भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश४०१प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन४०५
बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश,,योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण,,
अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश४०२एकचित्तता के भाव का वर्णन,,
धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश,,श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन४०६
अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश,,हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश,,
शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुखदायी होने का निर्देश,,अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश,,
अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश४०३कार्यसिद्ध्यर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश,,
अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश,,छल का वर्णन४०७
स्वकार्य-सिद्धयर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश,,तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश,,
ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश,,उत्तमादि भृत्यों के लक्षण४०८
दर्प, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण४०४प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण,,
महान बैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश,,उपदेश के विना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश,,
आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश,,आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश,,
आपत्ति में बिना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का निर्देश,,बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध,,
समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश४०९
प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश,,