शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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जीते हैं ; उसी तरह ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सान्यासी गृहस्थकी सहायतासे जीवन धारण करते हैं ; इसीसे गृहस्थाश्रम सब आश्रमोंसे ऊँचा समझा जाता है । जिन्हें इस लोक और परलोकमें सुख भोगना हो, उन्हें गार्हस्थ्य जीवन निर्वाह करना चाहिये । मगर यज्ञादि धर्मकार्य पुरुष स्त्रीके बिना सम्पन्न कर नहीं सकता । अगर वह अकेला इन कर्मोंको करता है, तो उसको इनका फल नहीं मिलता । यही वजह है कि, सीताजीके बनमें रहनेके समय, जब रामचन्द्रजी अश्वमेध यज्ञ करने लगे, तब महर्षिोंने उन्हें सीता जीकी सोनेकी प्रतिमा बगलमें रखकर यज्ञ करनेका आदेश किया । जिस समय अय्यध्यापति महाराजा अजकी प्यारी रानी इन्दुमती जहरीली मालाके कारण स्वर्गको सिधार गई, महाराजके शोक का पारावार न रहा । यद्यपि उस समय एक इन्दुमतीके सिवा, महाराजके पास सब-कुछ था । ससाराग पृथ्वीका राज्य था, अनुल धन-सम्पत्ति थी, अप्सराओंका भी मानमर्दन करनेवाली हज़ारों वारंगनायें थीं, लाखों दास-दासी थे ; तथापि महाराजको जरा भी सुख-सन्तोष न होता था । उन्हें यह जगत् अन्धकारपूर्ण प्रतीत होता था । वे अपनी प्यारी रानीको याद कर-करके ज़ारज़ार रोते और कल्लपते थे ।
असल बात यह है, कि जो सुख पुरुषको अपनी स्त्री द्वारा मिलता है, वह और किसीसे भी मिल नहीं सकता । इस जगत्में उसका स्त्रीके समान सच्चा और चतुर सलाहकार कोई नहीं । जिस समय वह किसी भ्रमभटमें फँसकर घबरा जाता है,