भारतकोश
संग्रह पर लौटें

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

( ७८ )

उन्हें देख कर, उनके बनाने वालेको भूल जाते हैं। मन्दिरोंमें लोग भगवान्के दर्शनोंको जाते हैं, पर उन्हें देखते ही भगवान्को भूल उनके दर्शन करने लगते हैं। महाकवि दाग कहते हैं :—

कभी ममजिदमें, जो वह शोख परीज़ाद आया ।

फिर न अह्लाहके बन्दोंको, खुदा याद आया ॥

एक दिन वह शोख परीज़ाद मन्दिरमें आ गया, तो ईश्वरके भक्तोंको फिर ईश्वर याद न आया। सब उसे देखकर ईश्वरको भूल गये। कारीगर की बनाई बटिया चीज़को देखकर लोग एकाग्र मनसे चीज़को देखने लगते हैं ! किसने बनाई है, इसका ध्यान भी नहीं आता !

हिन्दुस्तानी औरतोंमें जो रूप, सौन्दर्य और लावण्य है, वह बर्फके समान गोरी मेमोंमें नहीं। पर जिनकी अङ्क पर पर्दा पड़ा हुआ है, वे तो कञ्चनको त्याग कर काँच पर मन डुलाते हैं ; इसी तरह जिनको ब्रह्म-ध्यान या जगदीशकी उपासनाका अवर्णनीय आनन्द नहीं मालूम वे ही, सिरसे पैर तक गन्धर्गसे भरी हुई, संसारी औरतोंको देखते ही ईश्वरको भूल जाते हैं। यद्यपि ऐसी हरकत विश्वामित्र और पराशर आदि महामुनियोंने भी की है, पर वह उनकी ग़लती ही कहलावेगी। ईश्वरसे प्रेम करनेसे अनन्तकालशायी सुख मिलता है ; जो लोग स्वर्ग चाहते हैं उन्हें स्वर्ग और स्वर्गकी अप्सरायें मिलती हैं ; मुसलमानी मतके अनुसार हूरो गिलमें मिलते हैं। संसारी औरतें क्या स्वर्गकी अप्सराओं या हूर और परियोंकी बराबरी कर सकती ह ?

( ७६ )

हरगिज नहीं। पर जिनकी बुद्धिमें भ्रम हो गया है, उन्हें खियोंकी मुहब्बतमें जो आनन्द आता है वह ईश्वरप्रेममें नहीं आता, जिसकी नाम मात्रकी हपासे अप्सराये और हरे मिल जाती ह।

महाकवि अकबर भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं :—

क्या जीके-इबादत हो उनको, जो मिसके लबोंके-शेदा है। हलुआये विहिरती एकतरफ, होटलकी मिठाई एक तरफ ॥

जो मिसके होटोंके प्रेमी हैं उनसे ईश्वर की उपासना नहीं होती—उसमें उनका दिल नहीं लगता। ईश्वरके ध्यानसे स्वर्गमें जो हलवा मिलता है, उसमें वह मज़ा कहाँ, जो होटलमें मिसके साथ बैठकर खानेमें आता है।

कामियोंको सुन्दरियाँ रूपकी साक्षात् मूर्तियाँ और शोभा की कान मालूम होती हैं; इसीसे वे दिवा-रात उन्हींके ध्यानमें समाधि लगाये रहते हैं; पर उनके बनाने वालेके ध्यानमें समाधि नहीं लगता! किन्तु वास्तवमें, वे जैसी दीखती हैं, वैसी हैं नहीं। सब ऊपरकी ही तड़क-भड़क और सफाई हैं। भीतरसे देखो तो वे गन्दगीके पिटाये हैं; पर मोहान्ध कामी पुरुष इन गहरी बातोंको नहीं समझते। समझते हैं, केवल वे ज्ञानी जिन्होंने उनकी असलियतका पता लगा लिया है; इसीसे वे उनके दिखावटी और मिथ्या रूप पर मोहित नहीं होते और उनका खयाल स्वर्गमें भी नहीं करते। वे अपना सारा समय जगदीशके ध्यान और व्यतीत करते हैं; क्योंकि कामिनियोंकी

