शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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उन्हें देख कर, उनके बनाने वालेको भूल जाते हैं। मन्दिरोंमें लोग भगवान्के दर्शनोंको जाते हैं, पर उन्हें देखते ही भगवान्को भूल उनके दर्शन करने लगते हैं। महाकवि दाग कहते हैं :—
कभी ममजिदमें, जो वह शोख परीज़ाद आया ।
फिर न अह्लाहके बन्दोंको, खुदा याद आया ॥
एक दिन वह शोख परीज़ाद मन्दिरमें आ गया, तो ईश्वरके भक्तोंको फिर ईश्वर याद न आया। सब उसे देखकर ईश्वरको भूल गये। कारीगर की बनाई बटिया चीज़को देखकर लोग एकाग्र मनसे चीज़को देखने लगते हैं ! किसने बनाई है, इसका ध्यान भी नहीं आता !
हिन्दुस्तानी औरतोंमें जो रूप, सौन्दर्य और लावण्य है, वह बर्फके समान गोरी मेमोंमें नहीं। पर जिनकी अङ्क पर पर्दा पड़ा हुआ है, वे तो कञ्चनको त्याग कर काँच पर मन डुलाते हैं ; इसी तरह जिनको ब्रह्म-ध्यान या जगदीशकी उपासनाका अवर्णनीय आनन्द नहीं मालूम वे ही, सिरसे पैर तक गन्धर्गसे भरी हुई, संसारी औरतोंको देखते ही ईश्वरको भूल जाते हैं। यद्यपि ऐसी हरकत विश्वामित्र और पराशर आदि महामुनियोंने भी की है, पर वह उनकी ग़लती ही कहलावेगी। ईश्वरसे प्रेम करनेसे अनन्तकालशायी सुख मिलता है ; जो लोग स्वर्ग चाहते हैं उन्हें स्वर्ग और स्वर्गकी अप्सरायें मिलती हैं ; मुसलमानी मतके अनुसार हूरो गिलमें मिलते हैं। संसारी औरतें क्या स्वर्गकी अप्सराओं या हूर और परियोंकी बराबरी कर सकती ह ?