शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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न निष्कय विसर्गाभ्याम् भर्तुर्माभ्यां विमुच्यते ।
एवं धर्मं विजानीयः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥
पति पत्नीका सम्बन्ध दान, बिक्री या त्याग द्वारा भी नहीं टूट सकता । यह नियम पूर्वकालसे विद्यमाना चलाया है ।
यदि रामा यदि चरमा, यदि तनयो विनयगुणोपतः ।
तनयेतनयोत्पत्तिः, सुरवरनगरे किमधिकम् ? ॥
अगर स्त्री है, अगर लक्ष्मी है, अगर शीलवान पुत्र है और पुत्रके पुत्र हो गया है, तो फिर स्वर्गमें इससे अधिक क्या है ?
नीतिकारोंने छः सुख प्रधान कहे हैं । उनमेंसे स्त्रीका सुख भी एक है । किसी विद्वान्ने कहा है :—
अर्थगमो नित्यमरोगिता च ।
प्रिया च भाभ्यां प्रियवादिनी च ।
वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या ।
पद्म जीवलोकस्य सुखानि राजन् ! ॥
हे राजन् ! धनकी आमद, सदा आरोग्य रहना, प्यारी और प्रियवादिनी स्त्री, वशमें रहनेवाला पुत्र और फल देनेवाली विद्या — ये छे संसारके सुख हैं ।
स्त्रीका काम पुरुषके बिना और पुरुषका काम स्त्रीके बिना चल नहीं सकता । स्त्री और पुरुष एक दूसरे पर निर्भर करते हैं । एक दूसरेके बिना अधूरा है । दोनोंका उद्देश एक ही
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है, इसलिये लक्ष्य तक पहुँचनेके लिए दोनोंका मिलकर काम करना ज़रूरी है। ये दोनों एक दूसरेके विरोधी और प्रतिकूल नहीं, किन्तु अनुकूल और अनुगामी हैं। एक दूसरेके सुख-दुःखमें हिस्सा बँटाने और संसारके कार-व्यवहार चलानेके लिए पैदा हुए हैं। स्त्री-पुरुषके विवाह-बन्धनमें बँधनेसे ही गृहस्थी कह-लाती है। गृहस्थी एक गाड़ी है। स्त्री और पुरुष उस गाड़ीके दो पहिये हैं। जिस तरह गाड़ी एक पहियेसे नहीं चलती ; उसी तरह स्त्री या पुरुष किसी एकसे गृहस्थी उत्तम रूपसे नहीं चलती ; इसीलिये विवाह किया जाता है। हिन्दू-विवाहका आधार उच्च, धार्मिक और गूढ़ वैज्ञानिक सत्य है। हिन्दू-विवाह किसी अभि-प्राय या काम-वासना पूरी करनेके लिए नहीं किया जाता। विवाह-सम्बन्ध धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिए किया जाता है। गार्हस्थ्य जीवन-विना इस लोक और परलोक दोनोंमें ही सुख नहीं है। शास्त्रमें लिखा है :—
स सन्धार्थः प्रयत्नेन, स्वर्गमच्यमिच्छता ।
सुखन्चे हेच्छतानित्यं, योऽधार्थ्यादुर्बलेन्द्रियैः ॥
जो मृत्युके बाद सदा स्वर्गमें रहना चाहता है और जो इस जीवनमें सुख भोगना चाहता है, उसे बड़ी होशियारीके साथ गार्हस्थ्य जीवन निर्वाह करना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, जो अजितेन्द्रिय है, वह गृहस्थाश्रमके धर्मकार्य कर नहीं सकता।
नोट—इसका यह अ्थाय है कि, हिन्दू-स्त्री हिन्दूके लिए ख़ूब भोगनेकी चीज़ नहीं—उसके घरमें देवी है।
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मनुने कहा है :—
देवदत्तां पतिभ्याम्ब्री विन्दतेनेच्छयात्मनः । तां साध्वीं त्रिभुवान्नित्यं देवानाम् प्रियमाचरन् ॥ प्रजानार्थं स्तियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्चमानवाः । तस्मात् साधारणो धर्मः श्रुतौ षत्त्या सहोदितः ॥
