शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शत्रु के भी गुणों को ग्रहण करने का निर्देश | १३६ | विद्यादिकों के फल | १४१ |
| प्रारब्धवश धनी-निर्धन होने का निर्देश | १३७ | शूरतादि के फलों का निर्देश | ” |
| दीर्घदर्शी के लक्षण | ” | सुन्दर विद्यादि को नीच से भी ग्रहण करने का निर्देश | ” |
| प्रत्युत्पन्नमति के लक्षण | ” | नष्ट वस्तु की उपेक्षा करने का निर्देश | १४२ |
| आलसी मनुष्य के लक्षण | ” | परद्रव्यहरणादि का निषेध | ” |
| साहसी के लक्षण व दोष | ” | प्राणनाशादि की संभावना में झूठ बोलने का निर्देश | ” |
| चिरकारी मनुष्य के लक्षण | १३८ | स्त्री-पुरुषादि में भेद डालने का निषेध | ” |
| सहसा कार्य करने का निषेध | ” | वार्त्ता करते हुये पुरुषों के बीच जाने का निषेध | ” |
| मित्र की विशेषता | ” | सपुत्र के लिये सपुत्र कन्या आदि को लाकर गृह में बसाने का निषेध | १४३ |
| बिना समझे किसी को मित्र बनाने का निषेध | ” | सर्पादि को तुच्छ समझकर अपमान करने का निषेध | ” |
| मित्र की प्राप्ति के लिये यत्न करने का निर्देश | ” | सर्पादि से संभल कर व्यवहार करने का तथा ऋणादि का समूल नाश करने का निर्देश | ” |
| विश्वस्त का भी अत्यन्त विश्वास करने का निषेध | १३९ | याचकादि के साथ व्यवहार का प्रकार | ” |
| प्रामाणिकादि का विश्वास करने का निर्देश | ” | दाता आदि की कीर्त्ति सुनने का निर्देश | १४४ |
| परीक्षा करके विश्वस्त मानने का निर्देश | ” | समय आदि पर परिमित भोजन आदि करने का निर्देश | ” |
| उग्र दण्ड और कटु वचन का निषेध | ” | स्त्री-संभोगादि का एकान्त में करने का निर्देश | ” |
| विद्यादिकों से प्रमत्त होने का निषेध | १४० | मधुरादि षड्रस अन्न को प्रीतिपूर्वक भोजन का निर्देश | ” |
| विद्यामत्तता के अनर्थकारी फल | ” | स्व-स्त्री के साथ विहार करने का निर्देश | ” |
| शौर्यमत्तता के अनर्थकारी फल | ” | ||
| धनमत्त पुरुष की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| कुलीनता के मद से मत्त की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| बलमत्त की स्थिति का वर्णन | १४१ | ||
| मानमत्त की स्थिति का वर्णन | ” | ||
| विद्यादि से सज्जनों को विनयी बनने का निर्देश | ” |