( ८० )

आराधना-उपासना करनेसे जो सुख मिलता है, वह क्षणस्थायी और झूठा है ; पर ईश्वरकी उपासना-परिस्थितशसे जो सुख मिलता है, वह अनन्तकालस्थायी और सच्चा है ।

दोहा ।

चन्द्रकान्त-सम सुख लसत, नीलम केशहि पास ।

पद्मराग-सम कर लसै, नारी रत्न-प्रकाश ॥२०॥

सार—नारी रत्नों की खान है। उसमें नव रत्नों की शोभा मौजूद है ।

20. That woman with her face like Chandrakanta jewel, her hair like that of Mahanil jewel and her two hands bearing the colour of Padmaraga jewel shines like a heap of jewels.

—*—

समोहयन्ति मद्यन्ति विडम्बयन्ति

निर्भत्सयन्ति रमयन्ति विषादयन्ति ॥

एताः प्रविश्य सदयं हृदयं नराणां

किं नाम वामनयना न समाचरन्ति ॥२१॥

चतुर भुगनयनी खियाँ पुरुषके हृदयमें एक बार दयासे घुसकर, उसे मोहित करतीं, मदोन्मत्त करतीं, तरसातीं, चिढ़ातीं, धमकातीं, रमण करतीं और विरहसे दुख देतीं हैं । ऐसा कौनसा नाम है जिसे ये भुगलोचनी नहीं करतीं ? ॥२१॥

( ८१ )

जिस पुरुष पर इन सुन्दरियों को निगाहका तेज़ तीर चल जाता है, वह लोट-पोट हो जाता है और उसके होश-हवास ख़ता हो जाते हैं। अगर वह तीर मारने वाली, उस पर दया-भाव नहीं दिखाती, तो बेचारेका करम-कल्याण ही हो जाता है—जीवनके लाले पड़ जाते हैं। महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

इधर उसकी निगहका, नाजसे प्राकर पलट जाना ।

इधर सुड़ना तड़पना, ग़शमें आना, दम उलट जाना ॥

इस पदमें कविने प्रेम-दृष्टि की चोटका जो करुणापूर्ण चित्र खींचा है, सो बिल्कुल ठीक है। भुक्तभोगी जानते हैं; हमारे तशरीह करने की ज़रूरत नहीं।

स्त्रियाँ जैसी कोमलाङ्गी होती हैं, वैसी ही वज्रहृदया भी होती हैं। इन्हें अपने शिकारको तड़पते देखनेमें बड़ा मज़ा आता है। जब इनका शिकार इनके कटाक्ष-वाण की मारसे सन्निपात रोगी की तरह मोहित या बेहोश हो जाता है, उसे किसी तरहका ज्ञान नहीं रहता, शराबी की तरह मतवाला होकर प्रलाप करता है, तब ये बड़ी प्रसन्न होती हैं। उस समय ये दयासे काम न लेकर, उसे अपने हाव-भाव और नाज़ों अदा दिखाकर और भी तरसार्ती तथा अथमरा कर देती हैं। जब तक ये अपने आशिक्षसे नहीं मिलतीं, तब तक वह बेचारा रात-दिन गुम खाता, घबराता, सिसकता और आहँ भरता है। मनमें पछताता है कि, हाय मैंने क्यों दिल देकर आफ़त मोल ली। पर मुहब्बतमें तो यह दशा होती ही है। किसी कविने कहा है :—

( ८२ )

न था मालूम उलझतमें, कि ग़म खाना भी होता है । जिगरकी बेकली, और दिलका घबराना भी होता है । सिसकना आह भी करना, अश्क़ लाना भी होता है । तड़पना लोटना, बेताब हो जाना भी होता है । कफ़े अफ़सोसको मल-मलके, पछताना भी होता है । किये पर अपने फिर आप ही, दुख पाना भी होता है ॥

प्रेमी या आशिक़ हज़ारों तरहके दुःख और आफ़तें उठाता है, पर अन्तमें यों कहकर सन्न करता है :—

