भारतकोश
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शृंगार शतक

Shringar Shatak

भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा

स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)

Devanagarihipublished544 पृष्ठ

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रहता है और प्रेममयी पत्नी हँसती हुई उसका स्वागत या इस्त्क-बाल करती है। धर्म आनन्दकी ज्योति फैल जाती है। नौबेलिस।

हे स्त्री! दिलकी बेहोशीको रोकना तेरा ही काम है। जब आश्वासनकी ज़रा भी उम्मीद नहीं रहती, तब दुःखको बँटाना तेरा ही काम है। संसारकी शोभा और ज़िन्दगीका मज़ा तुझमें ही है। संसारकी भलाई ही तेरा काम है और उसी परोपकारमें तुझे प्रसन्नता है। —ग्राह्य।

स्त्रीकी दृष्टिमें ईश्वरीय प्रकाश है। वह एक मीठी नदी है। उसीमें पति अपनी प्यास बुझा सकता और अपने शोक-दुःखोंसे छुटकारा पा सकता है। पतिके दुःखमें स्त्री ही एकमात्र शरण और आनन्दका स्थान है। —जरमिटेल्।

पुरुषके जीवनका सोता स्त्रीकी छाती है। वही उसे बात करना सिखाती और वही उसके आँसू पोंछती है। बुरे समय में जब सब उसे छोड़कर अलग हट जाते हैं, तब वही उसकी स्वर लेती और गरम निःश्वासोंको शीतल करती है। लाई बैरन।

पतिके लिए स्त्रीके सब प्रेमसे ज़ियादा कुछ भी प्यारा नहीं है। पृथ्वी पर स्त्रीके सच्चे और दृढ़ प्रेमसे बढ़कर सुखदायी चीज़ नहीं। ईश्वरको भी मधुरभाषिणी और पवित्र स्त्रीसे अधिक कोई चीज़ प्यारी नहीं। —राबर्ट द ब्रून।

प्रिये! आओ। मेरे पास बैठ जाओ, क्योंकि प्रातःकालीन प्रकाशसे ईश्वरीय ज्योति निकल रही है। प्रार्थना करनेका समय है, पर तुम बिना मुझसे प्रार्थना नहीं होती। आओ, दोनों

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मिलकर प्रार्थना करें। तुम ईश्वरसे मेरा हाल कहना और मैं तुम्हारा कहूँगा।

—पल्लिन कनिंघम।

ईश्वर न करे, उसके पतिकाँ हार हो अथवा वह बीमार हो जावे। पराजित पतिकाँ वह धीरज देगी और रोगार्त्त की सेवा-शुश्रूषा करेगी। अगर पति नाराज़ हो जायगा, तो वह नाराज़ न होगी; उल्टे उसका हँसता हुआ चेहरा उसके शोकको हरेगा। वह ज़िन्दगी-भर उसकी ख़िदमत करेगी। अगर वह पहले मर जायगा, तो वह उसके कुटुम्बकी ख़बर लेगी, उसके मानको स्थिर और इज़्जतको कायम रखेगी। उसके चेहरेसे बुद्धि बरसती है और उसकी जीभसे मिह्रबानी टपकती है।

—बिशप हारन।

हे स्त्री ! तू धन्य है ! तेरा करुणामय हाथ विपद्को भया-नक बनने में भी आनन्दके बाग लगाता है। जो नीच तुम्हें केवल क्षण-भर दिल खुश करनेका खिलौना समझता है, उसका दिल मैला है—वह तेरे गुणोंको नहीं जानता।

—ब्रैसफर्ड।

संसार-वाटिकामें स्त्री सबसे अच्छा फूल है। उसका लालित्य, उसकी सुगन्ध और मनोहरता विचित्र है।

—थैकरे।

समुद्रके भीतरका वज़ाना इतना महँगा नहीं, जितना कि वह आनन्द जो स्त्रीसे पुरुषको मिलता है।

मिल्टन।

सुशीला स्त्री पतिका परम स्नेही मित्र है। उसकी सच्चाई इश्वरीय नियमकी तरह अटल है। उसकी पवित्रता देवी प्रकाश की भाँति निर्दोष है। पति मौजूद रहे या नामौजूद रहे, उसे

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अपनी स्त्री पर पूरा भरोसा रहता है कि, उसकी प्यारी चीज़ोंको, खासकर उसकी सबसे प्यारी चीज़ अपने तईं, वह दक्षित रखेगी—जाने न देगी। वह अपने ऐसे विश्वासी मंत्रीके भरोसे बेफिक और निर्भय होकर काम पर जाता है। वह अपने शत्रुओंमें फिज़ूल-खर्ची नहीं करती—सभी कामोंमें किफायतसे काम लेती है। पतिको जिस चीज़की ज़रूरत होती है, उसे ही ठाकर हाज़िर कर देती है। सदा उसका भला चाहती है। उसका रस्ती-भर नुकसान होने नहीं देती। कभी भी उसे शोकार्त् या रज्जीदा होने नहीं देती। अगर पतिको शोक होता है तो हर लेती है और अपना विश्वास बढ़ाती रहती है। —बिशप होएन।

