भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ६३ )

पंक्ति—रोमावलि, मध्यस्थ होने पर भी, क्यों चित्तको सन्ताप करती है ॥१५॥

खुलासा—सुन्दरीके गोल-गोल पुष्ट और उठे हुए कुचों, चम्चल नेत्रों, चपल भौहों और सुर्ख होठोंसे कामियोंको जो सन्ताप होता है, उसका होना तो स्वाभाविक ही है, उसकी हमें कुछ शिकायत नहीं। शिकायत है, हमें उस रोमावलीकी—बालों की कृतारकी, जो सुन्दरीके पेड़ पर, नामिसे जरा ऊपर, मध्यस्थ की तरह, बीचमें सुशोभित है और जो स्वयं पुष्पाणुष कामदेवके करकमलों द्वारा, सौभाग्यके विशेष चिह्नकी तरह, लिखी गयी है। शिकायत क्यों है ? शिकायत इसलिये है कि, वह मध्यस्थ होकर भी चित्तको सन्ताप देती है। यह प्रसिद्ध बात है कि, मध्यस्थ सन्तापका कारण नहीं होता।

दोहा।

अरुण अंधर कुच कठिन दग, भौह चपल दुख देत ।

सुथिर रूप रोमावली, ताप करत किहि हेत ? ॥१५॥

सार—स्त्रियोंका अहङ्क-प्रत्यहङ्क यहाँ तक कि, एक-एक बाल पुरुषके मनमें सन्ताप पैदा करता है। विशेष क्या, “स्त्री” नाम ही सन्तापकारक है।

( ६४ )

15. If high breasts, restless eyes, moving brows and the two lips like new leaves give pain to a lustful man, they are justified in doing so because ( Cupid ) Kamadev has marked the words "Good fortune" in the forehead of a woman, but it is incomprehensible why that line of hair passing through the middle of the belly aggravates the pain which as an arbitrator should abate it.

गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता ।

शनैश्चराभ्यां पादाम्ब्यां रेजे ग्रहमयीव सा ॥१६॥

वह स्त्री गुरु स्तनोके भारसे, भास्करके समान प्रकाशमान मुख-चन्द्रसे और शनैश्चरके सट्ठ मन्दगामी दोनों चरणोंसे ग्रहमयी सी मालूम होती है ॥१६॥

खुलासा—वह स्त्री अपने पूर्णोन्नत बृहस्पतिके समान दोनों कुर्चोंसे, सूर्योके समान प्रकाशमान मुखचन्द्रसे और मन्दगामी शनैश्चरके समान धीरे-धीरे चलनेवाले दोनों चरणकमलोंसे ग्रह-पुञ्ज या रौशन मज्जमा-उल-नजूम सी जान पड़ती है ।

बृहस्पति, चन्द्रमा, सूरज और शनैश्चर—इन तेजस्वी ग्रहोंके चिह्न स्त्रीमें पाये जाते हैं । इसीसे कवि महोदय कहते हैं कि, वह नाज़नी-ग्रहमयीसी शोभित होती है । उसके स्तन-

ॐ गुरु, भास्वान् प्रभृति शब्दोंके दो-दो अर्थ हैं । जैसे, गुरु=भारी और बृहस्पति । चन्द्रमा=चन्द्रवत् और चन्द्रमा । भास्वान्=प्रकाशमान और सूरज । शनैश्चर=मन्दगामी और शनैश्चर । सनीचर मन्दगामी प्रसिद्ध है ।

( ६५ )

द्वय गुरु—भारी हैं, मुख सूरज और चाँदसा है और चरण मन्द-गामी शनैश्चरकी तरह मन्दगामी हैं। स्पष्ट है कि, उसके शरीरमें सभी तेजस्वी ग्रहोंका निवास है अथवा नवग्रह उसके सेवक हैं ; अतएव खीके होते नवग्रहोंके पूजनकी ज़रूरत नहीं ; क्योंकि एकमात्र उसकी पूजा-आराधनासे सभी फलोंकी प्राप्ति हो सकती है।

