शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन
Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan
श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलेकर उसे अपने घर बुलाया। अन्य कार्यों से निवृत्त रति कर्म में मन दिये उस ब्राह्मण ने उसे जीतने के लिए रति आरम्भ की। द्रव्य के कारण उसे हराने के लिए उस वेश्या ने दो पहर तक उस रति लोलुप ब्राह्मण को सहा, किन्तु आधीरात को नीचे उतर कर उसने कुटनी से निवेदन किया और कहा कि इसका धन इसे वापस कर दो।
कुटनी ने कहा-जब मैं पीपल पर चढकर दो सूपों से पंख के फड़फड़ाने की ध्वनि करती हुई मुर्गे की बोली बोलूँ तब 'प्रभात हो गया' यह कहकर उसे निकाल देना। गणिका ने वैसा ही किया।
जब ब्राह्मण ने कुक्कुट की ध्वनि वाले स्थान को देखा तो दो सूप सहित उसे कुटनी दिखायी दी। उसने उसे ढेलों से आहत कर भूमि पर गिरा दिया। स्त्रियों ने उस कुटनी को बहुत धिक्कारा। वह ब्राह्मण शुल्क रूप में गृहीत धन का दूना धन लेकर नगर के बीच गणिका को निन्दित करके अपने घर गया।
कथा- 46
"करगरा और करगरा नाथ की कथा"
वत्सोम नामक नगर में एक दरिद्र ब्राह्मण था। उसकी पत्नी करगरा नाम के अनुसार गुणी, सब जीवों को इतना उद्विग्न करने वाली थी कि उसके गृहद्वार के वृक्ष पर रहने वाला भूत और ब्राह्मण उसके भय से वन को चले गये। भूत ने डरे हुए ब्राह्मण से कहा कि- हे अतिथि! तुम मुझसे भयभीत न हो, हे द्विज! मदन नामक भूपति की राजधानी मृगावती जाकर मैं उसकी पुत्री मृगलोचना को पकड़ लूँगा। तुम्हारे आने पर तुम्हारे दर्शन मात्र से ही मैं उसे छोड़ दूँगा।
तब भूत के न छोड़ने पर ब्राह्मण ने कहा- मैं करगरा का स्वामी, विश्वास कर यहाँ आकर स्थित हुआ, हे धूर्त भूत! तू अपने वचन का पालन कर। देव! क्या मुझसे छल करना तुझे उचित है?
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