संसारमें कोई भी चीज़ सुन्दरी, पवित्रात्मा, विनोदशीला और नारीसे अधिक मनोहर नहीं। —हण्ट।

स्त्रीकी आँखोंमें ईश्वरने दीपक जला रखे हैं, ताकि भूले-भटके पुरुषोंको उन चिरागोंकी रोशनीमें स्वर्गकी राह दीख जावे। —विल्किंस।

मामूली नौजवानोंको स्त्रियोंमें कोई गुण न दीखता हो तो न दीखता हो, पर मेरी नज़रमें तो वह देवीसे कम नहीं।

—वासिङ्गटन आयर्विंग

जब तक पुरुष पर आकृत्त नहीं आती, तब तक उसे अपनी स्त्रीके गुणोंका पता नहीं लगता। विपद् आने पर उसे मालूम हो जाता है कि, उसकी स्त्री सखी देवी है। —बेलजर

कण्टकपूर्ण शाखाको फूल सुन्दर बना देते हैं और

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गरीब-से-गरीब घरको लज्जावती युवती स्वर्ग बना देती है ।

—गोल्डस्मिथ ।

प्रियदर्शनता, विनोदशीलता, प्रज्ञा और प्रभामें पुरुष स्त्रीकी बराबरी नहीं कर सकता । वह विपद्में पड़े हुए पतिकी उदासीको दूर करती, थके हुए की थकान दूर करती और अपने मुस्कराते हुए मुँहसे सारे घरमें आनन्दके फूल बरसाती है । —गिज़बोर्न ।

जब तक आदमकी शादी नहीं हुई, स्वर्ग उसके लिए काँटोंका घर था । देवताओंका गाना, पक्षियोंका चहचहाना, फूलोंका हँसना और सवेरेकी सुहावनी हवाके भोंके उसे बेमज़े मालूम होते थे । वह उदास फिरा करता था । ज्योंही हवा आई, उसका सारा दुःख दूर हो गया और नन्दन कानन आनन्द-भवन हो गया । —कैम्बेल ।

अगर संसारमें खी न हो, तो संसार इस तरह सूता और भयानक दीखने लगे जिस तरह वह मेला, जिसमें न तो खरीद-फरोख्त-कय-विक्रय और लेन-देन होता है और न कोई विल-बह-लानेका सामान होता है । स्त्रीकी मुस्कराहटके बिना सृष्टि उसी तरह निष्फल और व्यर्थ हो जावे, जिस तरह जीव बिना देह, फलफूल बिना वृक्ष, किलेदार बिना किला, नींव बिना महल और पतवार बिना नाव । अगर स्त्री नहीं तो प्रेम नहीं और प्रेम नहीं तो आनन्द नहीं । संसारमें जो सुख है वह स्त्रियोंके ही प्रतापसे है । अगर संसारमें कोई प्रकासकी रेखा है, तो वह इन्हींसे है ।

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कुत्ता नमकहलाह होता है, स्त्री उससे भी ज़ियादा नमक-हलाह होती है। वह नावकी पतवारसे ज़ियादा पकी और महलके सिन्तू या षंभेसे भी अधिक मज़बूत है। नावके टूट जानेवालोंको किनारा जैसा प्यारा होता है, पुरुषके लिए स्त्री वैसी ही प्यारी है। वह सन्तानसे भी ज़ियादा प्यारी और रातके बाद होनेवाले प्रभातसे भी अधिक प्रकाशमान है। रेगिस्तान या रेतीले जङ्गलोंमें सफर करनेवाले प्यासोंको पानी जैसा प्यारा और मीठा लगता है, पुरुषके लिए स्त्री उससे भी अधिक मीठी और आनन्द-दायिनी है। —यंग

स्त्रियाँ संसारमें देवताओंकी तरह घूमती हैं। स्वार्थपरता या खुशहाज़ीका तो उनमें नाम भी नहीं। प्रत्युपकारका उन्हें ध्यान भी नहीं। स्त्री पर चाहे जितना भार डालो, हैरान करो, अत्याचार करो, वह न बोलेगी। ऊँट तो ज़ियादा बोभ होनेसे चीखता और बलबलाता है, पर स्त्री चूँ नहीं करती। हे ईश्वर ! तूने स्त्रीको पुरुषका योग्य साथी बनाया। सब पूछो, तो ईश्वर की सृष्टिमें स्त्री ही सर्वश्रेष्ठ है। उसके चेहरेसे गौरव टपकता एवं सम्मान और स्नेह उसके शासनमें चलते हैं। तूने अपनी अदभुत शक्तिसे उसे पुरुषोंके दिल कोमल करनेको बनाया, ताकि पुरुषोंके दिल उसे देखकर तरे भक्तिभावसे पूर्ण हो जावें। मिस बैनट।

