भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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कभी पीनपयोधरा सुन्दरीकी याद आयेगी, तभी पत्रपल्लवोंके भार से नष्ट हुई लताओंको देख, मनमें सन्तोष हो जायगा ।

दोहा ।

अनल दीप रवि शशि नखत, यदपि करत उज्जार ।

मृगनैनी विन मोहि यह, लागत जगत् अंध्यार ॥१५॥

सार—गृहस्थाश्रममें एक स्त्री बिना इन्द्र- तुल्य सम्पत्ति भी तुच्छ है ।

14. Though there are lamp, light, fire, stars, sun and moon yet to me the whole world is enveloped in darkness without a woman with eyes like that of a deer.

उद्भूतः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भूलते

रागाधिष्ठतमा पल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम ।

सौभाग्यात्तरपंक्तिरेव लिखिता पुष्पायुवेन स्वयं

मध्यस्थाऽपि करोति तापमधिकं रोमावली केनसा ॥१५॥

हे कामिनि ! तेरे गोल-गोल उठे हुए भारी कुच, चञ्चल नेत्र, चपल भू-लता और रागपूर्ण नवीन पतोंके सदृश मुखे होठ—अगर रसिकोंके शरीरमें वेदना करें तो कर सकते हैं, पर यह समझ में नहीं आता कि, कामदेवके निज हाथोंसे लिखी—सौभाग्यकी