शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
( ६० )
तस्याः स्तनौ यदि घनौ जवनं विहारि बकुलं च चारु तव चित्तं किमाकुलत्वम् ॥ पुरयं कुरुष्व यदि तेषु तवास्ति वाञ्छा पुरयेर्विना न हि भवन्ति समीहितायः ॥१॥
हे चित्त ! उस स्त्रीके पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और सुन्दर मुँहको देखकर, क्या क्यों व्याकुल होते हो ? यदि तुम उसके कठोर स्तनों प्रश्रुतिका आनन्द लेना ही चाहते हो, तो पुरय करो ; क्योंकि बिना पुरय किये मनोरथ सिद्ध नहीं होते ॥१॥
खुलासा—हे मन ! उसके मोटे-मोटे और उठे हुए दोनों कुम्भों, चित्ताकर्षक नितम्भों और स्वर्गीय अप्सराओंके समान चन्द्र- मुखको देखकर क्यों कुदृता है ? पर-स्त्री पर मन चलाना उचित नहीं । अगर परमात्माने तुम्हें मनोमुखधर रूप, उठी हुई छातियों और पतली कमरवाली सुन्दरी नहीं दी है, तो जैसी दी है, उसी पर सन्तोष कर । कहा है—
देख पराई चूपड़ी, क्यों ललचावे जीव ? । रूखी-सूखी खायेके, ठण्डा पानी पीव ॥
हे मन ! पराई चुपड़ी हुई रोटियों पर क्यों ललचाता है, ईश्वरने तुम्हें जैसी रूखी-सूखी दी है, उसे ही खाकर, शीतल जल क्यों नहीं पीता ? अर्थात् पराई सुन्दरियों पर क्यों मन चलता है, परमात्माने तुम्हें जैसी सुरूप-कुरूप दी है, उसी पर सन्तोष क्यों नहीं करता ?
( ६८ )
परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—
देवदत्तां पतिभाव्यां विन्दते नेच्छयात्मनः।
जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—
उर्वशीसुरतचिन्तया ययौ संवयं किमु पुरुषा नृपः।
रक्षणाय निज जीवितस्य तत्संभजत्परवर्धुं न कामतः ॥
महाराज पुरुरवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।
और भी कहा है।
लंकेश्वर जनकजा हरण्येन बाली
तारापहारकतयाप्यथ कीचकास्यः ॥
पाञ्चालिका ग्रहणतो निधनं जगाम
तच्छ्रुते सापि परदारसति न कांचोत् ॥
लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।
हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुबोंवाली स्त्रियोंके
भूतशक्तिक
है मन ! उस कामिनी के पुष्ट स्तनों, मनोहर जीवों और चन्द्रमुख को देखकर क्यों व्याकुल होते हैं ? अगर तुम उसके कटोर कुचों और मनोहर जीवों को गौरः का ज्ञानन्द लेना चाहते हो, तो परोपकार-पुण्य सम्भव करो ; अर्थात् सुन्दरी भूतनयनी पुण्य-कर्म करने से मिलती है ।
(पृष्ठ ४३)
Popular Press-Calcutta.
( ६८ )
परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—
देवदत्तां पतिभ्याभ्यां चिन्दते नेच्छयात्मनः।
जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—
उर्वशीसुरतचित्तया ययौ संजयं किमु पुरुषा तृपः।
रक्षणाय निज जीवितस्य तत् संभजेत्परवर्धुं न कामतः॥
महाराज पुरुषवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।
और भी कहा है।
लंकेरवर जनकजा हरणोन बाली
तारापहारकतयाप्यथ कीचकाख्यः॥
पाञ्चालिका महणातो निधनं जगाम
तच्छ्रुते सापि परदाररति न कांक्षेत्॥
लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।
हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुचोंवाली स्त्रियोंके
भूहारशतक
हो मने ! उस कामिनी के पुष्ट स्तनों, मनोहर जाँघों और चन्द्रमुख को देखकर क्यों व्याकुल होते हो ? अगर तुम उसके कठोर कुचों और मनोहर जंघाओं वगैरः का आनन्द लेना चाहते हो, तो परोपकार-पुण्य सख्य करो ; अर्थात् सुन्दरी भुगतयनी पुण्य-कर्म करने से मिलती (पृष्ठ ४३)
Popular Press—Calcutta.