परमात्मासे पत्नी मिलती है। पुरुष अपनी इच्छानुसार उसकी प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए पतिको अपनी साध्वी स्त्रीका सदा भरण-पोषण करना चाहिये। उसके इस कामसे देवता प्रसन्न होते हैं।
स्त्रियाँ सन्तान प्रसव करनेके लिए और पुरुष उनको उत्पादन करनेके लिए बनाये गये हैं; इसलिए भार्याके साथ रहना पुरुष का मुख्य धर्मकार्य है। पवित्र वेदोंकी ऐसी ही आज्ञा है।
हिन्दूके लिए विवाह धर्मका एक अंश या मुख्य भाग है। यह त्रिशुद्ध वैध धर्म-कार्य है। यह स्वार्थसिद्धि, बखरादारी या शराकत ( co-partnership ) का काम नहीं है; इसीलिये गृहस्थाश्रम शेष सभी आश्रमोंसे ऊँचा समझा जाता है। गृहस्थ—ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्यासी इन तीनोंसे ही श्रेष्ठ समझा जाता है। गृहस्थ अग्निमें हवन करता है, उससे मेह बरसता है; मेहसे अनाज पैदा होता है और अनाजसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन होता है; इसवास्ते गृहस्थ ही एक तैरहसे समस्त प्राणियों का पैदा करनेवाला है। जिस तरह जगत्के प्राणी श्वासकार्यसे
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जीते हैं ; उसी तरह ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सान्यासी गृहस्थकी सहायतासे जीवन धारण करते हैं ; इसीसे गृहस्थाश्रम सब आश्रमोंसे ऊँचा समझा जाता है । जिन्हें इस लोक और परलोकमें सुख भोगना हो, उन्हें गार्हस्थ्य जीवन निर्वाह करना चाहिये । मगर यज्ञादि धर्मकार्य पुरुष स्त्रीके बिना सम्पन्न कर नहीं सकता । अगर वह अकेला इन कर्मोंको करता है, तो उसको इनका फल नहीं मिलता । यही वजह है कि, सीताजीके बनमें रहनेके समय, जब रामचन्द्रजी अश्वमेध यज्ञ करने लगे, तब महर्षिोंने उन्हें सीता जीकी सोनेकी प्रतिमा बगलमें रखकर यज्ञ करनेका आदेश किया । जिस समय अय्यध्यापति महाराजा अजकी प्यारी रानी इन्दुमती जहरीली मालाके कारण स्वर्गको सिधार गई, महाराजके शोक का पारावार न रहा । यद्यपि उस समय एक इन्दुमतीके सिवा, महाराजके पास सब-कुछ था । ससाराग पृथ्वीका राज्य था, अनुल धन-सम्पत्ति थी, अप्सराओंका भी मानमर्दन करनेवाली हज़ारों वारंगनायें थीं, लाखों दास-दासी थे ; तथापि महाराजको जरा भी सुख-सन्तोष न होता था । उन्हें यह जगत् अन्धकारपूर्ण प्रतीत होता था । वे अपनी प्यारी रानीको याद कर-करके ज़ारज़ार रोते और कल्लपते थे ।
असल बात यह है, कि जो सुख पुरुषको अपनी स्त्री द्वारा मिलता है, वह और किसीसे भी मिल नहीं सकता । इस जगत्में उसका स्त्रीके समान सच्चा और चतुर सलाहकार कोई नहीं । जिस समय वह किसी भ्रमभटमें फँसकर घबरा जाता है,