मिष्टर हारश्रव नामक एक पाश्चात्य विद्वान् भी स्त्रियोंको आकाशके सितारोंकी तरह पृथ्वीके सितारे कहते हैं। आप लिखते हैं :—“Women are the poetry of the world in the same sense as the stars are the poetry of heaven. Clear, light-giving, harmonious, they are the terrestrial planets that rule the destinies of mankind” जिस प्रकार नक्षत्र नमके आभूषण हैं ; उसी प्रकार स्त्रियाँ पृथ्वीकी आभूषण हैं। वे स्वच्छ-निर्मल, प्रकाशमान और शान्तिप्रद पार्श्व नक्षत्र हैं, जो मनुष्य-जातिके भाग्यका निपटारा करती हैं ; अर्थात् पुरुषोंके भाग्यका फैसला स्त्रियोंके हाथोंमें है।

महाराजा प्रतापसिंहज्ज अपनी नीचे लिखी ऋचितामें, स्त्रीके शरीरमें नवग्रहोंका निवास स्पष्ट रूपसे दिखाते हैं :—उसके बाल राहुके समान हैं, उसका मुँह चन्द्रमाके समान शोभित है, उसके दोनों नेत्र सूर्य हैं, अलकें केतु हैं, मन्द-मन्द हँसना शुक्र है, वाणी बुध है, दोनों स्तन वृहस्पति हैं, कान मङ्गल है और उसकी

( ६६ )

मन्दी-मन्दी चाल शनैश्चर है । ऐसी महामनोहर नवग्रहमयी युवतीकी सेवकाई स्वयं नवग्रह करते हैं ; अतः उसके समान फलदायिनी और कौन है ?

छप्पय ।

केश राहु सम जान, चन्द्र सौ सोहत आनन । द्वादश में द्वे अर्क नैन, केतुहि श्लकानन ॥ मन्द हास है युक्त, बुधै बानी कहि जानो । सुरगुरु जान उरोज, कर्ण मंगलहि बखानो ॥ अति मन्द चाल सोई शनैश्चर, महामनोहर युवति यह । तेहि सम फलदायकको देखियत, जाको सेवत नवग्रह ॥१३॥

सार— मृगनयनी सुन्दरी नवयुवती प्रकाश- मान ग्रहपुञ्जके समान चित्ताकर्षक और मनो- हर होती है । उसकी हृदयहारिणी छविका वर्णन करना कठिन है ।

16. That woman bent under the load of heavy breasts, shining with moon-like face and walking with slow steps, looks like a planet. (Guru means heavy as well as Jupiter-planet. Sanaishchar means slow steps as well as Saturn—the poet takes these words in their duplicate meanings and says that she looks like planets.)

— * —

( ६० )

तस्याः स्तनौ यदि घनौ जवनं विहारि बकुलं च चारु तव चित्तं किमाकुलत्वम् ॥ पुरयं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा पुरयेर्विना न हि भवन्ति समीहितायः ॥१॥

हे चित्त ! उस स्त्रीके पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और सुन्दर मुँहको देखकर, क्या क्यों व्याकुल होते हो ? यदि तुम उसके कठोर स्तनों प्रश्रुतिका आनन्द लेना ही चाहते हो, तो पुरय करो ; क्योंकि बिना पुरय किये मनोरथ सिद्ध नहीं होते ॥१॥

खुलासा—हे मन ! उसके मोटे-मोटे और उठे हुए दोनों कुम्भों, चित्ताकर्षक नितम्भों और स्वर्गीय अप्सराओंके समान चन्द्र- मुखको देखकर क्यों कुदृता है ? पर-स्त्री पर मन चलाना उचित नहीं । अगर परमात्माने तुम्हें मनोमुखधर रूप, उठी हुई छातियों और पतली कमरवाली सुन्दरी नहीं दी है, तो जैसी दी है, उसी पर सन्तोष कर । कहा है—

देख पराई चूपड़ी, क्यों ललचावे जीव ? । रूखी-सूखी खायेके, ठण्डा पानी पीव ॥

हे मन ! पराई चुपड़ी हुई रोटियों पर क्यों ललचाता है, ईश्वरने तुम्हें जैसी रूखी-सूखी दी है, उसे ही खाकर, शीतल जल क्यों नहीं पीता ? अर्थात् पराई सुन्दरियों पर क्यों मन चलता है, परमात्माने तुम्हें जैसी सुरूप-कुरूप दी है, उसी पर सन्तोष क्यों नहीं करता ?