विपद्की चोटोंसे जब हम बेवस हो जाते हैं और हमारे बन्धु-बान्धव हमें त्याग देते हैं, तब स्त्री ही हमारे दुःखका कारण खाजती है। उसकी मुस्कराहटसे हृदय शीतल हो जाता है।

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उसकी मीठी आवाज़ हृदयके तापको मिटा देती और सुखे हृदय को फिरसे हराभरा और तरोताज़ा कर देती है । —गैली नाइट ।

स्त्रीकी मर्यादा उसके अपरिचित रहनेमें, उसकी प्रभा उसके पतिके सम्मानमें और उसका सुख उसके कुटुम्बके मङ्गल या कल्याणमें है । —कसो ।

देखा गया है कि, प्रकृतिने नारियोंको स्वयं चिन्ता और कृश भोगनेको पैदा नहीं किया । उसने उन्हें हमारी चिन्ताओंके काम करनेको बनाया है । —गोल्डसिथ ।

स्त्रियाँ जिन्होंने अपना विश्वास खो दिया है, उन फरिश्तोंके समान हैं जिन्होंने अपने पंख गँवा दिये हैं । डाक्टर वाल्टर स्मिथ ।

जॉय नामक एक पाश्चात्य चिन्ता कहते हैं :—“But for women, our life would be without help at the outset, without pleasure in its course and without consolation at the end” अगर स्त्रियाँ न हों, तो पुरुष की बाल्यावस्था असहाय और यौवन आनन्द-विहीन हो जाय तथा बुढ़ापेमें कोई आश्वासन देनेवाला न हो । मतलब यह है कि, पुरुषको हर अवस्थामें स्त्रीकी ऊहरत है । ठीक है, जिसके एक सती साध्वी नारी हो, और चाहे कुछभी न हो, वह परम सुखी है ।

गोथे महोदय कहते हैं—“A hearth of one's own and a good wife are worth gold and pearls.” निजका घर और साध्वी स्त्री सोने और मोतियोंके बराबर हैं ।

बेकन महोदय भी कहते हैं :—“Wives are young

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men's mistresses, companion for middle age, and old men's nurses" स्त्रियां युवावस्थामे पत्नियोंका, मध्यावस्था में सहचारिणियोंका और बुढ़ापेमें धायोंका काम देती हैं ।

स्पेनवालोंमें एक कहावत है—“To him who has a good wife, no evil can come which he cannot bear.” जिस पुरुषके भली स्त्री है, उस पर ऐसी कोई विपत्ति नहीं आ सकती, जिसे वह सह न सके ।

बहुत से अनजान कहेंगे कि, यूरोपियन लोग तो स्त्रियोंके गुलाम होते ही हैं । उनकी गाई स्त्री-महिमा हमारे किस मस्तरफ की ? ऐसोके सन्तोषके लिए, हम अपने हिन्दू-शास्त्रों से ही चन्द श्लोक उद्धृत करते हैं । वे आँखें खोलकर देखें, हमारे यहाँ ही नारी जातिकी कैसी महिमा गाई गई है :—

महाभारतके आदि पर्वमें लिखा है :—

अर्द्धे भायां मनुष्यस्य, भायां श्रेष्ठतमः सखा ।

भायां मूलं त्रिवर्गस्य, भायां मूलं तरिष्यतः ॥

सखायः प्रविक्तेषु, भवन्त्येताः प्रियम्बदाः ।

पितरो धर्मकार्येषु, भवन्त्यातस्य मातरः ॥

भायां वन्तः क्रियावन्तः, समायां गृहमेधिनः ।

भायां वन्तः प्रमोदन्ते, भायां वन्तः श्रियान्विताः ॥

कान्तोरुषपि विश्रामो, जनस्याध्वनिकस्य वै ।

यः सदारः स विश्वास्यस्तस्माद्वाराः परागतिः ॥

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संसरन्तमपि प्रेतं विषमेवेकपातितं ।

भायैवान्वेति भर्तारं सततं या पतिव्रता ॥

प्रथमं संस्थिता भार्या पतिं श्रेयं प्रतीक्षते ।

पूर्वं मृतं च भर्तारं पश्चात्साध्यनुगच्छति ॥

दक्षमाना मनोदुःखैव्याधिभिरश्वातुरा नराः ।

आह्लादन्ते स्वेषु दारेषु धर्मातोऽलिलेखिव ॥

स्त्री पुरुषकी अर्द्धाङ्गी है । स्त्री पुरुषका सर्वोत्तम मित्र है । स्त्री धर्म, अर्थ और काम की जड़ है । स्त्री भवसागरसे पार होनेवाले मुमुक्षुओंकी मूल है ।

यह मधुभ्राविणी आफ़तकी जगह मित्र, धर्मके कामोंमें पिता और दुःख आपड़ने पर माँ बन जाती है ।

जिसके स्त्री है वही क्रियावान् है, जिसके स्त्री है वही गृहस्थ है, जिसके स्त्री है वही सुख पाता है और जिसके स्त्री है वही लक्ष्मीवान् है ।

