भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 544 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

( ५३ )

मनुने कहा है :—

देवदत्तां पतिभ्याम्ब्री विन्दतेनेच्छयात्मनः । तां साध्वीं त्रिभुवान्नित्यं देवानाम् प्रियमाचरन् ॥ प्रजानार्थं स्तियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्चमानवाः । तस्मात् साधारणो धर्मः श्रुतौ षत्त्या सहोदितः ॥

परमात्मासे पत्नी मिलती है। पुरुष अपनी इच्छानुसार उसकी प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए पतिको अपनी साध्वी स्त्रीका सदा भरण-पोषण करना चाहिये। उसके इस कामसे देवता प्रसन्न होते हैं।

स्त्रियाँ सन्तान प्रसव करनेके लिए और पुरुष उनको उत्पादन करनेके लिए बनाये गये हैं; इसलिए भार्याके साथ रहना पुरुष का मुख्य धर्मकार्य है। पवित्र वेदोंकी ऐसी ही आज्ञा है।

हिन्दूके लिए विवाह धर्मका एक अंश या मुख्य भाग है। यह त्रिशुद्ध वैध धर्म-कार्य है। यह स्वार्थसिद्धि, बखरादारी या शराकत ( co-partnership ) का काम नहीं है; इसीलिये गृहस्थाश्रम शेष सभी आश्रमोंसे ऊँचा समझा जाता है। गृहस्थ—ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्यासी इन तीनोंसे ही श्रेष्ठ समझा जाता है। गृहस्थ अग्निमें हवन करता है, उससे मेह बरसता है; मेहसे अनाज पैदा होता है और अनाजसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन होता है; इसवास्ते गृहस्थ ही एक तैरहसे समस्त प्राणियों का पैदा करनेवाला है। जिस तरह जगत्के प्राणी श्वासकार्यसे