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उलभनको सुलभता नहीं सकता, उस समय उसकी सच्ची साधन— उसकी प्यारी पत्नी अपनी कुशाग्रबुद्धिसे फौरन मुश्किलको हल कर देती है। अनेक बार दिल्लीश्वर शाहन्शाह अकबर प्रसिद्ध हाजिरजवाब राजा बीरबलसे अत्यन्त कठिन और टेढ़े सवाल कर बैठते थे। वह उनके सवालोंका जवाब फौरन ही दे देते थे, लेकिन कभी-कभी गाड़ी रुक भी जाती थी। ऐसे मौके पर बीरबल घबराकर औंधे मुँह पड़े रहते और शोकके मारे पागलसे हो जाते थे। उस वक्त उनकी पत्नी या पुत्री ही, उनकी मुश्किलको हल करके, उनके शोक-सन्तापको दूर करती थीं। शारीरिक बलमें स्त्रियाँ चाहे पुरुषों की बराबरी न कर सकती हों, पर बुद्धिमें वे पुरुषोंसे कम नहीं। किसी-किसी बातमें तो उनकी सूक्ष्म पुरुषों की अपेक्षा गहरी होती है। पुरुष कहते हैं, कि स्त्री की बुद्धि प्रलयंकारी होती है, पर यह कहावत सभी हालतोंमें ठीक नहीं। हमने स्वयं देखा है कि, बाज-बाज औकात हम कारोबार-सम्बन्धी इलभनमें ऐसे इलभ जाते हैं, कि दिनभर सोचने पर भी उसका कूल-किनारा नहीं होता। शामको घर आकर उदास मनसे बैठ जाते हैं। हमारी घरवाली हमारे चेहरेका रंग-दंग देखकर ताड़ जाती है, कि आज कुछ दालमें काला है। वह हमसे हमारी उदासीका कारण पूछती है और हमें कारण बताना ही पड़ता है। वह कहती है—“बड़े कारोबार वालोंके पीछे हजारों भंफट लगे ही रहते हैं। आप इस तरह बाढ़-बातमें रूझ कीजियेगा, तो आपका स्वास्थ्य नष्ट हो जायगा। हानिकी पूर्ति सहजमें हो
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जायगी, पर शरीर बड़ी मुश्किलसे सुधरेगा। पहले आप खाना खाइये और आराम कीजिये। मैं भी, अपनी अल्प बुद्धिके अनुसार, आपको सलाह दूँगी। अगर आप मेरी तुच्छ सम्मतिको ठीक समझें, तो तदनुसार काम कीजियेगा।” आश्वरकार जब सब खापी लेते हैं, नौकर चले जाते हैं और बच्चे सो जाते हैं, वह हमारी उलझनको चन्द्र मिनटोंमें ही सुलझा देती है—हमारी मुश्किलको हल कर देती है। हम उसकी बुद्धिकी तीव्रता देखकर दंग रह जाते और मन-ही-मन सराहना करते हैं। अगर कहा जाय किसी स्त्रियाँ चतुरा नहीं होतीं, तो मानना पड़ेगा कि, मर्द भी सभी चतुर बालाक और होशियार नहीं होते। हमारी रायमें, अगर अपनी घरवाली निरी मूर्खा न हो, तो उससे सलाह अवश्य लेनी चाहिये। किसी अँगारेज़ विद्वानने कहा है—“Woman's counsel is not worth much, yet he that despises it is no wiser than he should be.” स्त्रीकी सम्मति अधिक मूल्यवान नहीं होती, तोभी जो उसकी सलाहको घृणाकी दृष्टिसे देखता है, बुद्धिमान्नी नहीं करता।
गोस्वामी जीने बहुत ही ठीक कहा है—“धीरज, धर्म, मित्र अहं नारी, आपद-काल परखिये चारी।” अर्थात् धीरज, धर्म, मित्र और स्त्रीकी परीक्षा विपद्में करनी चाहिये; क्योंकि उसी समय उनका खरा-खोटापन मालूम होता है। (जब तक पुरुष पर आफत नहीं आती, उसे अपनी स्त्रीके गुणोंका पता नहीं लगता। जिस समय पुरुष पर चारों ओरसे विपद्की धनधोर घटाये जाते हैं,
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माता-पिता, भाई-बन्धु, मित्र और पुराने सेवक तक उससे आँख फेर लेते हैं, कोई उसकी बात नहीं पूछता ; तब उस घोर दुःखमें एक मात्र स्त्री ही उसकी शरणदाता और आनन्दका स्थान होती है, वहीं उसे शान्ति मिलती है । वही उसे ढाढ़स बंधाती और उसके शोकको हरती है । वही उसके दुःखके कारणको खोजती और वही उसकी औषधि सोचती है । वही अपनी मुस्कराहटसे उसके हृदय-की जलनको शान्त करती, अपने मधुर स्वरसे दिलकी मुरभाई हुई कलीको खिलाती और शुष्क हृदयको फिरसे तरोलाना करती है । विपद्में सभी नातेदार किनारा कर जाते हैं, पर वह अपने प्यारको नहीं त्यागती । सब तो यह है, संसारमें, घोर विपद्के समय, एक मात्र जगदीश और अपनी साध्वी स्त्री ही पुरुषकी खबर लेते हैं । हम इस बातको परीक्षा कर चुके हैं । हमने अपने जीवनमें जितनी विपदायें देखी हैं, बहुत कम लोगोंने उतनी देखी होगी । सब तो यह है, हमारा जीवन ही विपद्मय है । ईश्वरने हमें दुःख पानेके लिए ही पैदा किया है ।
