शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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आज उन्होंने अपने लालकी तरह लाल ओठों पर पानका लाखा—रङ्ग—जमाया है। आज इस लाखेसे लाखों ही का धून हो जायगा।
वराहमिहिर महाशय महाराजा भर्तृहरिसे भी एक कदम आगे बढ़ गये हैं। उनकी समझमें, महाकवि दांग वगैरः की तरह, सजावटकी ज़रूरत ही नहीं। उनका ख्याल है कि, जिसे खूबी खुदाने दी, उसे जेवरकी क्या ज़रूरत? वह कहते हैं, खियों से ही रत्नों की शोभा है, न कि रत्नों से खियों की। क्योंकि खियों तो बिना रत्नों के धारण किये ही पुरुषों को अपने ऊपर लट्ठ करके अपना गुलाम बना सकती हैं। क्या रत्न भी, बिना खियोंके सुन्दर शरीरोंका आश्रय लिये, पुरुषोंको अपने ऊपर मुग्ध करनेकी क्षमता रखते हैं? उनका कहा हुआ श्लोक हम नीचे देते हैं—
रत्नानि विभूषयन्ति योषा, भूषयन्ते वनिता न रत्नकान्त्या।
चेतो वनिता हरन्त्यरत्ना, नोरत्नानि बिनाऽङ्गनाऽङ्गसंगात् ॥
विधाता की करीगरीका खातमा इन मनोहर कामिनियों की रचनामें ही हुआ है। सचमुच ही उसने फुसलमें बैठ कर इनकी गढ़ाई की है। अजब खूबसूरती इन्हें दी है! ऐसा कौन है, जो इनको देखकर इनपर अपना तन-मन न चार दे?
वैराग्य पक्ष।
विधाताने सुन्दरियोंके गढ़नेमें खूब कारीगरी दिखाई है। उन्हें सुन्दरता देनेमें ज़रा भी कसर नहीं रखी; तोभी तो लोग,