शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४० )
हे स्त्री ! तू रातका तारा और प्रातःकालका हीरा है । तू ओसका कृतारा है, जिससे काँटेका मुँह भी मोतियोंसे भर जाता है । वह रात अँधेरी और वह दिन फीका मालूम होता है, जबकि तेरी आँखोंकी रोशनी दिलको ठण्डा नहीं करती । हृदय का घाव बिना तेरे मधुर ओठोंके अच्छा हो नहीं सकता । विपत्तिमें तू सहायक होती है ।
हे अवला ! तेरे शरीर और आत्मामें एक जादू है । जिधर हम जाते हैं उधर तेरी ज्योति हमें राह दिखाती है । चाहे गरम-से-गरम देश हो और चाहे शीतल-से-शीतल देश हो, अगर तू वहाँ मौजूद है, तो वहाँ भी आनन्द ही है । टामस मोर ।
सलाह या मशवराः करनेके लिए खी पुरुषसे अच्छी है । जब कभी किसी मामूली सी बातसे मेरा दिल घबरा उठता है, तब खीकी मदद मिलनेसे मुझे पसा मालूम होता है, मानो यह बात ऐसी नहीं है, जिससे मुझे दुखी होना पड़े । ( खी सलाह देनेमें
मुसलमानोंके यहाँ भी लिखा है कि, पहले आदम पैदा हुआ और फिर हून्वा ( Adam and Eve ) । मनुसे मनुष्य शब्द और आदमसे आदमी शब्द बना । संसारका पहला पुरुष मनु या आदम था और पहली स्त्री शतरूपा या हून्वा थी । इन्हींसे जगत् को उत्पत्ति हुई । जबतक आदमको हून्वा न मिली, तब तक उसे बागे अदन या नन्दनकानन उजाड़से भी डरा मालूम होता था ।
व्यास-संहितामें लिखा है—जब तक विवाह नहीं होता, तब तक पुरुष अर्क देह रहता है । विवाह होनेके बाद पुरुष पूर्णदेह होता है ।