सन् १९१९ में, जब हम घोर विपद्में फँस गये, रक्षाकी ज़रा भी आशा न रही, भाई-बन्धु आँख फेर गये ; साथी हमारी कमाई हुई दौलतको हड़पनेकी युक्तियाँ विचारने लगे ; कई सेवक जिन्हें हमने बड़ी-बड़ी सहायतायें दी थीं, हमारी विपद्की आगमें घुताहुति छोड़ने लगे, हमारे दुश्मनोंसे मिल कर षड्यन्त्र-पर-षड्यन्त्र रचने लगे, उन्हें हमारे छिद्र बताने लगे,—उस समय हमें चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार दीखता था । उस समय
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हमारा सर्वस्व नाश होनेमें कोई कसर नहीं थी, यहाँ तक कि जीवन रहनेकी भी आशा नहीं थी। अमीरोंकी तरह सुख-चैनसे पले हुए छोटे-छोटे बच्चों और हमारी घरवालीको गलियोंमें भीख माँगनेतक की नौबत आ गई थी। जो हमारे अपने थे, जिनसे हमें कुछ आशा थी, उनकी तरफ हमने आँखोंमें आँसू भर कर देखा ; पर किसीका भी हृदय न पसीजा—सभी पत्थर-दिल हो गये। उस समय हम गहर गम्भीर चिन्तासागरमें गूँते खाने लगे। कहीं भी किनारा न दिखाई दिया। ऐसे समयमें हमें ईश्वरकी याद आई। उससे हमने अपने अन्तर्हृदयसे पुकार मचाई। उस दया-सिन्धुको हमपर दया आई। उसने हमारी मददको अपना गुप्त हाथ बढ़ाया। इधर हमारी घरवालीके हृदयमें बल आया। उसने हमसे कहा—“यह घोर विपद् है। अगर घरबाओगे, तो डूबनेमें संशय नहीं। घरबाहट छोड़ो और हाथ पैर मारो ; शायद किनारा मिल जाय। मेरे पास जो कुछ है, उस सबको फूँक दो और अपनी प्राणरक्षा करो। अगर आप होंगे, तो धन फिर हो जायगा। फिक्र मत करो ; जब तक मेरे पास एक कानी कौड़ी भी रहेगी, जेलमें भी आपको सुख पहुंचाऊँगी ; कुछ भी न रहेगा तो चरवा कात कर, मिहन्त-मज़दूरी करके बच्चोंको पालूँगी और आपके लिए भी जेलमें ज़रूरी चीज़ें भेजूँगी।” उस देवीके इन शब्दोंने हम पर जादूकासा असर किया। हमारा सुखा हृदय हरा हो गया। फिर ; उसने हमें भूतपूर्व वीर्यसराय लाई चेम्सफर्ड की शरणमें जानेकी सलाह दी। हमने वैसा ही किया। प्रसिद्ध संगदिल(?) लाई
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चेम्सफर्डका सख्त दिल भी हमारे लिए मोम होगाया । उस दयालु वायसरायने ( हम तो उन्हें दयालुओंका भी सिरताज कहेंगे ) हमारी सहायताके लिए, आनरबिल मिष्टर गोरले एम० ए०, सी० आई० ई०, आई० सी० ऐस० को नियत किया । बहुत क्या कहें, चन्द दिनोंमें विपद्के बादल उड़ गये । बुरे दिन गये, भले दिन आये । दुश्मन हाथ मलते रह गये । उस विपद्में अगर हमारी घरवाली देवी हमें त्याग देती और अपनी कुशाग्रबुद्धिका परिचय न देती, तो आज हम इस ग्रन्थको न लिखते होते ; बल्कि, जेलकी असह्य यंत्रणाएँ न सह सकेनेकी वजहसे, इस नापायेदार दुनियासे ही कूच कर जाते । अगर हम इस कहानीको पूर्ण रूपसे लिखें, तो आधीसे अधिक पुस्तक इसी कहानीसे भर जाय ; पर हमारे पास स्थानाभाव है, और इस रामकहानीका यहाँ लिखा जाना मुनासिब भी नहीं ; अतः अपनी बीती हम अपनी जीवनीमें विस्तारसे लिखेंगे । शेषमें, हम यह कहनेको बाध्य हैं कि, पुरुषके लिए स्त्री-विना इस संसारमें सर्वत्र अँधेरा-ही-अँधेरा है ।
