भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 72

( ५६ )

चेम्सफर्डका सख्त दिल भी हमारे लिए मोम होगाया । उस दयालु वायसरायने ( हम तो उन्हें दयालुओंका भी सिरताज कहेंगे ) हमारी सहायताके लिए, आनरबिल मिष्टर गोरले एम० ए०, सी० आई० ई०, आई० सी० ऐस० को नियत किया । बहुत क्या कहें, चन्द दिनोंमें विपद्के बादल उड़ गये । बुरे दिन गये, भले दिन आये । दुश्मन हाथ मलते रह गये । उस विपद्में अगर हमारी घरवाली देवी हमें त्याग देती और अपनी कुशाग्रबुद्धिका परिचय न देती, तो आज हम इस ग्रन्थको न लिखते होते ; बल्कि, जेलकी असह्य यंत्रणाएँ न सह सकेनेकी वजहसे, इस नापायेदार दुनियासे ही कूच कर जाते । अगर हम इस कहानीको पूर्ण रूपसे लिखें, तो आधीसे अधिक पुस्तक इसी कहानीसे भर जाय ; पर हमारे पास स्थानाभाव है, और इस रामकहानीका यहाँ लिखा जाना मुनासिब भी नहीं ; अतः अपनी बीती हम अपनी जीवनीमें विस्तारसे लिखेंगे । शेषमें, हम यह कहनेको बाध्य हैं कि, पुरुषके लिए स्त्री-विना इस संसारमें सर्वत्र अँधेरा-ही-अँधेरा है ।

इतना सब लिखनेका सारांश या सार मर्म यही है, कि नारी पुरुषकी अर्द्धाङ्गिनी, सहधर्मिणी और उसकी अन्तरात्माकी छाया या प्रतिमा है । वही कालिदासकी तरह पुरुषको उत्थानका मार्ग दिखानेवाली और तुलसीदासकी तरह मोक्ष-पथ प्रदर्शिका है । वही पुरुषके शोक-सन्तप्त हृदयको अपने सुधावारिसे सौंवर करती-ताजा रखनेवाली और अपने शोकहरा नामको सार्थक करनेवाली है । पुरुषके घोर विपद्कालमें वही एकमात्र सच्चे मित्रकासा