हम तो हैं आशिक़ तेरे, नाज़ उठाने वाले । तुमसे कम देखे हैं महबूब, सताने वाले ॥

शेषमें ; जब ये सुन्दरियाँ सब तरहसे अपने चाहने वालेका इमतिहान ले लेती हैं, तब कहीं इनका पत्थर-हृदय पसीजता है । उस वक्त यह उसे अपनी सेवामें कुबूल करतीं और उसके दिलको ठण्डा करती हैं । इस समय इनका शिकार पूरे तौरसे इनके क़ाबूमँ हो जाता है । जब ये उसे अपने अधीन पातीं और उसे हर तरहसे मुती और फरमाईदार देखती हैं, तब उसे ज़रा-ज़रा सी चूकों या गुलतियों पर धमकाती और घुड़कती हैं । संशयों-का घर होने की वजहसे, इनमें से बाज़-बाज़ तो उसे, ज़रा देखसे घर आने पर ही, खूब डाँटती-डपटती हैं । कोई-कोई अपने शिकार को नितान्त अब्रानावस्थामें देखकर निपट निरकुश हो जाती है और उससे ठीक गुलाम की तरह काम लेती है ।

( ८३ )

इतना ही नहीं, उसे इनकी फ़रमायशों भी पूरी करनी पड़ती है। उनके पूरा करनेमें उसे बड़ी-बड़ी ज़िल्लतें उठानी होती हैं। सामने रहने पर ये इस तरह नाच नचातीं और नाना प्रकारके कष्ट देती हैं। आँखों की ओफ़ल रहने पर भी, ख़ैर नहीं। इनकी जादू-भरी आँखोंसे उन्मत्त हुआ पुरुष, इनकी वियोगाश्रमिमें, बुरी तरह तड़प-तड़प कर भस्म होता है। बहुत लिखनेसे क्या—इनकी रसीली, मदमाती और नशीली आँखोंके मारे हुए को किसी अवस्थामें भी, सुख-शान्ति नहीं मिलती। कविने ठीक ही कहा है कि, इन नाज़नियोंके चञ्चल नेत्र जिसके हृदयमें प्रवेश कर जाते हैं, उसकी ख़ैर नहीं।

खूबसूरत औरतें जिन पर अपनी निगाहके तेज़ तीर चलाती या कटाक्ष-वाण मारती हैं, वे अपनी होशियारी और चतुराईको ताक पर रखकर पूरे पागल हो जाते हैं—कितनेही तो मजनू बनकर कपड़े फाड़ने लगते हैं। देखिये, एक आशिक़ किसी हसीनके नयनवाणसे घायल होकर क्या कहता है :—

Wदिलचस्प है, आफ़त है, क़यामत है, ग़ज़ब है।

चात उनकी, अदा उनकी, क़द उनकी, चाल उनकी ॥—अक़बर।

उनकी बातें दिलचस्प हैं, उनकी अदाएँ आफ़त हैं, उनका क़द क़यामत बर्पा करनेवाला और चाल ग़ज़ब ढाहनेवाली है। मतलब यह कि, हम उनकी मीठी-मीठी बातों, अदाओं और चाल चौरः पर भर मिटे।

( ८४ )

कहते हैं जिसको जबत, वह इक भलक है तेरी ।

सब बाइजोंकी बाकी, रंगी बयानियाँ हैं ॥—हाली ।

जिसे खर्ग कहते हैं, वह तो मेरी प्यारीकी एक भलकमें है, बाकी सब तो उपदेशकजीकी रड़ीन बातें हैं ।

चुपचुपाते उसे दे आये दिल, एक बात पै हम ।

माल मँहँगा नज़र आता, तो चुकाया जाता ॥—हाली ।

हमने तो न किसीसे कहा न सुना, उसकी एक बात पर चुप- चाप दिल दे आये । अगर माल मँहँगा नज़र आता, तो मोल- तोल करते । दिल देकर खरीदनेमें हमें तो सौदा सस्ता ही जँचा ।

ऐ जौक ! आज सामने, उस चश्म मस्तके ।

बातिल सब अपने, दाव-ये दानिशवरी हुए ॥—जौक ।

ऐ जौक ! उस काम-मदसे मतवाली आँखके सामने, आज हमारी बुद्धिमत्ता और योग्यता भूटी हो गई ।