इतना सब लिखनेका सारांश या सार मर्म यही है, कि नारी पुरुषकी अर्द्धाङ्गिनी, सहधर्मिणी और उसकी अन्तरात्माकी छाया या प्रतिमा है । वही कालिदासकी तरह पुरुषको उत्थानका मार्ग दिखानेवाली और तुलसीदासकी तरह मोक्ष-पथ प्रदर्शिका है । वही पुरुषके शोक-सन्तप्त हृदयको अपने सुधावारिसे सौंवर करती-ताजा रखनेवाली और अपने शोकहरा नामको सार्थक करनेवाली है । पुरुषके घोर विपद्कालमें वही एकमात्र सच्चे मित्रकासा
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बर्ताव करनेवाली, उसके दुःख-शोकमें हिस्सा बँटानेवाली, उसके दुःखको अपना ही दुःख समझनेवाली, उसके सुखके लिए अपना सारा सुख-आनन्द त्याग देनेवाली और उसके दुःखनाशकी औषधि खोजनेवाली है। घर मुसीबतमें जब पुरुषके सारे नाते-दार—माता-पिता, भाई-बहिन और दिल्ली दोस्तीका दम भरनेवाले मित्र किनारा कर जाते हैं, पास नहीं आते, बातें करनेमें भी आना-कानी करते हैं ; तब वही है जो उसका साथ नहीं छोड़ती, उसकी विपद्को अपनी ही विपद् समझती और तन-मन-धनसे उसकी सहायता करती है। वही है जो धर्मकार्यमें उसके साथ पिताकासा व्यवहार करती, खिलाने-पिलानेमें माताका सा बर्ताव करती, सलाह-सूत्र देने और धीरज बँधानेमें मित्रका सा काम करती और रति-समय वेश्यावत् व्यवहार करती है। वही है जो उसके रोग-पीड़ित और निर्धन होनेपर भी, उसका अनादर नहीं करती। उसके घरको भाड़-बुहार कर साफ रखती, हरेक चीजको यथास्थान सजाकर रखती, सुन्दर सुस्वादु भोजन बनाकर रखती, घरमें चिराग जलाती और उसके घरमें घुसते ही मुस्कराते हुए चेहरेसे उसका स्वागत करती है। उसे दुःखी देखकर आप आनन्दके फूलोंकी वर्षा करती और तुरलताते हुए नन्हेसे बच्चों को उसके आगे कर देती है। वह इन मनोहर दृश्योंको देखकर अपने शोकको भूल जाता और प्रसन्न होकर खाना खाता है। स्त्री-बिना पुरुषकी यह खातिर कौन कर सकता है ? इसीसे कहते हैं कि, नारी गृहकी लक्ष्मी, और घरका कल्याण है। वह घरकी श्रीवृद्धि,
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पेश्व्यर्थ और सुख समीका आधार है। वही पुरुषकी सर्वस्व और उसकी अन्तरात्मा है। उसकी जीवन-ज्योति उसीसे प्रज्वलित होती और प्रकाश पाती है। उस शक्तिरूपिणीसे ही उसे शक्ति मिलती है। बिना ग्रहिणीके घर निर्जन कानन या भयंकर श्मशान है। उसके बिना संसार सूना और जीवन ब्रथा है। वह पुरुषके लिये ईश्वरदत्त अनमोल हीरा है। उस कोहेनूरसे भी वैशकीमत हीरेके बिना उसका घर—घर नहीं है। इस दशामें उसे बनमें जाकर भगवद्भजन करना ही उचित है। स्त्रीरत्नके सच्चे कृदरदों पण्डित जगन्नाथ महाराज अपने “भामिनी-विलास” में यही बात कहते हैं :—
इदं लताभिः स्तबकानताभिर्मनोहरं हृत बनांतरालम् ।
सदैव सेव्यं स्तनभारवत्यो न चेद्युवत्यो हृदयं हेरयुः ॥
