शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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हरगिज नहीं। पर जिनकी बुद्धिमें भ्रम हो गया है, उन्हें खियोंकी मुहब्बतमें जो आनन्द आता है वह ईश्वरप्रेममें नहीं आता, जिसकी नाम मात्रकी हपासे अप्सराये और हरे मिल जाती ह।
महाकवि अकबर भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं :—
क्या जीके-इबादत हो उनको, जो मिसके लबोंके-शेदा है। हलुआये विहिरती एकतरफ, होटलकी मिठाई एक तरफ ॥
जो मिसके होटोंके प्रेमी हैं उनसे ईश्वर की उपासना नहीं होती—उसमें उनका दिल नहीं लगता। ईश्वरके ध्यानसे स्वर्गमें जो हलवा मिलता है, उसमें वह मज़ा कहाँ, जो होटलमें मिसके साथ बैठकर खानेमें आता है।
कामियोंको सुन्दरियाँ रूपकी साक्षात् मूर्तियाँ और शोभा की कान मालूम होती हैं; इसीसे वे दिवा-रात उन्हींके ध्यानमें समाधि लगाये रहते हैं; पर उनके बनाने वालेके ध्यानमें समाधि नहीं लगता! किन्तु वास्तवमें, वे जैसी दीखती हैं, वैसी हैं नहीं। सब ऊपरकी ही तड़क-भड़क और सफाई हैं। भीतरसे देखो तो वे गन्दगीके पिटाये हैं; पर मोहान्ध कामी पुरुष इन गहरी बातोंको नहीं समझते। समझते हैं, केवल वे ज्ञानी जिन्होंने उनकी असलियतका पता लगा लिया है; इसीसे वे उनके दिखावटी और मिथ्या रूप पर मोहित नहीं होते और उनका खयाल स्वर्गमें भी नहीं करते। वे अपना सारा समय जगदीशके ध्यान और व्यतीत करते हैं; क्योंकि कामिनियोंकी