वनभूमिमें स्त्री विश्राम या आरामकी जगह है ; जिसके स्त्री है वही विश्वज्ञासयोग्य है ; इसलिये स्त्री परम गति है ।

चाहे पति आवागमन या जन्ममरणके चक्रमें फँसा हो, चाहे मर गया हो और चाहे किसी दुर्गम स्थानमें पड़ा हो, स्त्री ही है जो उसके पीछे-पीछे चलती है ।

पतिपरायणा स्त्री अगर पहले मर जाती है, तो (स्वर्गमें जाकर)

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पतिकी राह देखती है । अगर पति पहले मर जाता है, तो सती उसके पीछे-पीछे जाती है ।

मानसिक क्लेशोंसे जल्दते हुए और रोग-पीड़ित पुरुष अपनी स्त्रियोंसे उतने ही सुखी होते हैं, जितना कि सूरज की किरणोंसे तपा हुआ पुरुष पानी पीनेसे आनन्दित होता है ।

स्त्री पुरुषका आधा अङ्ग है ; उसके बिना पुरुष अधूरा है । इस विषयमें “मनु-संहिता”में लिखा है :—

द्विधा कृत्वात्मनो देहम्, अर्द्धेन पुरुषोऽभवत् ।

अर्द्धेन नारी तस्यांश, विराजमसृजत् प्रभुः ॥

ब्रह्माने अपने शरीरके दो हिस्से करके, आधेसे पुरुष और आधेसे स्त्री पैदा की ।

“व्यास-संहिता”में भी लिखा है :—

पाटितोऽयं द्विधाः पूर्वम्, एक देहः स्वयम्भुवा ।

पतयोऽर्द्धेन चार्द्धेन, पातन्योऽमुवाचितिश्रुतिः ।

यावन्न विन्दते जाया, तावदर्द्धं भवेत्पुमान् ॥

ब्रह्माने एक देहके दो टुकड़े करके, आधे भागसे पति और दूसरे आधेसे पत्नियाँ पैदा कीं । इसका प्रमाण वेदमें है । जब तक विवाह नहीं होता, तबतक पुरुष ‘अर्द्ध’ देह रहता है—शादी होनेके बाद पुरुष ‘पूर्णदेह’ होता है ।

“मनुस्मृति”में ही लिखा है :—

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न निष्कय विसर्गाभ्याम् भर्तुर्माभ्यां विमुच्यते ।

एवं धर्मं विजानीयः प्राक् प्रजापतिनिर्मितम् ॥

पति पत्नीका सम्बन्ध दान, बिक्री या त्याग द्वारा भी नहीं टूट सकता । यह नियम पूर्वकालसे विद्यमाना चलाया है ।

यदि रामा यदि चरमा, यदि तनयो विनयगुणोपतः ।

तनयेतनयोत्पत्तिः, सुरवरनगरे किमधिकम् ? ॥

अगर स्त्री है, अगर लक्ष्मी है, अगर शीलवान पुत्र है और पुत्रके पुत्र हो गया है, तो फिर स्वर्गमें इससे अधिक क्या है ?

नीतिकारोंने छः सुख प्रधान कहे हैं । उनमेंसे स्त्रीका सुख भी एक है । किसी विद्वान्ने कहा है :—

अर्थगमो नित्यमरोगिता च ।

प्रिया च भाभ्यां प्रियवादिनी च ।

वश्यश्च पुत्रो अर्थकरी च विद्या ।

पद्म जीवलोकस्य सुखानि राजन् ! ॥

हे राजन् ! धनकी आमद, सदा आरोग्य रहना, प्यारी और प्रियवादिनी स्त्री, वशमें रहनेवाला पुत्र और फल देनेवाली विद्या — ये छे संसारके सुख हैं ।

स्त्रीका काम पुरुषके बिना और पुरुषका काम स्त्रीके बिना चल नहीं सकता । स्त्री और पुरुष एक दूसरे पर निर्भर करते हैं । एक दूसरेके बिना अधूरा है । दोनोंका उद्देश एक ही

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है, इसलिये लक्ष्य तक पहुँचनेके लिए दोनोंका मिलकर काम करना ज़रूरी है। ये दोनों एक दूसरेके विरोधी और प्रतिकूल नहीं, किन्तु अनुकूल और अनुगामी हैं। एक दूसरेके सुख-दुःखमें हिस्सा बँटाने और संसारके कार-व्यवहार चलानेके लिए पैदा हुए हैं। स्त्री-पुरुषके विवाह-बन्धनमें बँधनेसे ही गृहस्थी कह-लाती है। गृहस्थी एक गाड़ी है। स्त्री और पुरुष उस गाड़ीके दो पहिये हैं। जिस तरह गाड़ी एक पहियेसे नहीं चलती ; उसी तरह स्त्री या पुरुष किसी एकसे गृहस्थी उत्तम रूपसे नहीं चलती ; इसीलिये विवाह किया जाता है। हिन्दू-विवाहका आधार उच्च, धार्मिक और गूढ़ वैज्ञानिक सत्य है। हिन्दू-विवाह किसी अभि-प्राय या काम-वासना पूरी करनेके लिए नहीं किया जाता। विवाह-सम्बन्ध धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्तिके लिए किया जाता है। गार्हस्थ्य जीवन-विना इस लोक और परलोक दोनोंमें ही सुख नहीं है। शास्त्रमें लिखा है :—

