शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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द्वय गुरु—भारी हैं, मुख सूरज और चाँदसा है और चरण मन्द-गामी शनैश्चरकी तरह मन्दगामी हैं। स्पष्ट है कि, उसके शरीरमें सभी तेजस्वी ग्रहोंका निवास है अथवा नवग्रह उसके सेवक हैं ; अतएव खीके होते नवग्रहोंके पूजनकी ज़रूरत नहीं ; क्योंकि एकमात्र उसकी पूजा-आराधनासे सभी फलोंकी प्राप्ति हो सकती है।
मिष्टर हारश्रव नामक एक पाश्चात्य विद्वान् भी स्त्रियोंको आकाशके सितारोंकी तरह पृथ्वीके सितारे कहते हैं। आप लिखते हैं :—“Women are the poetry of the world in the same sense as the stars are the poetry of heaven. Clear, light-giving, harmonious, they are the terrestrial planets that rule the destinies of mankind” जिस प्रकार नक्षत्र नमके आभूषण हैं ; उसी प्रकार स्त्रियाँ पृथ्वीकी आभूषण हैं। वे स्वच्छ-निर्मल, प्रकाशमान और शान्तिप्रद पार्श्व नक्षत्र हैं, जो मनुष्य-जातिके भाग्यका निपटारा करती हैं ; अर्थात् पुरुषोंके भाग्यका फैसला स्त्रियोंके हाथोंमें है।
महाराजा प्रतापसिंहज्ज अपनी नीचे लिखी ऋचितामें, स्त्रीके शरीरमें नवग्रहोंका निवास स्पष्ट रूपसे दिखाते हैं :—उसके बाल राहुके समान हैं, उसका मुँह चन्द्रमाके समान शोभित है, उसके दोनों नेत्र सूर्य हैं, अलकें केतु हैं, मन्द-मन्द हँसना शुक्र है, वाणी बुध है, दोनों स्तन वृहस्पति हैं, कान मङ्गल है और उसकी
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