरोगिता च ।

प्रिया च भाभ्यां प्रियवादिनी च ।

वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या ।

पद्म जीवलोकस्य सुखानि राजन् ! ॥

हे राजन् ! धनकी आमद, सदा आरोग्य रहना, प्यारी और प्रियवादिनी स्त्री, वशमें रहनेवाला पुत्र और फल देनेवाली विद्या — ये छे संसारके सुख हैं ।

स्त्रीका काम पुरुषके बिना और पुरुषका काम स्त्रीके बिना चल नहीं सकता । स्त्री और पुरुष एक दूसरे पर निर्भर करते हैं । एक दूसरेके बिना अधूरा है । दोनोंका उद्देश एक ही