शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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तस्याः स्तनौ यदि घनौ जवनं विहारि बकुलं च चारु तव चित्तं किमाकुलत्वम् ॥ पुरयं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा पुरयेर्विना न हि भवन्ति समीहितायः ॥१॥
हे चित्त ! उस स्त्रीके पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और सुन्दर मुँहको देखकर, क्या क्यों व्याकुल होते हो ? यदि तुम उसके कठोर स्तनों प्रश्रुतिका आनन्द लेना ही चाहते हो, तो पुरय करो ; क्योंकि बिना पुरय किये मनोरथ सिद्ध नहीं होते ॥१॥
खुलासा—हे मन ! उसके मोटे-मोटे और उठे हुए दोनों कुम्भों, चित्ताकर्षक नितम्भों और स्वर्गीय अप्सराओंके समान चन्द्र- मुखको देखकर क्यों कुदृता है ? पर-स्त्री पर मन चलाना उचित नहीं । अगर परमात्माने तुम्हें मनोमुखधर रूप, उठी हुई छातियों और पतली कमरवाली सुन्दरी नहीं दी है, तो जैसी दी है, उसी पर सन्तोष कर । कहा है—
देख पराई चूपड़ी, क्यों ललचावे जीव ? । रूखी-सूखी खायेके, ठण्डा पानी पीव ॥
हे मन ! पराई चुपड़ी हुई रोटियों पर क्यों ललचाता है, ईश्वरने तुम्हें जैसी रूखी-सूखी दी है, उसे ही खाकर, शीतल जल क्यों नहीं पीता ? अर्थात् पराई सुन्दरियों पर क्यों मन चलता है, परमात्माने तुम्हें जैसी सुरूप-कुरूप दी है, उसी पर सन्तोष क्यों नहीं करता ?