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( ६६ )
साथ रमण करनेकी ही इच्छा रखता है; तो इस जन्ममें परोपकार-पुण्य कर ; पुण्यके प्रतापसे तुझे कमनासी बाँकी भुक्तियों तथा स्थूल जाँघों और षष्ठन पक्षीकेसे नेत्रोंवाली, जवानीके नशेमें चूर और प्रेमसे प्रफुल्लित सुमुखी नारी अवश्य मिलेगी। वैश्य रख, अधीर मत हो। देख, परिडतराज जगन्नाथ अपने “भामिनी-विलास” में कहते हैं और बिल्कुल ठीक कहते हैं :—
लभ्यते पुण्यैर्गृहिणी मनोज्ञा तथा सपुत्राः परितः पवित्राः ।
स्फीतं यशस्तैः समुदेति नित्यं तेनास्य नित्यः खलु नाकलोकः ॥
पुण्यसे सुन्दर स्त्री मिलती है ; स्त्रीसे सच्चरित्र सुपुत्र होते हैं ; सुपुत्रोंसे विमल यश दिनों-दिन फैलता है और यशसे यह लोक स्वर्गके समान हो जाता है।
कुण्डलिया ।
रे चित ! जो चाहे रमण, कुछ कठोर नव नार ।
तो तू कर कछु सुकृत अब, मिले जु वह सुकुमार ॥
मिले जु वह सुकुमार, बंक भौ जघन विहारी ।
सुन्दर मुख मृदु हास, कंजसी अँखियाँ कारी ॥
यौवन मद भरपूर, प्रेमसों सदा प्रफुल्लित ।
मत अधीर घर धीर, मिले वह अवस, अरे चित ! ॥ १७ ॥
सार—अगर उठती जवानीकी कमलनयनी सुन्दरी कामिनी पर मन चलता है, तो पुण्य संचय करो।
( ३० )
17. O my mind, why are you troubled at the sight of a woman whose breasts are firm and protuberent, whose thighs are fit for enjoying and whose face is lovely. If you have a desire for them, then practise virtue, because your wishes are not to be fulfilled without it.
मात्स्यमुत्सार्थं विचार्य कार्य-
मार्याः समर्थादभिदं वदन्तु ॥
सेव्या नितम्बः किमु भूशराणा-
मुत स्मरस्मरेविलसिनिनाम ॥१८॥
हे योग्यायोग्यके विचारमें निपुण श्रेष्ठ पुरुषो ! आप पक्षपात को छोड़, कर्तव्य-कर्मको विचार, और शास्त्रोंको देखकर यह बात कहिये कि, इस लोकमें जन्म लेकर मनुष्यको पर्वतोंके नितम्ब सेवन करने चाहियें अथवा कामदेवकी उर्गसेसे मन्द-मन्द मुस्कुराती हुई विलासवती तरुणी स्त्रियोंके नितम्ब ॥१८॥
खुलासा-विद्वानो ! आप शास्त्रोंको विचार कर, साथ ही ईश्वर व या पक्षपातको त्यागकर, इस बातका फैसला कीजिये, कि मनुष्यको इस दुनियामें आकर, स्त्रियोंके नितम्ब* सेवन करने चाहियें या पर्वतोंके नितम्ब ; अर्थात् उन्हें संसारमें आकर पर्वत-गुहामें वास करना चाहिये अथवा मोटी-मोटी जाँघों, कठोर कुचों और स्थूल नितम्बोंवाली स्त्रियोंके साथ भोग-विलास करना चाहिये ।
❖ नितम्बके दो अर्थ हैं :—( १ ) पर्वतका बीचका भाग, ( २ ) कमरका पिछला हिस्सा यानी वृत्त ।
( ७१ )
स्त्री-भोग और हरि-भजन,—ये दोनों ही काम उत्तम हैं। संसारियोंके लिये पहला और संसारसे उदासीनोंके लिये दूसरा अच्छा है। जिन्हें नवयुवती स्त्रियोंका भोग-विलास पसन्द हो, वे धनार्जन करें और उन्हें भोगें; पर साथ ही पुण्य सञ्चय भी करें; ताकि उन्हें इस सफ़रके बाद, अगले मुकाम पर भी; यानी आगे होनेवाले जन्ममें भी, फिर मृगनयनी स्त्रियाँ और अन्यान्य सम्पदायें मिलें। पर इस भोग-विलासमें बारम्बार मरते और जन्म लेनेका घोर कष्ट है। अतः जो जन्म-मरणके कष्टोंसे बचना चाहें, अनन्तकालस्थायी सुख भोगना चाहें, वे सुन्दरी-से-सुन्दरी स्त्रीको पापोंकी खान, दुःखोंकी मूल और नरककी नसैनी समझ, निर्जन गहन वनमें जा, किसी पर्वतकी गुफामें बस, सर्व मनोरथदाता पद्मपलाशलोचन हरिका एकान्न चित्तसे ध्यान करें।
दोहा ।
नीच वचन सुन अनख तज, करहु काज लहि भेव ।
कै तो सेवो गिरिवरन्, कै कामिनि-कुच सेव ॥१८॥
सार—सांसारियों के लिये नवयुवतियोंको भोगना और विरक्तोंके लिये पर्वत-गुहाओंमें हरिभजन करना उचित है। जो इन दोनोंमेंसे एक भी काम नहीं करते, उनका जन्म लेना बुरा है।
( ७२ )
18. O learned men, tell us without any jealousy and with fair consideration whether it is desirable to dwell on and enjoy the middle part of a mountain or to enjoy the hips or charming buttocks of an amorous woman smiling with the excess of passion.
