भारतकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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तब उस व्याघ्रमारी (राजपुत्र की पत्नी) ने सोचा कि धूर्त शृगाल ही इसे यहाँ लाया है, अतः उसी शृगाल को फटकारती और अंगुली से भय दिखाती हुई बोली-

रे धूर्त शृगाल! पहिले तो तूने तीन बाघ दिये थे और आज एक ही बाघ विश्वस्त कर, प्रस्तुत करके क्यो जा रहा है।

ऐसा कहकर भयंकर व्याघ्रमारी वेग से दौड़ी और इधर बाघ गले मे शृगाल बांधे सहसा भाग गया।

कथा- 44

"जम्बुक की मुक्ति की कथा"

व्याघ्रमारी के भय से अन्य प्रदेश में जाने का इच्छुक बाघ, सियार को गले मे बाँधकर लटकाये लिये जा रहा है जिससे सियार की पीठ और पैर बुरी तरह रगड़ खाकर छिल उठे तथा रूधिर बहने लगा तब भी वह अपने को छुड़ाने की कामना से पीड़ित होते हुए भी बड़े जोर से हँसने लगा।

बाघ ने कहा-तू क्यों हँसा?

वह बोला-देव! मैंने उस व्याघ्रमारी को धूर्त समझा था तुम्हारी कृपा से दूर देश पहुँचकर जीवित बच गया। किन्तु हमारे गिर रुधिर बिन्दुओं से चिन्हित् मार्ग का अनुसरण करती वह पीछे-पीछे आ रही हो तो कैसे जीवित बचेंगे।

इसके बाद उस वचन को सुनकर व्याघ्र सियार को छोड़ सहसा भाग खड़ा हुआ। सियार भी सुख से स्थित हुआ।

कथा- 45

"विष्णु ब्राह्मण और रतिप्रिया गणिका की कथा"

विलासपुर नामक नगर में अरिन्दम नाम का राजा था। उसी गाँव में विष्णु नामक एक रति लोलुप ब्राह्मण जो पत्नी विहीन रति कर्म में सब स्त्रियों से पराजित न होने वाला प्रसिद्ध था। उसी गाँव में रतिप्रिया नाम की गणिका थी। उसने सोलह द्रम्म

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