शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
पृष्ठ 84, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 84
( ३४ )
| विषय | पृष्ठ | विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश | ४०१ | प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन | ४०५ |
| बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश | ,, | योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण | ,, |
| अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश | ४०२ | एकचित्तता के भाव का वर्णन | ,, |
| धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश | ,, | श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन | ४०६ |
| अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश | ,, | हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश | ,, |
| शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुखदायी होने का निर्देश | ,, | अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश | ,, |
| अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश | ४०३ | कार्यसिद्ध्यर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश | ,, |
| अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश | ,, | छल का वर्णन | ४०७ |
| स्वकार्य-सिद्धयर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश | ,, | तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश | ,, |
| ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश | ,, | उत्तमादि भृत्यों के लक्षण | ४०८ |
| दर्प, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण | ४०४ | प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण | ,, |
| महान बैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश | ,, | उपदेश के विना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश | ,, |
| आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश | ,, | आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश | ,, |
| आपत्ति में बिना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का निर्देश | ,, | बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध | ,, |
| समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश | ४०९ | ||
| प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश | ,, |