भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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परखियों पर मन चलानेसे कोई लाभ नहीं, चाहनेसे वे अपनी हो नहीं जातीं। जो पुण्य करता है, ईश्वर उसे सुन्दरी स्त्री देता है; मनुष्य अपनी इच्छासे स्त्री नहीं पा सकता। कहा है—

देवदत्तां पतिभाव्यां विन्दते नेच्छयात्मनः।

जब यही बात है, तब अपने बल और चालाकीसे पराई स्त्रीको अपनी करना, अपनी जान खतरेंमें डालना है। कहा है—

उर्वशीसुरतचिन्तया ययौ संवयं किमु पुरुषा नृपः।

रक्षणाय निज जीवितस्य तत्संभजत्परवर्धुं न कामतः ॥

महाराज पुरुरवा उर्वशीसे संभोगकी इच्छा करके नष्ट हो गये; अतएव, अपनी जीवनरक्षाके लिये, पुरुषको परनारी पर दिल न चलाना चाहिये।

और भी कहा है।

लंकेश्वर जनकजा हरण्येन बाली

तारापहारकतयाप्यथ कीचकास्यः ॥

पाञ्चालिका ग्रहणतो निधनं जगाम

तच्छ्रुते सापि परदारसति न कांचोत् ॥

लंकाधिपति रावण जानकीजी को हरकर ले जानेसे मारा गया, सुग्रीव-पत्नी ताराके हरणसे बाली और द्रौपदीकी इच्छा करनेसे कीचक मारा गया; इसलिये बुद्धिमानोंको पर-स्त्री पर भूल कर भी दिल न चलाना चाहिये।

हे मन! अगर तू सेबोंके समान कठोर कुबोंवाली स्त्रियोंके