—*
संसारेऽस्मिन्नसारे परिणितिरले द्वे गतीं पण्डितानां तत्त्वज्ञानामृताम्भः कृतललितधियां यातु कालः कदाचित् ॥ नो चैन्मुग्धाङ्गनानां स्तनजवनभराभोगसंभोगिनानां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलोलेयतानाम् ॥१६॥
इस असार संसारमें, जिसकी अन्तिम अवस्था अतीव चञ्चल है, उन्हीं बुद्धिमानोंका समय अच्छी तरह कटता है, जिनकी बुद्धि तत्त्वज्ञान रूपी अमृत-सरोवरमें बारम्बार गोते लगानेसे निर्मल हो गई है अथवा उन्हींका समय अच्छी तरह अतिवाहित होता है, जो नवयौवनाओंके कठोर और स्थूल कुचों एवं सवन जङ्घाओंको सकाम स्पर्श कर, कामदेवका सुख उपभोग करते हैं ॥१६॥
खुलासा—इस मिथ्या और चञ्चल संसारमें या तो उन्हींके दिन अच्छी तरह व्यतीत होते हैं, जो ब्रह्म-विचारमें लीन रहते हैं अथवा उन्हींके दिन अच्छी तरह कटते हैं, जो सख्त् और मोटे-कुचों तथा गुदगुदी जङ्घाओंवाली नवयुवतियोंको अपने शरीर से चिपटाये, काम की उमङ्गसे मस्त होकर, उनके भोग-विलास का आनन्द लूटते हैं।
पुस्तकपालन
इस लोक में जन्म लेकर पृथ्वी की परीक्षा के निरपेक्ष संवेग करने चाहिये अथवा आपसमें जो समझ से युक्तताओं हुई विचारधाराओं बसणीं किसी के निमज्ज । [ पृष्ठ ४५ ]
Popular Press - Calcutta.
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( ७२ )
जो मृगनयनी कामिनियोंका भोगते हैं, उनके दिन बड़े सुखसे कटते हैं। उन्हें मालूम नहीं होता कि, कब दिन निकलता है और कब रात होती है; दिन-पर-दिन, पक्ष-पर-पक्ष, मास-पर-मास, और वर्ष-पर-वर्ष आते हैं और चले जाते हैं; किन्तु जो कामिनियों के साथ रमण नहीं करते, उनके दिन बुरी तरहसे कटते हैं। उन्हें एक-एक क्षण एक-एक वर्ष मालूम होता और जीवन भारवत् प्रतीत होता है। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—
कल शवे वस्त्रमें, क्या जल्द कटी थीं बड़ियाँ।
आज क्या मर गये, घड़ियाल बजाने वाले ?॥
कल भोग-चिलासमें रात कैसी जल्दी कट गई ! आज तो रात बीतती ही नहीं ! क्या आज घण्टा बजानेवाले मर गये ?
