भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 71

( ५८ )

हमारा सर्वस्व नाश होनेमें कोई कसर नहीं थी, यहाँ तक कि जीवन रहनेकी भी आशा नहीं थी। अमीरोंकी तरह सुख-चैनसे पले हुए छोटे-छोटे बच्चों और हमारी घरवालीको गलियोंमें भीख माँगनेतक की नौबत आ गई थी। जो हमारे अपने थे, जिनसे हमें कुछ आशा थी, उनकी तरफ हमने आँखोंमें आँसू भर कर देखा ; पर किसीका भी हृदय न पसीजा—सभी पत्थर-दिल हो गये। उस समय हम गहर गम्भीर चिन्तासागरमें गूँते खाने लगे। कहीं भी किनारा न दिखाई दिया। ऐसे समयमें हमें ईश्वरकी याद आई। उससे हमने अपने अन्तर्हृदयसे पुकार मचाई। उस दया-सिन्धुको हमपर दया आई। उसने हमारी मददको अपना गुप्त हाथ बढ़ाया। इधर हमारी घरवालीके हृदयमें बल आया। उसने हमसे कहा—“यह घोर विपद् है। अगर घरबाओगे, तो डूबनेमें संशय नहीं। घरबाहट छोड़ो और हाथ पैर मारो ; शायद किनारा मिल जाय। मेरे पास जो कुछ है, उस सबको फूँक दो और अपनी प्राणरक्षा करो। अगर आप होंगे, तो धन फिर हो जायगा। फिक्र मत करो ; जब तक मेरे पास एक कानी कौड़ी भी रहेगी, जेलमें भी आपको सुख पहुंचाऊँगी ; कुछ भी न रहेगा तो चरवा कात कर, मिहन्त-मज़दूरी करके बच्चोंको पालूँगी और आपके लिए भी जेलमें ज़रूरी चीज़ें भेजूँगी।” उस देवीके इन शब्दोंने हम पर जादूकासा असर किया। हमारा सुखा हृदय हरा हो गया। फिर ; उसने हमें भूतपूर्व वीर्यसराय लाई चेम्सफर्ड की शरणमें जानेकी सलाह दी। हमने वैसा ही किया। प्रसिद्ध संगदिल(?) लाई