मस्जिदमें उसने हमको, आँखें दिखाके मारा ।

काफिरकी देखो शोखी, घरमें खुदाके मारा ॥—जौक ।

उसने मन्दिरमें ही हमें अपने कटाक्ष-वाणसे मारा । उस काफिरकी शोखी देखिये, कि उसने हमें ईश्वरके घरमें ही मारा ।

भालूम जो होता हमें, अज्जामे मुहब्बत ।

लेते न कभी भूलके, हम नामे मुहब्बत ॥—जौक ।

( ८५ )

अगर हमें प्रेमका परिणाम मालूम होता, तो हम कभी भूलकर भी प्रेमका नाम न लेते।

बुरी है ऐ दाग ! राहें उलफ़्त, खुदा न ले जाय ऐसे रस्ते। जो तुम अपनी खैर चाहते हो, तो भूलकर दिल्ली न करना ॥ दाग।

ऐ दाग ! प्रेमका पन्थ देढ़ा है। परमेश्वर किसीको इस राहसे न ले जाय। अगर तुम अपना भला चाहते हो, तो भूल कर भी इस राहमें कदम न धरना।

देख ऐ दिल ! न छेड़ किसी-ये जुल्फ़। कि ये हैं, पेचो ताबकी बातें ॥ जौक।

ऐ दिल ! उसकी जुल्फ़ोंके किस्से न छेड़, क्योंकि ये बातें बड़ी पेचीली हैं। इनमें पड़ना ठीक नहीं।

किताबें मुहब्बतमें ऐ हज़रते दिल ! बताओ कि तुम लेते कितना सबक हो ॥ कि जब आनकर तुमको देखा, तो वह ही। लिये दस्ते अफ़सोसके दो वरक हो ॥ जौक।

ऐ हज़रत दिल ! मुहब्बतकी किताबमें तुम कितना सबक लेते हो ? हमने तो तुमको जब आकर देखा, तभी तुम्हारे हाथमें शोक-दुःखके दो वरक देखे।

( ८६ )

मुझे वह पर्दानशीं, सामने कब आने दे ।

जो जिक्र करने न दे अपने रोबरू मेरा ॥ जौक ।

वह पर्दानशीन माशूका मुझे कब सामने आने देती है ? वह तो मेरा जिक्र भी अपने सामने नहीं होने देती ।

कुछ तर्जें सितम भी है, कुछ अन्दरुजि वफा भी ।

खुलता नहीं हाल, उनकी तबीयतका जरा भी ॥—अकबर ।

उसमें कुछ जुल्मके भी ढंग हैं और कुछ वफादारीके भी । उसके दिलमें क्या है, यह जरा भी समझमें नहीं आता ।

याँ लब पै लाख-लाख सखुन इज़्ज़ाब में ।

याँ एक खामुशी तेरी, सबके जवाब में ॥

में तो उनके सामने हज़ारों बातें बनाता हूँ ; पर वे मेरी सभी बातोंके जवाबमें एक चुप्पी साथे रहती हैं—मेरी बातोंका जवाब ही नहीं देतीं ।

इससे तो और आग वह बेदद हो गया ।

अब आह आतशीसि भी, दिल सर्ड हो गया ॥—जौक ।

मैंने समझा था कि मेरे रोने-घोनेसे उसका पत्थर-हृदय कुछ तो पसीजैगा—उसे मुझपर तरस आयेगा ; पर हुआ इसका उल्टा । मेरी गरम आहोने उसे और भी गरम कर दिया—भड़का दिया । मुझे अपनी गरम आहोका बड़ा भरोसा था, उम्मीद थी, कि इनसे ज़रूर कामयाबी होगी, पर अब इस तरफसे भी मेरा

( ८७ )

दिल ठण्डा हो गया—मुर्खा गया । इस हथियारका भरोसा था, पर अब मालूम हो गया कि, यह हथियार भी बेकाम साबित हुआ । ( माथूका जब संगदिली अक्षत्यार कर लेती है, तब नहीं पसीजती, रहम नहीं करती ) ।

मुझको हर शब हिज्जकी, होने लगी जूँ, रोज हश्र ।

मुझसे यह किस दिनेके बदले, आस्माँ लेने लगा ॥—जौक ।

जुदाईकी हरेक रात मेरे लिये प्रलयके दिन सी जान पड़ती है, काटेसे नहीं कटती ! आस्मान ! तू मुझसे किस दिनेके बदले ले रहा है ?

