भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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( ३६ )

स्त्री है, उसका घर नन्दन कानन है। देखिये, संसारके प्राचीन और अर्वाचीन विद्वानों और महापुरुषोंने नारां जातिके सम्बन्धमें क्या कहा है :—

वी-महिमा ।

—○○—

हे स्त्री ! स्वर्गमें क्याहै, जो तुम्हमें नहीं ? अद्भुत ज्योति, सत्य, अनन्त सुख और अनादि प्रेम—सभी तुम्हमें हैं। आट् वे ।

स्त्री इस संसारका रमणीक प्रदेश है। इस प्रदेशमें विश्वास-तत्त्व लहलहा रहे हैं, आनन्दके फूल खिल रहे हैं, हर्ष-विहग कलरव कर रहे हैं तथा निर्वृत्ति और विश्वासकी नदियाँ वह रही हैं। यहाँ शोरोगुलका नाम भी नहीं है। लार्ड वैरन ।

स्त्री पुरुषका आध्या श्रेष्ठ भाग है* । पुरुष जबतक शादी नहीं करता, अधूरा रहता है। स्त्री एक तरहका तीर्थ है। विद्याता हमें उसकी यात्राको भेजता है। स्त्री पुण्यात्माके लिए स्वर्ग है और दृष्टके लिए स्वर्ग-सोपानका पहला पद। स्त्री एक खज़ाना है। जिस पुरुषके पास यह खज़ाना नहीं, वह अपने कर्जको अदा कर नहीं सकता, यानी अपने पितरोंका ऋण चुका नहीं सकता। शर्ले ।

ॐ हमारे भगवान् मनु ने भी यही बात कही है। उन्होंने कहा है कि, विद्याता ब्रह्मने अपने शरीरके दो भागकर, बाधे अंशसे पुरुष और बाधेसे स्त्रीको पैदा किया।

पुरुषका नाम मनु और स्त्रीका नाम शतरुपा हुआ। अंगरेजों और