शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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बर्ताव करनेवाली, उसके दुःख-शोकमें हिस्सा बँटानेवाली, उसके दुःखको अपना ही दुःख समझनेवाली, उसके सुखके लिए अपना सारा सुख-आनन्द त्याग देनेवाली और उसके दुःखनाशकी औषधि खोजनेवाली है। घर मुसीबतमें जब पुरुषके सारे नाते-दार—माता-पिता, भाई-बहिन और दिल्ली दोस्तीका दम भरनेवाले मित्र किनारा कर जाते हैं, पास नहीं आते, बातें करनेमें भी आना-कानी करते हैं ; तब वही है जो उसका साथ नहीं छोड़ती, उसकी विपद्को अपनी ही विपद् समझती और तन-मन-धनसे उसकी सहायता करती है। वही है जो धर्मकार्यमें उसके साथ पिताकासा व्यवहार करती, खिलाने-पिलानेमें माताका सा बर्ताव करती, सलाह-सूत्र देने और धीरज बँधानेमें मित्रका सा काम करती और रति-समय वेश्यावत् व्यवहार करती है। वही है जो उसके रोग-पीड़ित और निर्धन होनेपर भी, उसका अनादर नहीं करती। उसके घरको भाड़-बुहार कर साफ रखती, हरेक चीजको यथास्थान सजाकर रखती, सुन्दर सुस्वादु भोजन बनाकर रखती, घरमें चिराग जलाती और उसके घरमें घुसते ही मुस्कराते हुए चेहरेसे उसका स्वागत करती है। उसे दुःखी देखकर आप आनन्दके फूलोंकी वर्षा करती और तुरलताते हुए नन्हेसे बच्चों को उसके आगे कर देती है। वह इन मनोहर दृश्योंको देखकर अपने शोकको भूल जाता और प्रसन्न होकर खाना खाता है। स्त्री-बिना पुरुषकी यह खातिर कौन कर सकता है ? इसीसे कहते हैं कि, नारी गृहकी लक्ष्मी, और घरका कल्याण है। वह घरकी श्रीवृद्धि,