भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पेश्व्यर्थ और सुख समीका आधार है। वही पुरुषकी सर्वस्व और उसकी अन्तरात्मा है। उसकी जीवन-ज्योति उसीसे प्रज्वलित होती और प्रकाश पाती है। उस शक्तिरूपिणीसे ही उसे शक्ति मिलती है। बिना ग्रहिणीके घर निर्जन कानन या भयंकर श्मशान है। उसके बिना संसार सूना और जीवन ब्रथा है। वह पुरुषके लिये ईश्वरदत्त अनमोल हीरा है। उस कोहेनूरसे भी वैशकीमत हीरेके बिना उसका घर—घर नहीं है। इस दशामें उसे बनमें जाकर भगवद्भजन करना ही उचित है। स्त्रीरत्नके सच्चे कृदरदों पण्डित जगन्नाथ महाराज अपने “भामिनी-विलास” में यही बात कहते हैं :—

इदं लताभिः स्तबकानताभिर्मनोहरं हृत बनांतरालम् ।

सदैव सेव्यं स्तनभारवत्यो न चेद्युवत्यो हृदयं हेरयुः ॥

यदि स्तन-भारवती युवती चित्तको न हरे, तो भारसे झुकी हुई लतिकाओंसे सुशोभित कानन—गुफाका मध्यभाग सेवन करना उचित है ; यानी जड़ूलमें जाकर किसी गुफामें रहना सुनासिब है।

इसीको स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं—यदि भारी स्तनों के बोझसे झुकी जाने वाली नाजुनी—कोमलाडूनी पुरुषके चित्तको अपने नाजु-नखरों या हाव-भाव प्रभुत्विते प्रसन्न न करे ; तो पत्र-पल्लवोंके भारी बोझसे झुकी हुई लताओंसे शौभायमान गुहा या वनके मध्य भागमें रहकर प्रभुकी आराधना करनी चाहिये। जब