और भी किसीने कहा है :—
अय्याम मुसीबतके, तो काटे नहीं कटते।
दिन ऐशकी घड़ियोंमें, गुजर जाते हैं कैसे ॥
दुःखके दिन तो काटे नहीं कटते; पर ऐशके दिन सहजमें कट जाते हैं।
मतलब यह है कि, कोमलाड़ियोंके साथ समय हवा की तरह बीतता है; पर जिनके माशूकाएँ नहीं हैं; उनके दिन पहाड़ हो जाते हैं। हाँ, उनके दिन भी परमानन्दमें हवाकी तेजीसे बीतते हैं, जो ब्रह्मानन्दमें लीन रहते हैं; लेकिन जो न तो ईश्वरका ध्यान करते हैं और न सुन्दरियोंका सुख लूटते हैं, उनके दिन काटेसे भी नहीं कटते।
( ७४ )
वैराग्यपक्ष ।
इस नापायेदार चन्द्रगुप्ता दुनियामें जन्म लेकर, विद्वानोंको दो राहोंमेंसे किसी एक पर चलना चाहिये :— ( १ ) या तो ब्रह्म-विद्याका अमृत पीना चाहिये, अथवा ( २ ) नवयुवती रम-गियोंके सुरतमें मग्न रहना चाहिये ।
रसिक कवि कहते हैं :—
त्याग लोक-सुख या रहें, मत्त परात्मा ध्यान ।
रमणी-रतिमें रत रहें, अथवा रसिक सुजान ॥
यद्यपि अपनी-अपनी रुचिके अनुसार दोनों राहें ही अच्छी हैं ; पर पहली की होड़ दूसरी राह कर नहीं सकती । उसके सुखमें कमी-बेशी—क्षय और वृद्धि तथा अनस्थिरता नहीं । उसका सुख सच्चा और अनन्तकाल-स्थायी तथा अक्षय है । उसमेंसे सदा पीयूष-धारा गिरा करती है ; पर दूसरीके सुखमें कमी-बेशी हुआ करती है । इसका सुख मिथ्या और क्षणस्थायी है । इसमेंसे जो अमृत-विन्दु टपकते हैं, वे वास्तवमें अमृत-विन्दु नहीं, किन्तु विष-विन्दु हैं ; लेकिन मोहसे अमृतसे जान पड़ते हैं । अब बुद्धिमान स्वयं विचार लें और जिस राहको अपने हृदयमें अच्छी समझें, उसे अवलोक्य करें ।
व्यप्य ।
अल्पसार संसार, तहाँ द्वै वात शिरोमनि ।
ज्ञान अमृतके सिन्धु, मगन है रहै रहै बुद्धिनि ॥
( ७५ )
नित्य-प्रनित्य विचार, सहित सब साधन साधें । की यह प्रौढ़ा नारि, धारि उर में आराधें ॥ चैतन्य मदन-शंकुश परसि, तिसकत मसकत करत रिश । रस मसत कसत विलसत हैंसत, इह विधि वितवत दिवसनिशि ॥ १६ ॥
सार—यदि सुखसे जीवन व्यतीत करना हो, तो दो में से एक काम करो:—या तो संसारसे मोह त्याग, एकाग्रचित्तसे, यशोदानन्दन कृष्णके कमल-चरणों की, निष्काम, भक्ति करो अथवा सुन्दरी रमणियों के रतिकेलि में मस्त रहो ।
19. In this unsubstantial world which has a very unsteady ending, there are only two courses for the wise. Either he spends his time by sharpening his intellect in nectar-like spiritual knowledge or he spends his time by laying his hands at and enjoying the body of a lovely and amorous woman having thick breasts,
मुखेन चन्द्रकान्तेन महानीलैः शिरोरुहैः ।
पाणिभ्यां पद्मरागाभ्यां रेजे रत्नमयीव सा ॥२०॥
चन्द्रकान्तेसे मुख, महानील जैसे केश और पद्मरागके समान दोनों हाथोंसे वह ल्नी रत्नमयी सी मालूम होती है* ॥२०॥
❖ यों भी कह सकते हैं कि, वह नाजनी अपने चन्द्रमाकी सी कान्ति वाले मुख, चोर नीले रंगके बाल और कमलके समान लाल हाथोंसे अपूर्व
( ७६ )