स सन्धार्थः प्रयत्नेन, स्वर्गमच्यमिच्छता ।

सुखन्चे हेच्छतानित्यं, योऽधार्थ्यादुर्बलेन्द्रियैः ॥

जो मृत्युके बाद सदा स्वर्गमें रहना चाहता है और जो इस जीवनमें सुख भोगना चाहता है, उसे बड़ी होशियारीके साथ गार्हस्थ्य जीवन निर्वाह करना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें नहीं हैं, जो अजितेन्द्रिय है, वह गृहस्थाश्रमके धर्मकार्य कर नहीं सकता।

नोट—इसका यह अ्थाय है कि, हिन्दू-स्त्री हिन्दूके लिए ख़ूब भोगनेकी चीज़ नहीं—उसके घरमें देवी है।

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मनुने कहा है :—

देवदत्तां पतिभ्याम्ब्री विन्दतेनेच्छयात्मनः । तां साध्वीं त्रिभुवान्नित्यं देवानाम् प्रियमाचरन् ॥ प्रजानार्थं स्तियः सृष्टाः सन्तानार्थञ्चमानवाः । तस्मात् साधारणो धर्मः श्रुतौ षत्त्या सहोदितः ॥

परमात्मासे पत्नी मिलती है। पुरुष अपनी इच्छानुसार उसकी प्राप्ति नहीं कर सकता। इसलिए पतिको अपनी साध्वी स्त्रीका सदा भरण-पोषण करना चाहिये। उसके इस कामसे देवता प्रसन्न होते हैं।

स्त्रियाँ सन्तान प्रसव करनेके लिए और पुरुष उनको उत्पादन करनेके लिए बनाये गये हैं; इसलिए भार्याके साथ रहना पुरुष का मुख्य धर्मकार्य है। पवित्र वेदोंकी ऐसी ही आज्ञा है।

हिन्दूके लिए विवाह धर्मका एक अंश या मुख्य भाग है। यह त्रिशुद्ध वैध धर्म-कार्य है। यह स्वार्थसिद्धि, बखरादारी या शराकत ( co-partnership ) का काम नहीं है; इसीलिये गृहस्थाश्रम शेष सभी आश्रमोंसे ऊँचा समझा जाता है। गृहस्थ—ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्यासी इन तीनोंसे ही श्रेष्ठ समझा जाता है। गृहस्थ अग्निमें हवन करता है, उससे मेह बरसता है; मेहसे अनाज पैदा होता है और अनाजसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और पालन होता है; इसवास्ते गृहस्थ ही एक तैरहसे समस्त प्राणियों का पैदा करनेवाला है। जिस तरह जगत्के प्राणी श्वासकार्यसे

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जीते हैं ; उसी तरह ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और सान्यासी गृहस्थकी सहायतासे जीवन धारण करते हैं ; इसीसे गृहस्थाश्रम सब आश्रमोंसे ऊँचा समझा जाता है । जिन्हें इस लोक और परलोकमें सुख भोगना हो, उन्हें गार्हस्थ्य जीवन निर्वाह करना चाहिये । मगर यज्ञादि धर्मकार्य पुरुष स्त्रीके बिना सम्पन्न कर नहीं सकता । अगर वह अकेला इन कर्मोंको करता है, तो उसको इनका फल नहीं मिलता । यही वजह है कि, सीताजीके बनमें रहनेके समय, जब रामचन्द्रजी अश्वमेध यज्ञ करने लगे, तब महर्षिोंने उन्हें सीता जीकी सोनेकी प्रतिमा बगलमें रखकर यज्ञ करनेका आदेश किया । जिस समय अय्यध्यापति महाराजा अजकी प्यारी रानी इन्दुमती जहरीली मालाके कारण स्वर्गको सिधार गई, महाराजके शोक का पारावार न रहा । यद्यपि उस समय एक इन्दुमतीके सिवा, महाराजके पास सब-कुछ था । ससाराग पृथ्वीका राज्य था, अनुल धन-सम्पत्ति थी, अप्सराओंका भी मानमर्दन करनेवाली हज़ारों वारंगनायें थीं, लाखों दास-दासी थे ; तथापि महाराजको जरा भी सुख-सन्तोष न होता था । उन्हें यह जगत् अन्धकारपूर्ण प्रतीत होता था । वे अपनी प्यारी रानीको याद कर-करके ज़ारज़ार रोते और कल्लपते थे ।