अजल आई न शबे हिज्जमें, और तूने फलक !

वे-अजल हमको, तमन्नाए अजलमें मारा ॥—जौक ।

ऐ आस्मान ! जुदाईकी रातमें मौत न आई, पर तूने मौतकी चाहमें हमें बे-मौतही रातभर मारा ।

मौत हीसे कुछ इलाजे, ददें फुर्कत हो तो हो ।

गुसलु मैथत ही हमारा, गुसले सेहत हो तो हो ॥—जौक ।

जुदाईकी बीमारीका इलाज मौतसे ही हो, तो हो सकता है । मौतका खान ही हमारी आरोग्यताका खान हो सकता है ।

अब आशिक अपनी माथूकासे मुखतिब होकर कहता है :—

तुम्हें ऐ संगदिल ! आरामे जाने मुश्ताला.समझे ।

पड़े पत्थर समझ पर अपनी, हम समझे तो क्या समझे ॥

( ८८ )

ये संगदिल—पत्थर-हृदय ! तुम्हें हमने अपने सुख बढ़ाने-वाली समझी । हमारी अकलपर पत्थर पड़े—हमने क्या का क्या समझ लिया ।

फुलूतमें तेरी, तारे नफ़स सीनेमें मेरे ।

कौटा सा खटकता है, निकल जाय तो अच्छा ॥—जौक ।

तेरी जुदाईमें मेरे प्राण मेरी छातीमें कौटिकी तरह खटकते हैं, किसी तरह यह काँटा निकल जाय तो अच्छा ।

मैं जाता जहाँसे हूँ, तू आता नहीं याँ तक ।

काफ़िर ! तुम्हें कुछ खोफ़ खुदाका नहीं आता ॥—जौक ।

मैं तो तेरी मुहब्बतमें इस दुनियासे ही जाता हूँ, पर तुम्हसे यहताँक भी आया नहीं जाता ! काफ़िर ! क्या तू परमेश्वरसे भी नहीं डरती ?

बाकी न रहा खून भी, अब मेरे ज़िगरमें ।

अफ़सोस ! हुआ चाहती है तर्क गिज़ा भी ॥

तेरे लिये रोते-रोते मेरे ज़िगरमें अब खून भी नहीं रहा है । अफ़सोस ! अब खाना-पीना भी छुटना चाहता है ।

खूने दिल पीनेको, और लड़ते ज़िगर खानेको ।

यह गिज़ा मिलती है जानी ! तेरे दीवानेको ॥

प्यारी ! तेरे पागलको पीनेके लिये खून और खानेके लिए ज़िगरका टुकड़ा मिलता है, अब उसका यही आहार है ।

( ८६ )

जब कहा मैंने—तड़पता है बहुत अब दिल मेरा ।

हँसके फुरमाया—तड़पता होगा सौदाई तो हो ॥—हाली ।

जब मैंने कहा कि, मेरा दिल आपके लिए बहुत तड़पता है, नब उन्होंने हँसकर जवाब दिया—“तड़पता होगा, तुम पागल ही तो हो ।” ( बेरहमीकी हद हो गई ) ।

कहा उन्होंने शवे गमका माजरा सुनकर ।

तेरे मिज़ाजकी शोर्नी थी, इज़्तराब न था ॥—दाग ।

उन्होंने जुदाईकी रातकी बातें सुनकर जवाब दिया—तुमने क्या दुःख उठाया, मनकी ऐसी चञ्चलता ठीक नहीं । मतलब यह कि, तुमने जो दुःख उठाया, वह तुम्हारी चञ्चलताकी वजहसे उठाया, विरहके सन्तापसे नहीं ।