( ६८ )

परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—

देवदत्तां पतिभाव्यां विन्दते नेच्छयात्मनः।

जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—

उर्वशीसुरतचिन्तया ययौ संवयं किमु पुरुषा नृपः।

रक्षणाय निज जीवितस्य तत्संभजत्परवर्धुं न कामतः ॥

महाराज पुरुरवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।

और भी कहा है।

लंकेश्वर जनकजा हरण्येन बाली

तारापहारकतयाप्यथ कीचकास्यः ॥

पाञ्चालिका ग्रहणतो निधनं जगाम

तच्छ्रुते सापि परदारसति न कांचोत् ॥

लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।

हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुबोंवाली स्त्रियोंके

भूतशक्तिक

है मन ! उस कामिनी के पुष्ट स्तनों, मनोहर जीवों और चन्द्रमुख को देखकर क्यों व्याकुल होते हैं ? अगर तुम उसके कटोर कुचों और मनोहर जीवों को गौरः का ज्ञानन्द लेना चाहते हो, तो परोपकार-पुण्य सम्भव करो ; अर्थात् सुन्दरी भूतनयनी पुण्य-कर्म करने से मिलती है ।

(पृष्ठ ४३)

Popular Press-Calcutta.

( ६८ )

परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—

देवदत्तां पतिभ्याभ्यां चिन्दते नेच्छयात्मनः।

जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—

उर्वशीसुरतचित्तया ययौ संजयं किमु पुरुषा तृपः।

रक्षणाय निज जीवितस्य तत् संभजेत्परवर्धुं न कामतः॥

महाराज पुरुषवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।

और भी कहा है।

लंकेरवर जनकजा हरणोन बाली

तारापहारकतयाप्यथ कीचकाख्यः॥

पाञ्चालिका महणातो निधनं जगाम

तच्छ्रुते सापि परदाररति न कांक्षेत्॥

लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।

हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुचोंवाली स्त्रियोंके

भूहारशतक

हो मने ! उस कामिनी के पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और चन्द्रमुख को देखकर क्यों व्याकुल होते हो ? अगर तुम उसके कठोर कुचों और मनोहर जंघाओं वगैरः का आनन्द लेना चाहते हो, तो परोपकार-पुण्य सख्य करो ; अर्थात् सुन्दरी भुगतयनी पुण्य-कर्म करने से मिलती (पृष्ठ ४३)

Popular Press—Calcutta.

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( ६६ )

साथ रमण करनेकी ही इच्छा रखता है; तो इस जन्ममें परोपकार-पुण्य कर ; पुण्यके प्रतापसे तुझे कमनासी बाँकी भुक्तियों तथा स्थूल जाँघों और षष्ठन पक्षीकेसे नेत्रोंवाली, जवानीके नशेमें चूर और प्रेमसे प्रफुल्लित सुमुखी नारी अवश्य मिलेगी। वैश्य रख, अधीर मत हो। देख, परिडतराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास” में कहते हैं और बिल्कुल ठीक कहते हैं :—

लभ्यते पुण्यैर्गृहिणी मनोज्ञा तथा सपुत्राः परितः पवित्राः ।

स्फीतं यशस्तैः समुदेति नित्यं तेनास्य नित्यः खलु नाकलोकः ॥

पुण्यसे सुन्दर स्त्री मिलती है ; स्त्रीसे सच्चरित्र सुपुत्र होते हैं ; सुपुत्रोंसे विमल यश दिनों-दिन फैलता है और यशसे यह लोक स्वर्गके समान हो जाता है।

कुण्डलिया ।

रे चित ! जो चाहे रमण, कुछ कठोर नव नार ।

तो तू कर कछु सुकृत अब, मिले जु वह सुकुमार ॥

मिले जु वह सुकुमार, बंक भौ जघन विहारी ।

सुन्दर मुख मृदु हास, कंजसी अँखियाँ कारी ॥

यौवन मद भरपूर, प्रेमसों सदा प्रफुल्लित ।

मत अधीर घर धीर, मिले वह अवस, अरे चित ! ॥ १७ ॥

सार—अगर उठती जवानीकी कमलनयनी सुन्दरी कामिनी पर मन चलता है, तो पुण्य संचय करो।

( ३० )

17. O my mind, why are you troubled at the sight of a woman whose breasts are firm and protuberent, whose thighs are fit for enjoying and whose face is lovely. If you have a desire for them, then practise virtue, because your wishes are not to be fulfilled without it.