यदि स्तन-भारवती युवती चित्तको न हरे, तो भारसे झुकी हुई लतिकाओंसे सुशोभित कानन—गुफाका मध्यभाग सेवन करना उचित है ; यानी जड़ूलमें जाकर किसी गुफामें रहना सुनासिब है।
इसीको स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं—यदि भारी स्तनों के बोझसे झुकी जाने वाली नाजुनी—कोमलाडूनी पुरुषके चित्तको अपने नाजु-नखरों या हाव-भाव प्रभुत्विते प्रसन्न न करे ; तो पत्र-पल्लवोंके भारी बोझसे झुकी हुई लताओंसे शौभायमान गुहा या वनके मध्य भागमें रहकर प्रभुकी आराधना करनी चाहिये। जब
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कभी पीनपयोधरा सुन्दरीकी याद आयेगी, तभी पत्रपल्लवोंके भार से नष्ट हुई लताओंको देख, मनमें सन्तोष हो जायगा ।
दोहा ।
अनल दीप रवि शशि नखत, यदपि करत उज्जार ।
मृगनैनी विन मोहि यह, लागत जगत् अंध्यार ॥१५॥
सार—गृहस्थाश्रममें एक स्त्री बिना इन्द्र- तुल्य सम्पत्ति भी तुच्छ है ।
14. Though there are lamp, light, fire, stars, sun and moon yet to me the whole world is enveloped in darkness without a woman with eyes like that of a deer.
उद्भूतः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भूलते
रागाधिष्ठतमा पल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम ।
सौभाग्यात्तरपंक्तिरेव लिखिता पुष्पायुवेन स्वयं
मध्यस्थाऽपि करोति तापमधिकं रोमावली केनसा ॥१५॥
हे कामिनि ! तेरे गोल-गोल उठे हुए भारी कुच, चञ्चल नेत्र, चपल भू-लता और रागपूर्ण नवीन पतोंके सदृश मुखे होठ—अगर रसिकोंके शरीरमें वेदना करें तो कर सकते हैं, पर यह समझ में नहीं आता कि, कामदेवके निज हाथोंसे लिखी—सौभाग्यकी
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पंक्ति—रोमावलि, मध्यस्थ होने पर भी, क्यों चित्तको सन्ताप करती है ॥१५॥
खुलासा—सुन्दरीके गोल-गोल पुष्ट और उठे हुए कुचों, चम्चल नेत्रों, चपल भौहों और सुर्ख होठोंसे कामियोंको जो सन्ताप होता है, उसका होना तो स्वाभाविक ही है, उसकी हमें कुछ शिकायत नहीं। शिकायत है, हमें उस रोमावलीकी—बालों की कृतारकी, जो सुन्दरीके पेड़ पर, नामिसे जरा ऊपर, मध्यस्थ की तरह, बीचमें सुशोभित है और जो स्वयं पुष्पाणुष कामदेवके करकमलों द्वारा, सौभाग्यके विशेष चिह्नकी तरह, लिखी गयी है। शिकायत क्यों है ? शिकायत इसलिये है कि, वह मध्यस्थ होकर भी चित्तको सन्ताप देती है। यह प्रसिद्ध बात है कि, मध्यस्थ सन्तापका कारण नहीं होता।
दोहा।
अरुण अंधर कुच कठिन दग, भौह चपल दुख देत ।
सुथिर रूप रोमावली, ताप करत किहि हेत ? ॥१५॥
सार—स्त्रियोंका अहङ्क-प्रत्यहङ्क यहाँ तक कि, एक-एक बाल पुरुषके मनमें सन्ताप पैदा करता है। विशेष क्या, “स्त्री” नाम ही सन्तापकारक है।
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15. If high breasts, restless eyes, moving brows and the two lips like new leaves give pain to a lustful man, they are justified in doing so because ( Cupid ) Kamadev has marked the words "Good fortune" in the forehead of a woman, but it is incomprehensible why that line of hair passing through the middle of the belly aggravates the pain which as an arbitrator should abate it.
गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता ।
शनैश्चराभ्यां पादाम्ब्यां रेजे ग्रहमयीव सा ॥१६॥
वह स्त्री गुरु स्तनोके भारसे, भास्करके समान प्रकाशमान मुख-चन्द्रसे और शनैश्चरके सट्ठ मन्दगामी दोनों चरणोंसे ग्रहमयी सी मालूम होती है ॥१६॥
खुलासा—वह स्त्री अपने पूर्णोन्नत बृहस्पतिके समान दोनों कुर्चोंसे, सूर्योके समान प्रकाशमान मुखचन्द्रसे और मन्दगामी शनैश्चरके समान धीरे-धीरे चलनेवाले दोनों चरणकमलोंसे ग्रह-पुञ्ज या रौशन मज्जमा-उल-नजूम सी जान पड़ती है ।
बृहस्पति, चन्द्रमा, सूरज और शनैश्चर—इन तेजस्वी ग्रहोंके चिह्न स्त्रीमें पाये जाते हैं । इसीसे कवि महोदय कहते हैं कि, वह नाज़नी-ग्रहमयीसी शोभित होती है । उसके स्तन-
ॐ गुरु, भास्वान् प्रभृति शब्दोंके दो-दो अर्थ हैं । जैसे, गुरु=भारी और बृहस्पति । चन्द्रमा=चन्द्रवत् और चन्द्रमा । भास्वान्=प्रकाशमान और सूरज । शनैश्चर=मन्दगामी और शनैश्चर । सनीचर मन्दगामी प्रसिद्ध है ।
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द्वय गुरु—भारी हैं, मुख सूरज और चाँदसा है और चरण मन्द-गामी शनैश्चरकी तरह मन्दगामी हैं। स्पष्ट है कि, उसके शरीरमें सभी तेजस्वी ग्रहोंका निवास है अथवा नवग्रह उसके सेवक हैं ; अतएव खीके होते नवग्रहोंके पूजनकी ज़रूरत नहीं ; क्योंकि एकमात्र उसकी पूजा-आराधनासे सभी फलोंकी प्राप्ति हो सकती है।
मिष्टर हारश्रव नामक एक पाश्चात्य विद्वान् भी स्त्रियोंको आकाशके सितारोंकी तरह पृथ्वीके सितारे कहते हैं। आप लिखते हैं :—“Women are the poetry of the world in the same sense as the stars are the poetry of heaven. Clear, light-giving, harmonious, they are the terrestrial planets that rule the destinies of mankind” जिस प्रकार नक्षत्र नमके आभूषण हैं ; उसी प्रकार स्त्रियाँ पृथ्वीकी आभूषण हैं। वे स्वच्छ-निर्मल, प्रकाशमान और शान्तिप्रद पार्श्व नक्षत्र हैं, जो मनुष्य-जातिके भाग्यका निपटारा करती हैं ; अर्थात् पुरुषोंके भाग्यका फैसला स्त्रियोंके हाथोंमें है।
महाराजा प्रतापसिंहज्ज अपनी नीचे लिखी ऋचितामें, स्त्रीके शरीरमें नवग्रहोंका निवास स्पष्ट रूपसे दिखाते हैं :—उसके बाल राहुके समान हैं, उसका मुँह चन्द्रमाके समान शोभित है, उसके दोनों नेत्र सूर्य हैं, अलकें केतु हैं, मन्द-मन्द हँसना शुक्र है, वाणी बुध है, दोनों स्तन वृहस्पति हैं, कान मङ्गल है और उसकी
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मन्दी-मन्दी चाल शनैश्चर है । ऐसी महामनोहर नवग्रहमयी युवतीकी सेवकाई स्वयं नवग्रह करते हैं ; अतः उसके समान फलदायिनी और कौन है ?