भागये हैं आपके अन्दाज़ो नाज़ ।

कीजिये अगमाज़ जितना चाहिये ॥

आपके नाज़ो अन्दाज़ मुझे पसन्द आ गये हैं । अब आपको अवतार है, चाहे जितने नज़रें कीजिये—चाहे जितना सताइये और तरसाइये ।

तेरे सहरे नज़रसे हुआ य जुनूँ ।

मेरे दिलकी तो इसमें खता ही न थी ॥

तेरे कूचेंमें आके बैठ गया ।

बजुज इसके कुछ और दवा ही न थी ॥—अकबर ।

( ६० )

तेरे कटाक्षके जादूसे ही मुझे यह उन्माद रोग हो गया है । इसमें मेरे दिलका क्या अपराध ? मैं तेरी गलीमें आकर बैठ गया, क्योंकि इसके सिवा इस उन्मादके दूर करनेका और उपाय ही न था ।

न देखलीं कैसी-कैसी आफ़त । जहाँमें हमने तुम्हारे बाइस ॥ और आगे क्या-क्या गुमो आलम । हम तुम्हारी दौलत न देख लेंगे ॥—जौक ।

हमने दुनियामें तुम्हारी वजहसे कैसी-कैसी आफ़तें नहीं भोगी हैं । और आगे भी तुम्हारी बदौलत हमें क्या-क्या शोक- राम न उठाने होंगे ।

महरबानीकी एक राह तो हो । गर सतानेके हैं हजार तरीक़ ॥ दाग ।

अगर तकलीफ़ देने या सतानेके हजार तरीक़े हैं, तो मिहर- बानीका भी एकाध तरीका होना चाहिये ।

सराव न हो जिससे, कोई तिशनये मकसूद ।

ऐ जौक ! वह आबेवका भी है तो क्या है ॥—जौक ।

जिससे किसी प्यासेकी प्यास न बुझे, वह अमृत भी है तो किस कामका ? आप कितनी ही सुन्दर हैं, पर आपसे अगर मेरी प्यास न बुझी, तो आपकी सुन्दरतासे क्या ?

( ६१ )

माशूका शिकायतके तौरपर कहती है :—

नित नया ज़ायका चखनेका लपका है उनको ।

दरबदर माँकते फिरनेसे उन्हें थार नहीं ॥

दाव-ये इश्को मुहब्बत पै न जाना उनके ।

उनमें गुफ्तार ही गुफ्तार है, किरदार नहीं ॥

आजकल हरेक आदमी आशिक बना हुआ है । जहाँ किसी खूबसूरत औरत को देखा कि, इश्क़का दम भरने लगे । ऐसे लोग नित नया स्वाद चखनेको दरदर मारे-मारे फिरते हैं ।

ऐसे लोगोंकी प्रेम-प्रतिज्ञाओं पर भरोसा करना अक़्समन्दी नहीं । वे जिसे देखते हैं उसीसे मुहब्बत करते फिरते हैं । उनमें बातोंके सिवा तत्त्व नहीं ।

पाठक ! आपने ऊपरकी कविताओंसे समझा होगा, कि बेवारे आशिक़ कैसी-कैसी खुशामदें करते हैं, जान देते हैं ; पर बेरहम नाज़नियाँ उन्हें किस तरह मोहित करतीं और फिर किस तरह तरसतीं, धमकातीं और उनकी मुहब्बतको झूठी बताकर उन्हें निराशा और दुखी करती हैं । इस जगह इतनी कविताओंके देनेकी ज़रूरत न थी, पर हमने इतनी कविताएँ इस ग़ज़से दी हैं, कि पाठक माशूकाओंकी आदतोंसे वाकिफ़ होनेके साथ-ही-साथ उर्दू शायरीका भी मज़ा लूटे ।

द्वैराग्य पद्य ।

सब तरहसे दुःख देनेवाली, सन्निपातज्वर की तरह मोह,

( ६२ )