मात्स्यमुत्सार्थं विचार्य कार्य-

मार्याः समर्थादभिदं वदन्तु ॥

सेव्या नितम्बः किमु भूशराणा-

मुत स्मरस्मरेविलसिनिनाम ॥१८॥

हे योग्यायोग्यके विचारमें निपुण श्रेष्ठ पुरुषो ! आप पक्षपात को छोड़, कर्तव्य-कर्मको विचार, और शास्त्रोंको देखकर यह बात कहिये कि, इस लोकमें जन्म लेकर मनुष्यको पर्वतोंके नितम्ब सेवन करने चाहियें अथवा कामदेवकी उर्गसेसे मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई विलासवती तरुणी स्त्रियोंके नितम्ब ॥१८॥

खुलासा-विद्वानो ! आप शास्त्रोंको विचार कर, साथ ही ईश्वर व या पक्षपातको त्यागकर, इस बातका फैसला कीजिये, कि मनुष्यको इस दुनियामें आकर, स्त्रियोंके नितम्ब* सेवन करने चाहियें या पर्वतोंके नितम्ब ; अर्थात् उन्हें संसारमें आकर पर्वत-गुहामें वास करना चाहिये अथवा मोटी-मोटी जाँघों, कठोर कुचों और स्थूल नितम्बोंवाली स्त्रियोंके साथ भोग-विलास करना चाहिये ।

❖ नितम्बके दो अर्थ हैं :—( १ ) पर्वतका बीचका भाग, ( २ ) कमरका पिछला हिस्सा यानी वृत्त ।

( ७१ )

स्त्री-भोग और हरि-भजन,—ये दोनों ही काम उत्तम हैं। संसारियोंके लिये पहला और संसारसे उदासीनोंके लिये दूसरा अच्छा है। जिन्हें नवयुवती स्त्रियोंका भोग-विलास पसन्द हो, वे धनार्जन करें और उन्हें भोगें; पर साथ ही पुण्य सञ्चय भी करें; ताकि उन्हें इस सफ़रके बाद, अगले मुकाम पर भी; यानी आगे होनेवाले जन्ममें भी, फिर मृगनयनी स्त्रियाँ और अन्यान्य सम्पदायें मिलें। पर इस भोग-विलासमें बारम्बार मरते और जन्म लेनेका घोर कष्ट है। अतः जो जन्म-मरणके कष्टोंसे बचना चाहें, अनन्तकालस्थायी सुख भोगना चाहें, वे सुन्दरी-से-सुन्दरी स्त्रीको पापोंकी खान, दुःखोंकी मूल और नरककी नसैनी समझ, निर्जन गहन वनमें जा, किसी पर्वतकी गुफामें बस, सर्व मनोरथदाता पद्मपलाशलोचन हरिका एकान्न चित्तसे ध्यान करें।

दोहा ।

नीच वचन सुन अनख तज, करहु काज लहि भेव ।

कै तो सेवो गिरिवरन्, कै कामिनि-कुच सेव ॥१८॥

सार—सांसारियों के लिये नवयुवतियोंको भोगना और विरक्तोंके लिये पर्वत-गुहाओंमें हरिभजन करना उचित है। जो इन दोनोंमेंसे एक भी काम नहीं करते, उनका जन्म लेना बुरा है।

( ७२ )

18. O learned men, tell us without any jealousy and with fair consideration whether it is desirable to dwell on and enjoy the middle part of a mountain or to enjoy the hips or charming buttocks of an amorous woman smiling with the excess of passion.