खुलासा—उस स्त्रीका शरीर बहुमूल्य रत्नोंसे बना हुआ मालूम होता है ; क्योंकि उसका चेहरा चन्द्रकान्त मणिके सदृश, उसके गहरे नीले बाल नीलमणिके समान और उसकी सुखं हथेलियाँ पद्मराग मणिके जैसी हैं ।
उस स्त्रीके अंग-प्रत्यङ्ग रत्नोंके समान शोभायमान हैं । उसके चन्द्रसम मुखको देखकर चन्द्रकान्त मणिका, उसके नीले बालोंको देखकर नीलमका और लाल कमल सी हथेलियोंको देखकर लालों या पद्मराग-मणिका धोखा होता है ।
गुज़ब की खूबसूरती है ! बलाका हुन्न है ! अगर वह कामिनी कहीं जवाहिर-जड़े हुए जेवर पहन ले, तब तो, बकौल महाकवि दाग, औरभी गुज़ब हो जाय :—
एक तो हुस्न बलाका, उसपै बनावट आफ़त ।
घर बिगाड़ेंगे हज़ारोंके, सँवरने वाले ॥
एक तो परले सिरकी खूबसूरती है ही और फिर उस पर सजावट है । ये सजने-सँवरने वाले हज़ारोंके घर बिगाड़ेंगे ।
देखना ऐ जौक ! होंगे आज फिर लाखोंके खून ।
फिर जमाया उसने, लाले लवपै लाखा पानका ॥ जौक ।
छन्दरी मालूम होती है । क्योंकि चन्द्रकान्त, महानौल और पद्मराग शब्दोंके दो-दो अर्थ हैं । जैसे, चन्द्रकान्त=(१) चन्द्रमाकी सी कान्ति-वाला, (२) चन्द्रकान्त मणि । महानौल=(१) बोर नीला, (२) नौलमणि या नीलम । पद्मराग=(१) कमलके समान छल, (२) पद्मरागमणि, जाल या माषिक ।
( ७७ )
आज उन्होंने अपने लालकी तरह लाल ओठों पर पानका लाखा—रङ्ग—जमाया है। आज इस लाखेसे लाखों ही का धून हो जायगा।
वराहमिहिर महाशय महाराजा भर्तृहरिसे भी एक कदम आगे बढ़ गये हैं। उनकी समझमें, महाकवि दांग वगैरः की तरह, सजावटकी ज़रूरत ही नहीं। उनका ख्याल है कि, जिसे खूबी खुदाने दी, उसे जेवरकी क्या ज़रूरत? वह कहते हैं, खियों से ही रत्नों की शोभा है, न कि रत्नों से खियों की। क्योंकि खियों तो बिना रत्नों के धारण किये ही पुरुषों को अपने ऊपर लट्ठ करके अपना गुलाम बना सकती हैं। क्या रत्न भी, बिना खियोंके सुन्दर शरीरोंका आश्रय लिये, पुरुषोंको अपने ऊपर मुग्ध करनेकी क्षमता रखते हैं? उनका कहा हुआ श्लोक हम नीचे देते हैं—
रत्नानि विभूषयन्ति योषा, भूषयन्ते वनिता न रत्नकान्त्या।
चेतो वनिता हरन्त्यरत्ना, नोरत्नानि बिनाऽङ्गनाऽङ्गसंगात् ॥
विधाता की करीगरीका खातमा इन मनोहर कामिनियों की रचनामें ही हुआ है। सचमुच ही उसने फुसलमें बैठ कर इनकी गढ़ाई की है। अजब खूबसूरती इन्हें दी है! ऐसा कौन है, जो इनको देखकर इनपर अपना तन-मन न चार दे?
वैराग्य पक्ष।
विधाताने सुन्दरियोंके गढ़नेमें खूब कारीगरी दिखाई है। उन्हें सुन्दरता देनेमें ज़रा भी कसर नहीं रखी; तोभी तो लोग,
( ७८ )
उन्हें देख कर, उनके बनाने वालेको भूल जाते हैं। मन्दिरोंमें लोग भगवान्के दर्शनोंको जाते हैं, पर उन्हें देखते ही भगवान्को भूल उनके दर्शन करने लगते हैं। महाकवि दाग कहते हैं :—
कभी ममजिदमें, जो वह शोख परीज़ाद आया ।
फिर न अह्लाहके बन्दोंको, खुदा याद आया ॥
एक दिन वह शोख परीज़ाद मन्दिरमें आ गया, तो ईश्वरके भक्तोंको फिर ईश्वर याद न आया। सब उसे देखकर ईश्वरको भूल गये। कारीगर की बनाई बटिया चीज़को देखकर लोग एकाग्र मनसे चीज़को देखने लगते हैं ! किसने बनाई है, इसका ध्यान भी नहीं आता !