प्रलाप, प्रमाद, मूर्च्छा और निर्लज्जता प्रभृति पैदा करने वाली कामिनियोंको जो सुखबल्लरी समझते हैं, वे यदि बुद्धिमान हैं तो मूर्ख कौन हैं ? वे ठीक अपथ्य सेवन करके रोग मोल लेने वालों की तरह हैं । हाँ, जो लोक-परलोक की परवा नहीं करते, जो इस जन्मके बाद और जन्म नहीं मानते, जो इस जगत्में आकर इस जगत्के सुख भोगना ही अपने जीवनका लक्ष्य समझते हैं, उनके लिये ये सुन्दरियाँ, अनेक कष्ट देने वाली होने पर भी, परमानन्ददायिनी हैं ; पर जिन्हें पुनर्जन्ममें विश्वास है, जिन्हें बारम्बारका जन्म-मरण बुरा मालूम होता है, जिन्हें सच्चे और नित्य सुख की दृकार है, उन्हें इन मोहिनी—पर काली नागिनोंसे बचना चाहिये ; क्योंकि इनके काटे हुए पुरुषको बारम्बार संसार-बन्धनमें बँधना होता है । संसार-बन्धनमें बँधने या बारम्बार मरने और मर्कड़े पेटमें नौ महीने रहकर जन्म लेनेमें ऐसे घोर कष्ट है, जिन्हें हम लिखकर बता नहीं सकते । आपको इस जन्म-मरणके भयका चित्र स्वामी शंकराचार्यजी के नीचेके श्लोकसे मालूम होगा :—

पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।

इह संसारे भयदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुगरे !

फिर जन्म लेते हैं, फिर मरते हैं और फिर मर्कड़े पेटमें सोते हैं ! यह असाह संसार बड़ा भयकारी है । हे मुनारि ! कृपा कर मुझे इससे पार कीजिये ।

( ६३ )

शेर ।

हैं फिर-फिर लोग मरते जन्म लेते ।

हैं फिर-फिर रहममें आ कष्ट देते ।

विनय करते हैं, सुख अब नाथ ! लीजे ।

तनासुखके न फिर-फिर साज सजरे ।

विमुख गोविन्द भज गोविन्द भजरे ॥

बहुत क्या कहें, स्त्री ही संसार-बन्धन की जड़ है। बेटे-बेटी, नाती पोते, दोह्ति दोह्ति वगैरः उसके पत्ते और शाखें हैं। अगर आप लोग इस जड़को ही त्याग दें, तो संसार-बन्धन या वार-बार जनमने और मरनेके घोरातिघोर कष्टोंसे बच सकते हैं।

दुनियादारोंको सलाह ।

यह सलाह हमने अधिकारियोंको दी है, अनाधिकारियोंको नहीं। दुनियादारोंको जानना चाहिये कि, स्त्रियोंसे सुख और दुःख दोनों ही होते हैं। यदि उनकी वजहसे पुरुष-को अनन्त दुःख उठाने पड़ते हैं; तो स्वर्गीय सुख भी उनसे ही मिलते हैं। फ्रैंचोमें एक कहावत है—“Women, money and wine have their blessing and their bane” स्त्री, सम्पत्ति और सुरामें सुख और दुःख दोनों ही हैं। एमिएल महाशय कहते हैं—“Woman is at once the delight and terror of man” स्त्री, पुरुषके लिए हर्ष और भय दोनोंहीका हेतु है। संसारमें वैराग्यको छोड़कर और ऐसी कोई

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बात नहीं है जिसमें सुख-ही-सुख हो। अगर सभी पुरुष स्त्रियोंसे नातां न जोड़ें, शादी-विवाह न करें तो ईश्वर की स्मृति ही लोप हो जाय, संसार ही न रहे ; इसलिये जिनसे पूर्ण वैराग्य न लिया जाय उन्हें घर-गृहस्थीमें रहना चाहिये, पर जलमें कमल की तरह। गृहस्थके सारे काम करो, पर मनको उसी तरह ईश्वरमें रखो, जिस तरह पनिहारी सिर पर घड़े लिये हुए अपने यारसे भी बातें करती है और हँसती है, पर मनको घड़ेमें ही रखती है। अगर ऐसा न करे, तो घड़े गिर कर फूट जायँ।

