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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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कि इन दोनो मे कौन माता है और कौन पुत्री। इसका पता नन्द के यहाँ से कराके आओ। जब कोई भी नन्द के राज्य में घोडियों के विषय मे निर्णय न कर सका तब राजा ने नौकर से कहा-शकटाल के वंश का कुएँ के अन्दर कोई बचा है या नहीं।

उसने कहा- कोई तो अवश्य बचा है क्योकि कुएँ के अन्दर का कोई मनुष्य पूर्वोदिष्ट भात ग्रहण करता है।

तब उसे कुएँ से निकलवाकर राजा ने शकटाल से कहा इन दोनों में माता और पुत्री कौन है इस सन्देह को दूर करो।

तब मन्त्री ने दोनों घोडियों पर काठी रखवाकर विस्तृत मैदान में खूब दौड़ा कर, उनके थक जाने पर काठी उतरवा कर उन्हें छोड़ दिया। उसके बाद माता पुत्री को जीभ से चाटने लगी और पुत्री उसके प्रति अतिवत्सला-स्नेह युक्त हो गयी। तब मन्त्री ने माता और पुत्री का भेद (कौन माता है, कौन पुत्री) राजा के सामने बता दिया जिसके कारण मन्त्री को बहुत सा धन और प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

कथा- 49

"मन्त्री शकटाल और छड़ी की कथा"

शुक ने प्रभावती से कहा कि- जिस प्रकार शकटाल ने दुबारा चातुर्यपूर्ण काम किय था, वैसे ही संकट में चातुर्यपूर्ण उत्तर देना जानती हो तो जाओ। शुक ने यह कथा सुनाते हुए कहा-

बङ्गाल के राजा ने सुवर्ण हीरकों से जड़ी अत्यन्त गोल आकार वाली छड़ी अपने सेवकों को देकर कहा कि-नन्द के राज्य में जाकर इस छड़ी का आदि और अन्त भाग जानकर आओ। इस आदेश से नन्द के पास आकर छड़ी उसके आगे रखकर उसका आदि और अन्त उन लोगों से पूछा। उनका प्रश्न सनुकर मुख्य-मुख्य कलावैत्ता, बनियों ने उसे तौला, अन्य पण्डितों ने उसे देखा, किन्तु कोई उसका आदि और अन्त भाग नहीं बता सका।

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