शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश | ११२ | कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार | १२१ |
| पत्रलेखन-प्रकार | ,, | राजा के भृत्य के संग वर्त्तन का वर्णन | १२२ |
| सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश | ११३ | भृत्य को कार्य-मुद्रा से अंकित करने का निर्देश | ,, |
| पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार | ११४ | भृत्यों को विशिष्ट राजचिह्न न देने का निषेध | ,, |
| व्यापक-व्याप्य के लक्षण | ,, | १० प्रकृति पुरोहितादियों का जातिनियम | १२३ |
| स्थान-टिप्पणादि के भेद | ११५ | भागग्राही और साहसाधिपति आदि पद के लिये क्षत्रियादि रखने का निर्देश | ,, |
| शेषापव्यय-स्थलापव्ययज्ञान | ,, | सेनापति-पद पर शूरमात्र को रखने का निर्देश | ,, |
| तिथ्यादि लिखने का निर्देश | ,, | भृत्य के लिये त्यागने योग्य राजा के लक्षण | ,, |
| गुञ्जादिकों का लक्षण | ११६ | सबों के सुख के अर्थ प्रवृत्ति का निर्देश | १२५ |
| प्रस्थपाद का लक्षण | ,, | धर्म के बिना सुख न मिलने का निर्देश | ,, |
| संख्या का प्रमाण | ,, | सर्व-साधारण के लिये विहिताचरण का निर्देश | ,, |
| संख्या की अनन्तता | ,, | निषिद्धाचरणों का निर्देश | १२६ |
| एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम | ११७ | दशविध पापों का निर्देश | ,, |
| कालमान का वैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था | ,, | दरिद्री आदिकों का रक्षण करने का निर्देश | ,, |
| भृति के ३ प्रकारों का निर्देश | ,, | समय पर हित और मित वचन कहने का निर्देश | १२७ |
| कार्यमानादिकों के लक्षण | ,, | अकेले सुखों का उपभोगादि करने का निषेध | ,, |
| मध्यमादि भृति के लक्षण | ११८ | अपने अपमान को प्रकाशित न करने का निषेध | ,, |
| पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश | ,, | ||
| हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश | ,, | ||
| शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश | ,, | ||
| भृत्य के तीन भेद | ११९ | ||
| भृत्यों को छुट्टी देने का नियम | ,, | ||
| रोग के समय भृति देने का प्रकार | ,, | ||
| बारबार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश | १२० | ||
| सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश | ,, |