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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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शत्रु के छिद्र को भली प्रकार देखने का निर्देश३८४प्रातः सायं सैनिकों की गणना करने का निर्देश३८९
कार्य को नष्ट न करने का निर्देश,,भृत्यों के प्राप्ति-पत्र को ग्रहण कर वेतन-पत्र देने का निर्देश,,
सेनापति के नित्य-कृत्यों का निर्देश३८५शिक्षित सैनिकों को पूर्ण वेतन देने का निर्देश,,
भारी कार्य करनेवाले को पारितोषिक देने का निर्देश,,शत्रु से मिलकर सेना को नष्ट करने का निर्देश,,
शत्रु को नष्ट करने का उपाय,,मार डालने या त्याज्य नौकरों के लक्षण,,
शत्रु की सेना में भेद करने का प्रकार,,अन्तःपुरादिक में रखने योग्य भृत्य के लक्षण३९०
विपत्ति में पड़ी हुई शत्रु की मित्र-सेना की रक्षा करने का निर्देश,,अच्छी वेतन देकर पालने योग्य भृत्यों के लक्षण,,
राज्य के समीपवर्ती राज्य की रक्षा करने का निर्देश३८६शत्रु के भृत्यों के वेतन का विचार,,
शत्रु को जीतने पर शत्रु की प्रजा को प्रसन्न रखने का निर्देश,,राज्य-च्युत किये राजा के पुत्रादि की व्यवस्था का निर्देश,,
विजित राज्य के मन्त्रिमण्डल को बदलने का निर्देश,,शत्रु-संचित धन की व्यवस्था का निर्देश३९१
मन्त्री आदियों के कृत्यों का निर्देश३८७सदाचारी शत्रु का पालन और असदाचारी को कष्ट पहुँचाने का निर्देश,,
ग्राम से बाहर समीप में सैनिकों के टिकाने का तथा उनके निषिद्ध कार्यों का निर्देश,,पहरेदारों की व्यवस्था,,
१००० सैनिकों को शिक्षा देने के नियमों का निर्देश,,राजा के पूज्य होने के कारणों का निर्देश३९२
सैनिकों के लिये त्याज्य कर्म३८८चिरस्थायी राजा के लक्षण,,
सैनिकों के लिये कर्त्तव्य कर्म,,शीघ्र ही पदभ्रष्ट होनेवाले राजा के लक्षण३९३
आज्ञा के विरुद्ध आचरण करने पर दण्ड देने का निर्देश,,नीतिभ्रष्ट राजा को भी अन्य राजा का उद्धार करने में समर्थ होने का निर्देश,
सैनिकों के साथ प्रतिदिन व्यूहों का अभ्यास करने का निर्देश,,तेजोहीन राजा से बलवान् राजा के साधारण भृत्य का भी तेजस्वी होने का निर्देश,,