असल बात यह है, कि जो सुख पुरुषको अपनी स्त्री द्वारा मिलता है, वह और किसीसे भी मिल नहीं सकता । इस जगत्में उसका स्त्रीके समान सच्चा और चतुर सलाहकार कोई नहीं । जिस समय वह किसी भ्रमभटमें फँसकर घबरा जाता है,

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उलभनको सुलभता नहीं सकता, उस समय उसकी सच्ची साधन— उसकी प्यारी पत्नी अपनी कुशाग्रबुद्धिसे फौरन मुश्किलको हल कर देती है। अनेक बार दिल्लीश्वर शाहन्शाह अकबर प्रसिद्ध हाजिरजवाब राजा बीरबलसे अत्यन्त कठिन और टेढ़े सवाल कर बैठते थे। वह उनके सवालोंका जवाब फौरन ही दे देते थे, लेकिन कभी-कभी गाड़ी रुक भी जाती थी। ऐसे मौके पर बीरबल घबराकर औंधे मुँह पड़े रहते और शोकके मारे पागलसे हो जाते थे। उस वक्त उनकी पत्नी या पुत्री ही, उनकी मुश्किलको हल करके, उनके शोक-सन्तापको दूर करती थीं। शारीरिक बलमें स्त्रियाँ चाहे पुरुषों की बराबरी न कर सकती हों, पर बुद्धिमें वे पुरुषोंसे कम नहीं। किसी-किसी बातमें तो उनकी सूक्ष्म पुरुषों की अपेक्षा गहरी होती है। पुरुष कहते हैं, कि स्त्री की बुद्धि प्रलयंकारी होती है, पर यह कहावत सभी हालतोंमें ठीक नहीं। हमने स्वयं देखा है कि, बाज-बाज औकात हम कारोबार-सम्बन्धी इलभनमें ऐसे इलभ जाते हैं, कि दिनभर सोचने पर भी उसका कूल-किनारा नहीं होता। शामको घर आकर उदास मनसे बैठ जाते हैं। हमारी घरवाली हमारे चेहरेका रंग-दंग देखकर ताड़ जाती है, कि आज कुछ दालमें काला है। वह हमसे हमारी उदासीका कारण पूछती है और हमें कारण बताना ही पड़ता है। वह कहती है—“बड़े कारोबार वालोंके पीछे हजारों भंफट लगे ही रहते हैं। आप इस तरह बाढ़-बातमें रूझ कीजियेगा, तो आपका स्वास्थ्य नष्ट हो जायगा। हानिकी पूर्ति सहजमें हो

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जायगी, पर शरीर बड़ी मुश्किलसे सुधरेगा। पहले आप खाना खाइये और आराम कीजिये। मैं भी, अपनी अल्प बुद्धिके अनुसार, आपको सलाह दूँगी। अगर आप मेरी तुच्छ सम्मतिको ठीक समझें, तो तदनुसार काम कीजियेगा।” आश्वरकार जब सब खापी लेते हैं, नौकर चले जाते हैं और बच्चे सो जाते हैं, वह हमारी उलझनको चन्द्र मिनटोंमें ही सुलझा देती है—हमारी मुश्किलको हल कर देती है। हम उसकी बुद्धिकी तीव्रता देखकर दंग रह जाते और मन-ही-मन सराहना करते हैं। अगर कहा जाय किसी स्त्रियाँ चतुरा नहीं होतीं, तो मानना पड़ेगा कि, मर्द भी सभी चतुर बालाक और होशियार नहीं होते। हमारी रायमें, अगर अपनी घरवाली निरी मूर्खा न हो, तो उससे सलाह अवश्य लेनी चाहिये। किसी अँगारेज़ विद्वानने कहा है—“Woman's counsel is not worth much, yet he that despises it is no wiser than he should be.” स्त्रीकी सम्मति अधिक मूल्यवान नहीं होती, तोभी जो उसकी सलाहको घृणाकी दृष्टिसे देखता है, बुद्धिमान्नी नहीं करता।

गोस्वामी जीने बहुत ही ठीक कहा है—“धीरज, धर्म, मित्र अहं नारी, आपद-काल परखिये चारी।” अर्थात् धीरज, धर्म, मित्र और स्त्रीकी परीक्षा विपद्में करनी चाहिये; क्योंकि उसी समय उनका खरा-खोटापन मालूम होता है। (जब तक पुरुष पर आफत नहीं आती, उसे अपनी स्त्रीके गुणोंका पता नहीं लगता। जिस समय पुरुष पर चारों ओरसे विपद्की धनधोर घटाये जाते हैं,