सोरठा ।

मोह प्रलाप प्रमाद, ज्ञाननाश निर्लज्जता ।

शोक कलेश विपाद, कहा न कर हिय घुस त्रिया ? ॥२१॥

सार—स्त्रियाँ जिसके हृदयमें प्रवेश कर जाती हैं, उसकी अवस्था सन्निपात-रोगीकी सी हो जाती है। ये अपने चाहनेवालेको मजनूँ की तरह ख़ुब्तुलहवास करके, क्या-क्या कष्ट नहीं देतीं ? उसे जीतेजी मदारीके बन्दरकी तरह नचातीं और मरने पर नरकमें पहुँचाती हैं।

21. What could not the beautiful-eyed woman do, by piercing the frail heart of a man, that women who fascinate him, intoxicate him, vexes him, takes him to task, gives him the

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pleasures of enjoying her and puts him to sorrow by her separation.

—*—

विश्रम्य विश्रम्य वन्दुभाणां छायासु तन्वी-विचचार काचित् ।

स्तनोत्तरीयेण करोद्द्युतेन निवारयन्ती शशिनो मृगवान् ॥२२॥

वनके वृक्षोंकी छायामें बारम्बार विश्राम करती हुई, वह विरहिणी स्त्री, अपने कोमल शरीर की रक्षाके लिए, अपना आँचल हाथमें उठा, उससे चन्द्रमाकी किरणोंको रोकती हुई गूंम रही है ॥२२॥

खुलासा—वह विरहिणी स्त्री इतनी नाजूक है, कि सूरज तो सूरज, चन्द्रमा की शीतल किरणों की रोशनीको भी बर्दाश्त नहीं कर सकती । चन्द्र-किरणोंसे उसके नाजूक और सुकुमार शरीरको कष्ट न हो, इसीलिये उसने अपना आँचल मुँहके सामने कर रक्खा है । नज़ाकतके मारे ही वह ज़रा चलती है और फिर वृक्षों की छायामें सुस्ताने लगती है । इस नज़ाकत का क्या ठिकाना है ?

कवियों की महिमा अपार है । वे लोग जिस-किसीकी तारीफ करने लगते हैं, उसे चरम को पहुँचा देते हैं । महाकवि मीर किसी नाज़नीकी नज़ाकत पर क्या खूब कहते हैं :—

खपेटे जो चोटी पै फूलोंके हार ।

नज़ाकतसे दोहरी कमर होगई ॥

( ६६ )

वह नाज़नी इतनी नाज़ुक थी, कि उसने अपनी चोटी पर जो फूलों के हार लपेटे, तो मारे बोकके उसकी कमर बल खा गई।

महाराजा भर्तृहरि की विरहिणी नायिका तो चन्द्रमाकी शीतल किरणों को नहीं सह सकती और महाकवि मीरकी नायिका की कमर चोटी पर फूलों के हार लपेटनेसे ही दोहरी हो गई। गुजबकी शायरी है। नज़ाकत और सुकुमारता की हद्द हो गयी !!

पण्डितेन्द्र जगन्नाथको तो अपनी नायिकाकी नज़ाकतकी तारीफ करनेके लिये कोई उपमाही नहीं मिलती। आप कहते हैं :—

नितरां पशुषा सरोजमाला न मृणालिनि विचार पेशलानि ।

यदि कोमलता तवांगकानामय का नाम कथापि पल्लवानाम् ॥

हे भामिनी ! हम तेरे शरीरकी कोमलताकी तुलना किस पदार्थसे करें, जब कि सरोज-माल भी तेरी कोमलताके आगे कठोर मालूम होती है ? कमलनालकी कोमलताका तो विचार करना ही किज़ूह है। जब कमलके कोमल पुष्पोंकी यह हालत है, तब उसके पत्तोंका नाम लेनेसे क्या लाभ ? वे बेचारे तेरी कोमलता की क्या बराबरी करेंगे ? तेरी कोमलता की उपमा का मिलना ही असम्भव है।

महाकवि नज़ीरकी सुकुमार नायिकाके पैरोंके तलवोंकी नमी का भी हाल सुन लीजिये :—

वह कोफे पा हमने सुहलाये हैं, नाज़ुक नर्म-नर्म।

क्या जताती है तू अपनी नमी, ऐ मखमल ! हमें ॥

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