भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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है, इसलिये लक्ष्य तक पहुँचनेके लिए दोनोंका मिलकर काम करना ज़रूरी है। ये दोनों एक दूसरेके विरोधी और प्रतिकूल नहीं, किन्तु अनुकूल और अनुगामी हैं। एक दूसरेके सुख-दुःखमें हिस्सा बँटाने और संसारके कार-व्यवहार चलानेके लिए पैदा हुए हैं। स्त्री-पुरुषके विवाह-बन्धनमें बँधनेसे ही गृहस्थी कह-लाती है। गृहस्थी एक गाड़ी है। स्त्री और पुरुष उस गाड़ीके दो पहिये हैं। जिस तरह गाड़ी एक पहियेसे नहीं चलती ; उसी तरह स्त्री या पुरुष किसी एकसे गृहस्थी उत्तम रूपसे नहीं चलती ; इसीलिये विवाह किया जाता है। हिन्दू-विवाहका आधार उच्च, धार्मिक और गूढ़ वैज्ञानिक सत्य है। हिन्दू-विवाह किसी अभि-प्राय या काम-वासना पूरी करनेके लिए नहीं किया जाता। विवाह-सम्बन्ध धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिए किया जाता है। गार्हस्थ्य जीवन-विना इस लोक और परलोक दोनोंमें ही सुख नहीं है। शास्त्रमें लिखा है :—

स सन्धार्थः प्रयत्नेन, स्वर्गमच्यमिच्छता ।

सुखन्चे हेच्छतानित्यं, योऽधार्थ्यादुर्बलेन्द्रियैः ॥

जो मृत्युके बाद सदा स्वर्गमें रहना चाहता है और जो इस जीवनमें सुख भोगना चाहता है, उसे बड़ी होशियारीके साथ गार्हस्थ्य जीवन निर्वाह करना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, जो अजितेन्द्रिय है, वह गृहस्थाश्रमके धर्मकार्य कर नहीं सकता।

नोट—इसका यह अ्थाय है कि, हिन्दू-स्त्री हिन्दूके लिए ख़ूब भोगनेकी चीज़ नहीं—उसके घरमें देवी है।

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