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माता-पिता, भाई-बन्धु, मित्र और पुराने सेवक तक उससे आँख फेर लेते हैं, कोई उसकी बात नहीं पूछता ; तब उस घोर दुःखमें एक मात्र स्त्री ही उसकी शरणदाता और आनन्दका स्थान होती है, वहीं उसे शान्ति मिलती है । वही उसे ढाढ़स बंधाती और उसके शोकको हरती है । वही उसके दुःखके कारणको खोजती और वही उसकी औषधि सोचती है । वही अपनी मुस्कराहटसे उसके हृदय-की जलनको शान्त करती, अपने मधुर स्वरसे दिलकी मुरभाई हुई कलीको खिलाती और शुष्क हृदयको फिरसे तरोलाना करती है । विपद्में सभी नातेदार किनारा कर जाते हैं, पर वह अपने प्यारको नहीं त्यागती । सब तो यह है, संसारमें, घोर विपद्के समय, एक मात्र जगदीश और अपनी साध्वी स्त्री ही पुरुषकी खबर लेते हैं । हम इस बातको परीक्षा कर चुके हैं । हमने अपने जीवनमें जितनी विपदायें देखी हैं, बहुत कम लोगोंने उतनी देखी होगी । सब तो यह है, हमारा जीवन ही विपद्मय है । ईश्वरने हमें दुःख पानेके लिए ही पैदा किया है ।

सन् १९१९ में, जब हम घोर विपद्में फँस गये, रक्षाकी ज़रा भी आशा न रही, भाई-बन्धु आँख फेर गये ; साथी हमारी कमाई हुई दौलतको हड़पनेकी युक्तियाँ विचारने लगे ; कई सेवक जिन्हें हमने बड़ी-बड़ी सहायतायें दी थीं, हमारी विपद्की आगमें घुताहुति छोड़ने लगे, हमारे दुश्मनोंसे मिल कर षड्यन्त्र-पर-षड्यन्त्र रचने लगे, उन्हें हमारे छिद्र बताने लगे,—उस समय हमें चारों ओर अन्धकार-ही-अन्धकार दीखता था । उस समय

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हमारा सर्वस्व नाश होनेमें कोई कसर नहीं थी, यहाँ तक कि जीवन रहनेकी भी आशा नहीं थी। अमीरोंकी तरह सुख-चैनसे पले हुए छोटे-छोटे बच्चों और हमारी घरवालीको गलियोंमें भीख माँगनेतक की नौबत आ गई थी। जो हमारे अपने थे, जिनसे हमें कुछ आशा थी, उनकी तरफ हमने आँखोंमें आँसू भर कर देखा ; पर किसीका भी हृदय न पसीजा—सभी पत्थर-दिल हो गये। उस समय हम गहर गम्भीर चिन्तासागरमें गूँते खाने लगे। कहीं भी किनारा न दिखाई दिया। ऐसे समयमें हमें ईश्वरकी याद आई। उससे हमने अपने अन्तर्हृदयसे पुकार मचाई। उस दया-सिन्धुको हमपर दया आई। उसने हमारी मददको अपना गुप्त हाथ बढ़ाया। इधर हमारी घरवालीके हृदयमें बल आया। उसने हमसे कहा—“यह घोर विपद् है। अगर घरबाओगे, तो डूबनेमें संशय नहीं। घरबाहट छोड़ो और हाथ पैर मारो ; शायद किनारा मिल जाय। मेरे पास जो कुछ है, उस सबको फूँक दो और अपनी प्राणरक्षा करो। अगर आप होंगे, तो धन फिर हो जायगा। फिक्र मत करो ; जब तक मेरे पास एक कानी कौड़ी भी रहेगी, जेलमें भी आपको सुख पहुंचाऊँगी ; कुछ भी न रहेगा तो चरवा कात कर, मिहन्त-मज़दूरी करके बच्चोंको पालूँगी और आपके लिए भी जेलमें ज़रूरी चीज़ें भेजूँगी।” उस देवीके इन शब्दोंने हम पर जादूकासा असर किया। हमारा सुखा हृदय हरा हो गया। फिर ; उसने हमें भूतपूर्व वीर्यसराय लाई चेम्सफर्ड की शरणमें जानेकी सलाह दी। हमने वैसा ही किया। प्रसिद्ध संगदिल(?) लाई

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चेम्सफर्डका सख्त दिल भी हमारे लिए मोम होगाया । उस दयालु वायसरायने ( हम तो उन्हें दयालुओंका भी सिरताज कहेंगे ) हमारी सहायताके लिए, आनरबिल मिष्टर गोरले एम० ए०, सी० आई० ई०, आई० सी० ऐस० को नियत किया । बहुत क्या कहें, चन्द दिनोंमें विपद्के बादल उड़ गये । बुरे दिन गये, भले दिन आये । दुश्मन हाथ मलते रह गये । उस विपद्में अगर हमारी घरवाली देवी हमें त्याग देती और अपनी कुशाग्रबुद्धिका परिचय न देती, तो आज हम इस ग्रन्थको न लिखते होते ; बल्कि, जेलकी असह्य यंत्रणाएँ न सह सकेनेकी वजहसे, इस नापायेदार दुनियासे ही कूच कर जाते । अगर हम इस कहानीको पूर्ण रूपसे लिखें, तो आधीसे अधिक पुस्तक इसी कहानीसे भर जाय ; पर हमारे पास स्थानाभाव है, और इस रामकहानीका यहाँ लिखा जाना मुनासिब भी नहीं ; अतः अपनी बीती हम अपनी जीवनीमें विस्तारसे लिखेंगे । शेषमें, हम यह कहनेको बाध्य हैं कि, पुरुषके लिए स्त्री-विना इस संसारमें सर्वत्र अँधेरा-ही-अँधेरा है ।

