भारतकोश
शृंगार शतक

शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

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रहता है और प्रेममयी पत्नी हँसती हुई उसका स्वागत या इस्त्क-बाल करती है। धर्म आनन्दकी ज्योति फैल जाती है। नौबेलिस।

हे स्त्री! दिलकी बेहोशीको रोकना तेरा ही काम है। जब आश्वासनकी ज़रा भी उम्मीद नहीं रहती, तब दुःखको बँटाना तेरा ही काम है। संसारकी शोभा और ज़िन्दगीका मज़ा तुझमें ही है। संसारकी भलाई ही तेरा काम है और उसी परोपकारमें तुझे प्रसन्नता है। —ग्राह्य।

स्त्रीकी दृष्टिमें ईश्वरीय प्रकाश है। वह एक मीठी नदी है। उसीमें पति अपनी प्यास बुझा सकता और अपने शोक-दुःखोंसे छुटकारा पा सकता है। पतिके दुःखमें स्त्री ही एकमात्र शरण और आनन्दका स्थान है। —जरमिटेल्।

पुरुषके जीवनका सोता स्त्रीकी छाती है। वही उसे बात करना सिखाती और वही उसके आँसू पोंछती है। बुरे समय में जब सब उसे छोड़कर अलग हट जाते हैं, तब वही उसकी स्वर लेती और गरम निःश्वासोंको शीतल करती है। लाई बैरन।

पतिके लिए स्त्रीके सब प्रेमसे ज़ियादा कुछ भी प्यारा नहीं है। पृथ्वी पर स्त्रीके सच्चे और दृढ़ प्रेमसे बढ़कर सुखदायी चीज़ नहीं। ईश्वरको भी मधुरभाषिणी और पवित्र स्त्रीसे अधिक कोई चीज़ प्यारी नहीं। —राबर्ट द ब्रून।

प्रिये! आओ। मेरे पास बैठ जाओ, क्योंकि प्रातःकालीन प्रकाशसे ईश्वरीय ज्योति निकल रही है। प्रार्थना करनेका समय है, पर तुम बिना मुझसे प्रार्थना नहीं होती। आओ, दोनों