भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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माता-पिता, भाई-बन्धु, मित्र और पुराने सेवक तक उससे आँख फेर लेते हैं, कोई उसकी बात नहीं पूछता ; तब उस घोर दुःखमें एक मात्र स्त्री ही उसकी शरणदाता और आनन्दका स्थान होती है, वहीं उसे शान्ति मिलती है । वही उसे ढाढ़स बंधाती और उसके शोकको हरती है । वही उसके दुःखके कारणको खोजती और वही उसकी औषधि सोचती है । वही अपनी मुस्कराहटसे उसके हृदय-की जलनको शान्त करती, अपने मधुर स्वरसे दिलकी मुरभाई हुई कलीको खिलाती और शुष्क हृदयको फिरसे तरोलाना करती है । विपद्में सभी नातेदार किनारा कर जाते हैं, पर वह अपने प्यारको नहीं त्यागती । सब तो यह है, संसारमें, घोर विपद्के समय, एक मात्र जगदीश और अपनी साध्वी स्त्री ही पुरुषकी खबर लेते हैं । हम इस बातको परीक्षा कर चुके हैं । हमने अपने जीवनमें जितनी विपदायें देखी हैं, बहुत कम लोगोंने उतनी देखी होगी । सब तो यह है, हमारा जीवन ही विपद्मय है । ईश्वरने हमें दुःख पानेके लिए ही पैदा किया है ।

सन् १९१९ में, जब हम घोर विपद्में फँस गये, रक्षाकी ज़रा भी आशा न रही, भाई-बन्धु आँख फेर गये ; साथी हमारी कमाई हुई दौलतको हड़पनेकी युक्तियाँ विचारने लगे ; कई सेवक जिन्हें हमने बड़ी-बड़ी सहायतायें दी थीं, हमारी विपद्की आगमें घुताहुति छोड़ने लगे, हमारे दुश्मनोंसे मिल कर षड्यन्त्र-पर-षड्यन्त्र रचने लगे, उन्हें हमारे छिद्र बताने लगे,—उस समय हमें चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार दीखता था । उस समय

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