—*

संसारेऽस्मिन्नसारे परिणितिरले द्वे गतीं पण्डितानां तत्त्वज्ञानामृताम्भः कृतललितधियां यातु कालः कदाचित् ॥ नो चैन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजवनभराभोगसंभोगिनानां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलोलेयतानाम् ॥१६॥

इस असार संसारमें, जिसकी अन्तिम अवस्था अतीव चञ्चल है, उन्हीं बुद्धिमानोंका समय अच्छी तरह कटता है, जिनकी बुद्धि तत्त्वज्ञान रूपी अमृत-सरोवरमें बारम्बार गोते लगानेसे निर्मल हो गई है अथवा उन्हींका समय अच्छी तरह अतिवाहित होता है, जो नवयौवनाओंके कठोर और स्थूल कुचों एवं सवन जङ्घाओंको सकाम स्पर्श कर, कामदेवका सुख उपभोग करते हैं ॥१६॥

खुलासा—इस मिथ्या और चञ्चल संसारमें या तो उन्हींके दिन अच्छी तरह व्यतीत होते हैं, जो ब्रह्म-विचारमें लीन रहते हैं अथवा उन्हींके दिन अच्छी तरह कटते हैं, जो सख्त् और मोटे-कुचों तथा गुदगुदी जङ्घाओंवाली नवयुवतियोंको अपने शरीर से चिपटाये, काम की उमङ्गसे मस्त होकर, उनके भोग-विलास का आनन्द लूटते हैं।

पुस्तकपालन

इस लोक में जन्म लेकर पृथ्वी की परीक्षा के निरपेक्ष संवेग करने चाहिये अथवा आपसमें जो समझ से युक्तताओं हुई विचारधाराओं बसणीं किसी के निमज्ज । [ पृष्ठ ४५ ]

Popular Press - Calcutta.

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( ७२ )

जो मृगनयनी कामिनियोंका भोगते हैं, उनके दिन बड़े सुखसे कटते हैं। उन्हें मालूम नहीं होता कि, कब दिन निकलता है और कब रात होती है; दिन-पर-दिन, पक्ष-पर-पक्ष, मास-पर-मास, और वर्ष-पर-वर्ष आते हैं और चले जाते हैं; किन्तु जो कामिनियों के साथ रमण नहीं करते, उनके दिन बुरी तरहसे कटते हैं। उन्हें एक-एक क्षण एक-एक वर्ष मालूम होता और जीवन भारवत् प्रतीत होता है। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

कल शवे वस्त्रमें, क्या जल्द कटी थीं बड़ियाँ।

आज क्या मर गये, घड़ियाल बजाने वाले ?॥

कल भोग-चिलासमें रात कैसी जल्दी कट गई ! आज तो रात बीतती ही नहीं ! क्या आज घण्टा बजानेवाले मर गये ?

और भी किसीने कहा है :—

अय्याम मुसीबतके, तो काटे नहीं कटते।

दिन ऐशकी घड़ियोंमें, गुजर जाते हैं कैसे ॥

दुःखके दिन तो काटे नहीं कटते; पर ऐशके दिन सहजमें कट जाते हैं।

मतलब यह है कि, कोमलाड़ियोंके साथ समय हवा की तरह बीतता है; पर जिनके माशूकाएँ नहीं हैं; उनके दिन पहाड़ हो जाते हैं। हाँ, उनके दिन भी परमानन्दमें हवाकी तेजीसे बीतते हैं, जो ब्रह्मानन्दमें लीन रहते हैं; लेकिन जो न तो ईश्वरका ध्यान करते हैं और न सुन्दरियोंका सुख लूटते हैं, उनके दिन काटेसे भी नहीं कटते।

( ७४ )

वैराग्यपक्ष ।

इस नापायेदार चन्द्रगुप्ता दुनियामें जन्म लेकर, विद्वानोंको दो राहोंमेंसे किसी एक पर चलना चाहिये :— ( १ ) या तो ब्रह्म-विद्याका अमृत पीना चाहिये, अथवा ( २ ) नवयुवती रम-गियोंके सुरतमें मग्न रहना चाहिये ।

रसिक कवि कहते हैं :—

त्याग लोक-सुख या रहें, मत्त परात्मा ध्यान ।

रमणी-रतिमें रत रहें, अथवा रसिक सुजान ॥

यद्यपि अपनी-अपनी रुचिके अनुसार दोनों राहें ही अच्छी हैं ; पर पहली की होड़ दूसरी राह कर नहीं सकती । उसके सुखमें कमी-बेशी—क्षय और वृद्धि तथा अनस्थिरता नहीं । उसका सुख सच्चा और अनन्तकाल-स्थायी तथा अक्षय है । उसमेंसे सदा पीयूष-धारा गिरा करती है ; पर दूसरीके सुखमें कमी-बेशी हुआ करती है । इसका सुख मिथ्या और क्षणस्थायी है । इसमेंसे जो अमृत-विन्दु टपकते हैं, वे वास्तवमें अमृत-विन्दु नहीं, किन्तु विष-विन्दु हैं ; लेकिन मोहसे अमृतसे जान पड़ते हैं । अब बुद्धिमान स्वयं विचार लें और जिस राहको अपने हृदयमें अच्छी समझें, उसे अवलोक्य करें ।