इतना सब लिखनेका सारांश या सार मर्म यही है, कि नारी पुरुषकी अर्द्धाङ्गिनी, सहधर्मिणी और उसकी अन्तरात्माकी छाया या प्रतिमा है । वही कालिदासकी तरह पुरुषको उत्थानका मार्ग दिखानेवाली और तुलसीदासकी तरह मोक्ष-पथ प्रदर्शिका है । वही पुरुषके शोक-सन्तप्त हृदयको अपने सुधावारिसे सौंवर करती-ताजा रखनेवाली और अपने शोकहरा नामको सार्थक करनेवाली है । पुरुषके घोर विपद्कालमें वही एकमात्र सच्चे मित्रकासा

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बर्ताव करनेवाली, उसके दुःख-शोकमें हिस्सा बँटानेवाली, उसके दुःखको अपना ही दुःख समझनेवाली, उसके सुखके लिए अपना सारा सुख-आनन्द त्याग देनेवाली और उसके दुःखनाशकी औषधि खोजनेवाली है। घर मुसीबतमें जब पुरुषके सारे नाते-दार—माता-पिता, भाई-बहिन और दिल्ली दोस्तीका दम भरनेवाले मित्र किनारा कर जाते हैं, पास नहीं आते, बातें करनेमें भी आना-कानी करते हैं ; तब वही है जो उसका साथ नहीं छोड़ती, उसकी विपद्को अपनी ही विपद् समझती और तन-मन-धनसे उसकी सहायता करती है। वही है जो धर्मकार्यमें उसके साथ पिताकासा व्यवहार करती, खिलाने-पिलानेमें माताका सा बर्ताव करती, सलाह-सूत्र देने और धीरज बँधानेमें मित्रका सा काम करती और रति-समय वेश्यावत् व्यवहार करती है। वही है जो उसके रोग-पीड़ित और निर्धन होनेपर भी, उसका अनादर नहीं करती। उसके घरको भाड़-बुहार कर साफ रखती, हरेक चीजको यथास्थान सजाकर रखती, सुन्दर सुस्वादु भोजन बनाकर रखती, घरमें चिराग जलाती और उसके घरमें घुसते ही मुस्कराते हुए चेहरेसे उसका स्वागत करती है। उसे दुःखी देखकर आप आनन्दके फूलोंकी वर्षा करती और तुरलताते हुए नन्हेसे बच्चों को उसके आगे कर देती है। वह इन मनोहर दृश्योंको देखकर अपने शोकको भूल जाता और प्रसन्न होकर खाना खाता है। स्त्री-बिना पुरुषकी यह खातिर कौन कर सकता है ? इसीसे कहते हैं कि, नारी गृहकी लक्ष्मी, और घरका कल्याण है। वह घरकी श्रीवृद्धि,

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पेश्व्यर्थ और सुख समीका आधार है। वही पुरुषकी सर्वस्व और उसकी अन्तरात्मा है। उसकी जीवन-ज्योति उसीसे प्रज्वलित होती और प्रकाश पाती है। उस शक्तिरूपिणीसे ही उसे शक्ति मिलती है। बिना ग्रहिणीके घर निर्जन कानन या भयंकर श्मशान है। उसके बिना संसार सूना और जीवन ब्रथा है। वह पुरुषके लिये ईश्वरदत्त अनमोल हीरा है। उस कोहेनूरसे भी वैशकीमत हीरेके बिना उसका घर—घर नहीं है। इस दशामें उसे बनमें जाकर भगवद्भजन करना ही उचित है। स्त्रीरत्नके सच्चे कृदरदों पण्डित जगन्नाथ महाराज अपने “भामिनी-विलास” में यही बात कहते हैं :—

इदं लताभिः स्तबकानताभिर्मनोहरं हृत बनांतरालम् ।

सदैव सेव्यं स्तनभारवत्यो न चेद्युवत्यो हृदयं हेरयुः ॥

यदि स्तन-भारवती युवती चित्तको न हरे, तो भारसे झुकी हुई लतिकाओंसे सुशोभित कानन—गुफाका मध्यभाग सेवन करना उचित है ; यानी जड़ूलमें जाकर किसी गुफामें रहना सुनासिब है।

इसीको स्पष्ट शब्दोंमें यों कह सकते हैं—यदि भारी स्तनों के बोझसे झुकी जाने वाली नाजुनी—कोमलाडूनी पुरुषके चित्तको अपने नाजु-नखरों या हाव-भाव प्रभुत्विते प्रसन्न न करे ; तो पत्र-पल्लवोंके भारी बोझसे झुकी हुई लताओंसे शौभायमान गुहा या वनके मध्य भागमें रहकर प्रभुकी आराधना करनी चाहिये। जब