हिन्दुस्तानी औरतोंमें जो रूप, सौन्दर्य और लावण्य है, वह बर्फके समान गोरी मेमोंमें नहीं। पर जिनकी अङ्क पर पर्दा पड़ा हुआ है, वे तो कञ्चनको त्याग कर काँच पर मन डुलाते हैं ; इसी तरह जिनको ब्रह्म-ध्यान या जगदीशकी उपासनाका अवर्णनीय आनन्द नहीं मालूम वे ही, सिरसे पैर तक गन्धर्गसे भरी हुई, संसारी औरतोंको देखते ही ईश्वरको भूल जाते हैं। यद्यपि ऐसी हरकत विश्वामित्र और पराशर आदि महामुनियोंने भी की है, पर वह उनकी ग़लती ही कहलावेगी। ईश्वरसे प्रेम करनेसे अनन्तकालशायी सुख मिलता है ; जो लोग स्वर्ग चाहते हैं उन्हें स्वर्ग और स्वर्गकी अप्सरायें मिलती हैं ; मुसलमानी मतके अनुसार हूरो गिलमें मिलते हैं। संसारी औरतें क्या स्वर्गकी अप्सराओं या हूर और परियोंकी बराबरी कर सकती ह ?
( ७६ )
हरगिज नहीं। पर जिनकी बुद्धिमें भ्रम हो गया है, उन्हें खियोंकी मुहब्बतमें जो आनन्द आता है वह ईश्वरप्रेममें नहीं आता, जिसकी नाम मात्रकी हपासे अप्सराये और हरे मिल जाती ह।
महाकवि अकबर भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं :—
क्या जीके-इबादत हो उनको, जो मिसके लबोंके-शेदा है। हलुआये विहिरती एकतरफ, होटलकी मिठाई एक तरफ ॥
जो मिसके होटोंके प्रेमी हैं उनसे ईश्वर की उपासना नहीं होती—उसमें उनका दिल नहीं लगता। ईश्वरके ध्यानसे स्वर्गमें जो हलवा मिलता है, उसमें वह मज़ा कहाँ, जो होटलमें मिसके साथ बैठकर खानेमें आता है।
कामियोंको सुन्दरियाँ रूपकी साक्षात् मूर्तियाँ और शोभा की कान मालूम होती हैं; इसीसे वे दिवा-रात उन्हींके ध्यानमें समाधि लगाये रहते हैं; पर उनके बनाने वालेके ध्यानमें समाधि नहीं लगता! किन्तु वास्तवमें, वे जैसी दीखती हैं, वैसी हैं नहीं। सब ऊपरकी ही तड़क-भड़क और सफाई हैं। भीतरसे देखो तो वे गन्दगीके पिटाये हैं; पर मोहान्ध कामी पुरुष इन गहरी बातोंको नहीं समझते। समझते हैं, केवल वे ज्ञानी जिन्होंने उनकी असलियतका पता लगा लिया है; इसीसे वे उनके दिखावटी और मिथ्या रूप पर मोहित नहीं होते और उनका खयाल स्वर्गमें भी नहीं करते। वे अपना सारा समय जगदीशके ध्यान और व्यतीत करते हैं; क्योंकि कामिनियोंकी
( ८० )
आराधना-उपासना करनेसे जो सुख मिलता है, वह क्षणस्थायी और झूठा है ; पर ईश्वरकी उपासना-परिस्थितशसे जो सुख मिलता है, वह अनन्तकालस्थायी और सच्चा है ।
दोहा ।
चन्द्रकान्त-सम सुख लसत, नीलम केशहि पास ।
पद्मराग-सम कर लसै, नारी रत्न-प्रकाश ॥२०॥
सार—नारी रत्नों की खान है। उसमें नव रत्नों की शोभा मौजूद है ।
20. That woman with her face like Chandrakanta jewel, her hair like that of Mahanil jewel and her two hands bearing the colour of Padmaraga jewel shines like a heap of jewels.
—*—
समोहयन्ति मद्यन्ति विडम्बयन्ति
निर्भत्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ॥
एताः प्रविश्य सदयं हृदयं नराणां
किं नाम वामनयना न समाचरन्ति ॥२१॥
चतुर भुगनयनी खियाँ पुरुषके हृदयमें एक बार दयासे घुसकर, उसे मोहित करतीं, मदोन्मत्त करतीं, तरसातीं, चिढ़ातीं, धमकातीं, रमण करतीं और विरहसे दुख देतीं हैं । ऐसा कौनसा नाम है जिसे ये भुगलोचनी नहीं करतीं ? ॥२१॥