भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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पंक्ति—रोमावलि, मध्यस्थ होने पर भी, क्यों चित्तको सन्ताप करती है ॥१५॥

खुलासा—सुन्दरीके गोल-गोल पुष्ट और उठे हुए कुचों, चम्चल नेत्रों, चपल भौहों और सुर्ख होठोंसे कामियोंको जो सन्ताप होता है, उसका होना तो स्वाभाविक ही है, उसकी हमें कुछ शिकायत नहीं। शिकायत है, हमें उस रोमावलीकी—बालों की कृतारकी, जो सुन्दरीके पेड़ पर, नामिसे जरा ऊपर, मध्यस्थ की तरह, बीचमें सुशोभित है और जो स्वयं पुष्पाणुष कामदेवके करकमलों द्वारा, सौभाग्यके विशेष चिह्नकी तरह, लिखी गयी है। शिकायत क्यों है ? शिकायत इसलिये है कि, वह मध्यस्थ होकर भी चित्तको सन्ताप देती है। यह प्रसिद्ध बात है कि, मध्यस्थ सन्तापका कारण नहीं होता।

दोहा।

अरुण अंधर कुच कठिन दग, भौह चपल दुख देत ।

सुथिर रूप रोमावली, ताप करत किहि हेत ? ॥१५॥

सार—स्त्रियोंका अहङ्क-प्रत्यहङ्क यहाँ तक कि, एक-एक बाल पुरुषके मनमें सन्ताप पैदा करता है। विशेष क्या, “स्त्री” नाम ही सन्तापकारक है।