छप्पय ।
केश राहु सम जान, चन्द्र सौ सोहत आनन । द्वादश में द्वे अर्क नैन, केतुहि श्लकानन ॥ मन्द हास है युक्त, बुधै बानी कहि जानो । सुरगुरु जान उरोज, कर्ण मंगलहि बखानो ॥ अति मन्द चाल सोई शनैश्चर, महामनोहर युवति यह । तेहि सम फलदायकको देखियत, जाको सेवत नवग्रह ॥१३॥
सार— मृगनयनी सुन्दरी नवयुवती प्रकाश- मान ग्रहपुञ्जके समान चित्ताकर्षक और मनो- हर होती है । उसकी हृदयहारिणी छविका वर्णन करना कठिन है ।
16. That woman bent under the load of heavy breasts, shining with moon-like face and walking with slow steps, looks like a planet. (Guru means heavy as well as Jupiter-planet. Sanaishchar means slow steps as well as Saturn—the poet takes these words in their duplicate meanings and says that she looks like planets.)
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तस्याः स्तनौ यदि घनौ जवनं विहारि बकुलं च चारु तव चित्तं किमाकुलत्वम् ॥ पुरयं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा पुरयेर्विना न हि भवन्ति समीहितायः ॥१॥
हे चित्त ! उस स्त्रीके पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और सुन्दर मुँहको देखकर, क्या क्यों व्याकुल होते हो ? यदि तुम उसके कठोर स्तनों प्रश्रुतिका आनन्द लेना ही चाहते हो, तो पुरय करो ; क्योंकि बिना पुरय किये मनोरथ सिद्ध नहीं होते ॥१॥
खुलासा—हे मन ! उसके मोटे-मोटे और उठे हुए दोनों कुम्भों, चित्ताकर्षक नितम्भों और स्वर्गीय अप्सराओंके समान चन्द्र- मुखको देखकर क्यों कुदृता है ? पर-स्त्री पर मन चलाना उचित नहीं । अगर परमात्माने तुम्हें मनोमुखधर रूप, उठी हुई छातियों और पतली कमरवाली सुन्दरी नहीं दी है, तो जैसी दी है, उसी पर सन्तोष कर । कहा है—
देख पराई चूपड़ी, क्यों ललचावे जीव ? । रूखी-सूखी खायेके, ठण्डा पानी पीव ॥
हे मन ! पराई चुपड़ी हुई रोटियों पर क्यों ललचाता है, ईश्वरने तुम्हें जैसी रूखी-सूखी दी है, उसे ही खाकर, शीतल जल क्यों नहीं पीता ? अर्थात् पराई सुन्दरियों पर क्यों मन चलता है, परमात्माने तुम्हें जैसी सुरूप-कुरूप दी है, उसी पर सन्तोष क्यों नहीं करता ?
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परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—
देवदत्तां पतिभाव्यां विन्दते नेच्छयात्मनः।
जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—
उर्वशीसुरतचिन्तया ययौ संवयं किमु पुरुषा नृपः।
रक्षणाय निज जीवितस्य तत्संभजत्परवर्धुं न कामतः ॥
महाराज पुरुरवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।
और भी कहा है।
लंकेश्वर जनकजा हरण्येन बाली
तारापहारकतयाप्यथ कीचकास्यः ॥
पाञ्चालिका ग्रहणतो निधनं जगाम
तच्छ्रुते सापि परदारसति न कांचोत् ॥
लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।
हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुबोंवाली स्त्रियोंके
भूतशक्तिक
है मन ! उस कामिनी के पुष्ट स्तनों, मनोहर जीवों और चन्द्रमुख को देखकर क्यों व्याकुल होते हैं ? अगर तुम उसके कटोर कुचों और मनोहर जीवों को गौरः का ज्ञानन्द लेना चाहते हो, तो परोपकार-पुण्य सम्भव करो ; अर्थात् सुन्दरी भूतनयनी पुण्य-कर्म करने से मिलती है ।
(पृष्ठ ४३)
Popular Press-Calcutta.
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परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—
देवदत्तां पतिभ्याभ्यां चिन्दते नेच्छयात्मनः।
जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—
उर्वशीसुरतचित्तया ययौ संजयं किमु पुरुषा तृपः।
रक्षणाय निज जीवितस्य तत् संभजेत्परवर्धुं न कामतः॥
महाराज पुरुषवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।
और भी कहा है।
लंकेरवर जनकजा हरणोन बाली
तारापहारकतयाप्यथ कीचकाख्यः॥
पाञ्चालिका महणातो निधनं जगाम
तच्छ्रुते सापि परदाररति न कांक्षेत्॥
लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।
हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुचोंवाली स्त्रियोंके