व्यप्य ।

अल्पसार संसार, तहाँ द्वै वात शिरोमनि ।

ज्ञान अमृतके सिन्धु, मगन है रहै रहै बुद्धिनि ॥

( ७५ )

नित्य-प्रनित्य विचार, सहित सब साधन साधें । की यह प्रौढ़ा नारि, धारि उर में आराधें ॥ चैतन्य मदन-शंकुश परसि, तिसकत मसकत करत रिश । रस मसत कसत विलसत हैंसत, इह विधि वितवत दिवसनिशि ॥ १६ ॥

सार—यदि सुखसे जीवन व्यतीत करना हो, तो दो में से एक काम करो:—या तो संसारसे मोह त्याग, एकाग्रचित्तसे, यशोदानन्दन कृष्णके कमल-चरणों की, निष्काम, भक्ति करो अथवा सुन्दरी रमणियों के रतिकेलि में मस्त रहो ।

19. In this unsubstantial world which has a very unsteady ending, there are only two courses for the wise. Either he spends his time by sharpening his intellect in nectar-like spiritual knowledge or he spends his time by laying his hands at and enjoying the body of a lovely and amorous woman having thick breasts,

मुखेन चन्द्रकान्तेन महानीलैः शिरोरुहैः ।

पाणिभ्यां पद्मरागाभ्यां रेजे रत्नमयीव सा ॥२०॥

चन्द्रकान्तेसे मुख, महानील जैसे केश और पद्मरागके समान दोनों हाथोंसे वह ल्नी रत्नमयी सी मालूम होती है* ॥२०॥

❖ यों भी कह सकते हैं कि, वह नाजनी अपने चन्द्रमाकी सी कान्ति वाले मुख, चोर नीले रंगके बाल और कमलके समान लाल हाथोंसे अपूर्व

( ७६ )

खुलासा—उस स्त्रीका शरीर बहुमूल्य रत्नोंसे बना हुआ मालूम होता है ; क्योंकि उसका चेहरा चन्द्रकान्त मणिके सदृश, उसके गहरे नीले बाल नीलमणिके समान और उसकी सुखं हथेलियाँ पद्मराग मणिके जैसी हैं ।

उस स्त्रीके अंग-प्रत्यङ्ग रत्नोंके समान शोभायमान हैं । उसके चन्द्रसम मुखको देखकर चन्द्रकान्त मणिका, उसके नीले बालोंको देखकर नीलमका और लाल कमल सी हथेलियोंको देखकर लालों या पद्मराग-मणिका धोखा होता है ।

गुज़ब की खूबसूरती है ! बलाका हुन्न है ! अगर वह कामिनी कहीं जवाहिर-जड़े हुए जेवर पहन ले, तब तो, बकौल महाकवि दाग, औरभी गुज़ब हो जाय :—

एक तो हुस्न बलाका, उसपै बनावट आफ़त ।

घर बिगाड़ेंगे हज़ारोंके, सँवरने वाले ॥

एक तो परले सिरकी खूबसूरती है ही और फिर उस पर सजावट है । ये सजने-सँवरने वाले हज़ारोंके घर बिगाड़ेंगे ।

देखना ऐ जौक ! होंगे आज फिर लाखोंके खून ।

फिर जमाया उसने, लाले लवपै लाखा पानका ॥ जौक ।

छन्दरी मालूम होती है । क्योंकि चन्द्रकान्त, महानौल और पद्मराग शब्दोंके दो-दो अर्थ हैं । जैसे, चन्द्रकान्त=(१) चन्द्रमाकी सी कान्ति-वाला, (२) चन्द्रकान्त मणि । महानौल=(१) बोर नीला, (२) नौलमणि या नीलम । पद्मराग=(१) कमलके समान छल, (२) पद्मरागमणि, जाल या माषिक ।