भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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जायगी, पर शरीर बड़ी मुश्किलसे सुधरेगा। पहले आप खाना खाइये और आराम कीजिये। मैं भी, अपनी अल्प बुद्धिके अनुसार, आपको सलाह दूँगी। अगर आप मेरी तुच्छ सम्मतिको ठीक समझें, तो तदनुसार काम कीजियेगा।” आश्वरकार जब सब खापी लेते हैं, नौकर चले जाते हैं और बच्चे सो जाते हैं, वह हमारी उलझनको चन्द्र मिनटोंमें ही सुलझा देती है—हमारी मुश्किलको हल कर देती है। हम उसकी बुद्धिकी तीव्रता देखकर दंग रह जाते और मन-ही-मन सराहना करते हैं। अगर कहा जाय किसी स्त्रियाँ चतुरा नहीं होतीं, तो मानना पड़ेगा कि, मर्द भी सभी चतुर बालाक और होशियार नहीं होते। हमारी रायमें, अगर अपनी घरवाली निरी मूर्खा न हो, तो उससे सलाह अवश्य लेनी चाहिये। किसी अँगारेज़ विद्वानने कहा है—“Woman's counsel is not worth much, yet he that despises it is no wiser than he should be.” स्त्रीकी सम्मति अधिक मूल्यवान नहीं होती, तोभी जो उसकी सलाहको घृणाकी दृष्टिसे देखता है, बुद्धिमान्नी नहीं करता।

गोस्वामी जीने बहुत ही ठीक कहा है—“धीरज, धर्म, मित्र अहं नारी, आपद-काल परखिये चारी।” अर्थात् धीरज, धर्म, मित्र और स्त्रीकी परीक्षा विपद्में करनी चाहिये; क्योंकि उसी समय उनका खरा-खोटापन मालूम होता है। (जब तक पुरुष पर आफत नहीं आती, उसे अपनी स्त्रीके गुणोंका पता नहीं लगता। जिस समय पुरुष पर चारों ओरसे विपद्की धनधोर घटाये जाते हैं,